भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2056, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2056

[ 1/197–204 पहला अध्याय 39 अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“प्रयागमें रूपकी मुझसे भेंट हुई थी। इसके गुणोंके कारण मेरा मन इसके प्रति सन्तुष्ट हो गया था॥197॥ मधुर प्रसङ्ग इहार काव्य सालङ्कार। ऐछे कवित्व बिना नहे रसेर प्रचार॥198॥ अनुवाद—रूपके काव्यका प्रसङ्ग अत्यन्त मधुर है और यह समस्त प्रकारके अलङ्कारोंसे विभूषित है। ऐसे कवित्वके बिना रसका प्रचार नहीं हो सकता॥198॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा परमस्नेह-कृपाभाजन श्रीरूपके प्रति भक्तोंकी कृपाकी याचना :– सबे कृपा करि' इँहारे देह' एइ वर। व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे निरन्तर॥199॥ अनुवाद—[महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंसे कहा—] आप सभी कृपा करके इसे यही वर प्रदान करें कि यह निरन्तर व्रजलीला-प्रेमरसका ही वर्णन करे॥199॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी प्रशंसा और वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति-सिद्धान्तरस-पाण्डित्यके विषयमें उन्हें श्रीरायके समान मानना :– इँहार ये ज्येष्ठभ्राता, नाम—‘सनातन’। पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर सम॥200॥ अनुवाद—इसके ज्येष्ठ भ्राता जिनका नाम 'सनातन' है, जगत्में उनके समान सुशिक्षित विद्वान अन्य कोई नहीं है॥200॥ तोमार यैछे विषयत्याग, तैछे ताँर रीति। दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्ये ताँहातेइ स्थिति॥201॥ अनुवाद—जिस प्रकारसे आपने विषयोंका त्याग किया है, उन्होंने भी वैसा ही किया है। दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यकी उनमें ही स्थिति है॥201॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे कहा,— तुम समस्त विषय परित्याग करके जिस प्रकारसे एकान्तिक कृष्णसेवा कर रहे हो, सनातन-गोस्वामी भी ठीक तुम्हारी ही भाँति कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको छोड़कर प्रतिक्षण उसी प्रकार 'तृणादपि सुनीच' अर्थात् निष्किञ्चन भावसे युक्त और कृष्णसे भिन्न भोगोंका वर्जन अर्थात् कृष्णसे भिन्न विषयोंके बन्धनसे मुक्त होकर, कृष्णसेवारूपी विषय ग्रहण करके पराभक्तिकी विद्यामें पारङ्गत हैं। निष्कपट दैन्य, वैराग्य और पाण्डित्यके आदर्श विग्रह सनातन शुद्ध अर्थात् युक्त-वैराग्य और प्रेमभक्तिसिद्धान्त-रस-पाण्डित्य आदिमें ठीक तुम्हारी ही भाँति कुशल और पारदर्शी हैं॥201॥ श्रीरूप-सनातनमें शक्ति सञ्चार करके व्रजमें भेजनेका वर्णन :– एइ दुइ भाइये आमि पाठाइलूँ वृन्दावने। शक्ति दिया भक्तिशास्त्र करिते प्रवर्त्तने॥”202॥ अनुवाद—मैंने इन दोनों भाइयोंको शक्ति प्रदान करके भक्ति शास्त्रका प्रवर्त्तन करनेके लिये वृन्दावन भेजा था॥”202॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुको प्रयोजक-कर्त्ता मानकर उनकी स्तुति :– राय कहे,—“ईश्वर तुमि ये चाह करिते। काठेर पुतली तुमि पार नाचाइते॥203॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप ईश्वर हैं जो चाहे कर सकते हैं। आप तो काठकी पुतली तकको भी नचा सकते हैं॥203॥ श्रीरायके कीर्तनमें और श्रीरूपके लिखनेमें एक ही प्रेम-भक्तिरसका प्रचार :– मोर मुखे ये-सब रस करिला प्रचारणे। सेइ रस देखि एइ इहार लिखने॥204॥ अनुवाद—आपने मेरे मुखसे जिस रसको प्रकाशित कराया था, वही रस मैं इसकी (रूपकी) लेखनीमें देख रहा हूँ॥204॥

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