श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2055, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें38 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/191-197 ] वहाँ श्रीराधा जैसे :- ललितमाधव (2/10)में श्रीराधाके दर्शनसे श्रीकृष्णकी उक्ति- विहारसुरदीर्घिका मम मनःकरीन्द्रस्य या विलोचन-चकोरयोः शरदमन्दचन्द्रप्रभा। उरोऽम्बरतटस्य चाभरणचारुतारावली मयोन्नतमनोरथैरियमलम्भि सा राधिका॥ 191 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो राधिका-मेरे मनरूपी हस्तिके लिये विहारगङ्गा स्वरूपा है, मेरे चक्षुरूपी चकोरके लिये शारदीय पूर्णचन्द्रकी अतिशय प्रभास्वरूपा है एवं मेरे वक्षःस्थलरूपी आकाशके आभूषण-स्वरूप सुन्दर तारावलीकी भाँति है, आज मैंने उस राधिकाको उन्नत मनोरथके साथ [बहुत दिनोंकी अभिलाषाके बाद] प्राप्त किया॥ 191 ॥ अनुभाष्य- या (राधा) मम मनःकरीन्द्रस्य (हृदय-मातङ्गस्य) विहार- सुरदीर्घिका (स्वर्गङ्गा), या विलोचनचकोरयोः (विलोचने नयने एव चकोरौ तयोः) शरदमन्दचन्द्रप्रभा (शरदि अमन्दः पूर्णः यः चन्द्रः तस्य प्रभा), या उरोऽम्बरतटस्य (उरः वक्षः एव अम्बरं आकाशं तस्य तटे क्षेत्रे) च आभरणचारुतारावली (आभूषणेषु अलङ्कारेषु चारुतारावली सुन्दरनक्षत्रमण्डली) च, सा इयं राधिका मया (कृष्णेन) उन्नतमनोरथैः (बहुदिन-मनोवाञ्छितैः हेतुभूतैः) साम्प्रतम् अलम्भि (प्राप्तवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥ श्रीरायके द्वारा सहस्त्र मुखोंसे श्रीरूपके कवित्वकी सतत-प्रशंसा :- एत शुनि' राय कहे प्रभुर चरणे। रूपेर कवित्व प्रशिंसे' सहस्र-वदने॥ 192 ॥ “कवित्व ना हय एइ अमृतेर धार। नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेर सार ॥ 193 ॥ प्रेम-परिपाटी एइ अद्भुत वर्णन। शुनि' चित्त-कर्णेर हय आनन्द-घूर्णन ॥ 194 ॥ अनुवाद-यह सुननेके बाद श्रीरायरामानन्द महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए श्रीरूपके कवित्वकी मानो सैंकड़ों मुखोंसे प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“रूपका कवित्व कवित्व नहीं, अपितु अमृतकी धारा है। नाटकके समस्त लक्षण सिद्धान्तके सार स्वरूप हैं। प्रेमकी परिपाटीका ऐसा अद्भुत वर्णन है, जिसे सुनकर मन और कर्ण आनन्दसे घूमने लगते हैं॥ 192-194 ॥ (प्राचीनकृत श्लोक)- किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः। परस्य हृदये लग्नः न घूर्णयति यच्छिरः ॥ 195 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्योंके हृदयको बींधकर यदि उसके सिरको ही चञ्चल नहीं कर पाये अर्थात् उसके सिरको ही नहीं घुमा पाये, तब कविके काव्यसे और धनुर्धारीके बाणसे क्या प्रयोजन ?195 ॥ प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य- तस्य कवेः काव्येन (रसात्मक-वाक्येन) किम्? धनुष्मतः (धनुर्धरेण) काण्डेन (बाणेन) किं (प्रयोजनम्)?-यत् काव्यं काण्डञ्च परस्य हृदये लग्नं सत्, तस्य शिरः न घूर्णयति? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपाका अनुमान :- तोमार शक्ति बिना जीवेर नहे एइ वाणी। तुमि शक्ति दिया कहाओ,-हेन अनुमानि ॥”196 ॥ अनुवाद-आपकी कृपाके बिना ऐसा कवित्व किसी भी जीवके द्वारा सम्भव नहीं है। मेरा ऐसा अनुमान है कि आप ही शक्ति प्रदान करके रूपके द्वारा यह सब कुछ कहलवा रहे हैं॥”196 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके कवित्वकी प्रशंसा :- प्रभु कहे,-“प्रयागे आमा-सने हइल मिलन। इहार गुणे इहाते आमार तुष्ट हैल मन ॥ 197 ॥