श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2054, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/188–190 पहला अध्याय 37 अनुभाष्य— रजोभरः (रजसां गोक्षुरोत्थधूलीनां भरः पुञ्जः समूहः) हरिम् उद्दिशते (सूचयति), तमः (अन्धकारः) पुरतः अमुं (कृष्णं) सङ्गमयति (संयोजयति, अतः) व्रजवामदृशां (व्रजाङ्गनानां) पद्धतिः (रीतिः) सर्वदृशः (सर्वज्ञायाः) श्रुतेः (वेदस्य) अपि प्रकटा च न (गोचरा न स्यात्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। त्रिगुण-विषयक वेदोंमें गुणातीत कृष्णका निर्देश और मिलनकी कथा अव्यक्त है। रजोगुणके द्वारा इस माया जगत्में फेंक दिये जानेके कारण कृष्णविमुख बद्धजीवोंका कृष्णके विषयमें कोई ज्ञान नहीं होता और तमोगुणके द्वारा आवरणके कारण उनका कृष्णसे मिलनका अभाव होता है। किन्तु अप्राकृत वृन्दावनमें गैयाओंके खुरोंसे उठी धूलिके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंके निकट कृष्णका आगमन सूचित होता है एवं तमः अथवा अन्धकारके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंका कृष्णसे सङ्गम सम्पादित होता है। इसलिये शुद्धसत्त्व गोपियाँ और शुद्धसत्त्व श्रीवृन्दावन, दोनों ही त्रिगुणात्मक वेदोंके अगोचर हैं,—यही श्लोकका अर्थ है ॥ 188 ॥ वहाँ मुरलीका भ्रमण जैसे :- ललितमाधव (1/24)में पौर्णमासीके प्रति गार्गीकी उक्ति— हियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षति राधां वनाय या निपुणा। सा जयति निसृष्टार्था वरवंशजकाकली दूती ॥ 189 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 189 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—निपुणा, विशेष कार्य-प्राप्त, श्रेष्ठवंशमें उत्पन्न-वंशीकी मधुर-ध्वनिरूपी दूती जो श्रीराधाकी लज्जा दूर करवाकर उन्हें उनके गृहसे वनकी ओर आकर्षित करती है, वह जययुक्त हो ॥ 189 ॥ अनुभाष्य— या हियं (लज्जाम्) अवगृह्य (विहत्य, हत्वा इत्यर्थः) गृहेभ्यः वनाय (वनगमन-निमित्ताय इत्यर्थः) राधां कर्षति सा निपुणा (दक्षा) निसृष्टार्था (विन्यस्त-कर्मभारा) वरवंशजकाकली (वंशीध्वनिरूपा) दूती जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। निसृष्टार्था,—(उःनीः दूतीभेद प्रकरणमें 7/57 श्लोक)— “विन्यस्तकार्यभारा स्याद्द्वयोरेकतरेण या। युक्त्योभौ घटयेदेषा निसृष्टार्था निगद्यते।” [अर्थात् “नायक अथवा नायिकाके द्वारा किसी विशेष कार्यका भार प्राप्त होनेपर युक्ति और विचारके द्वारा दोनोंका मिलन करवानेवाली दूतीको निसृष्टार्था-दूती कहते हैं।”] ॥ 189 ॥ वहाँ श्रीकृष्ण जैसे :- ललितमाधव (2/11)में श्रीकृष्णके दर्शनसे सखीके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— सहचरि निरातङ्कः कोऽयं युवा मुदिरद्युति- र्व्रजभुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः। अहह चटुलैरुत्सर्पद्भिर्दृगञ्चलतस्करै- र्मम धृतिधनं चेतःकोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥ 190 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि, नवमेघ-कान्तियुक्त, मदमत्त हाथीकी भाँति लीलाकारी, आशङ्का-रहित यह युवक कौन है? यह कहाँसे [व्रजभूमिमें] आया है? आहा, यह चञ्चल गतिके द्वारा और चोरकी भाँति दृष्टिके द्वारा मेरे हृदयके भण्डारसे चित्तके धैर्यरूपी धनको लूट रहा है ॥ 190 ॥ अनुभाष्य— हे सहचरि, अहह इह (वृन्दाविपिने) यः युवा चटुलैः (चपलैः) उत्सर्पद्भिः (सर्वादिक्षु भ्रमद्भिः) दृगञ्चलतस्करैः (नयनकटाक्षचौरैः) मम चेतःकोषात् (हृद्-भाण्डारतः) धृतिधनं (धैर्यरूप-धनं) विलुण्ठयति, मुदिरद्युतिः (मुदिरस्य मेघस्य द्युतिरिव द्युतिः यस्य सः नवमेघरुचिः) माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः (माद्यन् यः मतङ्गजः तद्वत् विभ्रमः विलासः यस्य सः महामत्तगजवच्चञ्चलः) निरातङ्कः (निःशङ्कः) अयं युवा कः? कुतः [च] व्रजभुवि प्राप्तः (समायातः)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥