श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2047, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें30 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/161-164 ] परिमितां स्थलं व्याप्य) असितरत्नैः (इन्द्रनीलमणिभिः) परामृष्टा (व्याप्ता, खचिता) अरुणैः मणिभिः सङ्गीर्णौ (खचितौ) [अङ्गुष्ठत्रयं व्याप्य द्वौ परिसरौ] तत्परिसरौ (मुखपुच्छोभय-प्रदेशे) वहन्ती, तयोः (परिसरयोः) मध्ये हीरोज्ज्वल-विमलजाम्बूनदमयी (हीरैः उज्ज्वलं दीप्तं यत् विमलं विशुद्धं जाम्बूनदं सुवर्णं तन्मयी) इयं कल्याणी (कल्याणमयी) केलि-मुरली (कृष्णक्रीड़ा- वंशी) हरेः (कृष्णस्य) करे (पाणौ) विहरति (विलसति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 161 ॥ विदग्धमाधव (5/17)में श्रीविशाखाके समक्ष श्रीराधाकी उक्ति— सद्वंशतस्तव जनिः पुरुषोत्तमस्य पाणौ स्थितिर्मुरलिके सरलासि जात्या। कस्मात्त्वया सखि गुरोर्विषमा गृहीता गोपाङ्गनागणविमोहनमन्त्रदीक्षा॥ 162 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, मुरलि, तुम—सद्वंशमें उत्पन्न हुई हो, पुरुषोत्तमके हाथमें स्थित हो और जातिसे सरल होनेपर भी किसलिये गोपाङ्गनाओंको विमोहित करनेवाले विशेष गुरुतर (विषम) मन्त्रमें दीक्षित हुई हो?162 ॥ अनुभाष्य— हे मुरलिके, सद्वंशतः (उत्तमवंशदण्डतः, सत्कुलात् इत्यर्थः) तव जनिः (जन्म अभूत्); पुरुषोत्तमस्य (कृष्णस्य) पाणौ (हस्ते) तव स्थिति (वासः); जात्या सरला (अवक्रा, ऋजु) असि; [हे सखि] कस्मात् गुरोः [सकाशात् प्रसादात् वा] त्वया विषमा (असरला) गोपाङ्गनागण-विमोहन-मन्त्रदीक्षा गृहीता (प्राप्ता—गोपीजन-चित्तहरणक्षम-मनुना दीक्षिता)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ विदग्धमाधव (4/7)में पद्माके प्रति चन्द्रावलीकी उक्ति— सखि मुरलि विशालच्छिद्रजालेन पूर्णा लघुरतिकठिना त्वं ग्रन्थिला नीरसासि। तदपि भजसि शश्वच्चुम्बनानन्दसान्द्रं हरिकरपरिरम्भं केन पुण्योदयेन॥ 163 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि मुरलि, तुम—महादोषसमूहसे पूर्ण, लघु, अति कठिन, नीरस और जटिल होनेपर भी किस पुण्यके उदित होनेके कारण निरन्तर कृष्ण-मुख-चुम्बनके गाढ़ आनन्दको तथा कृष्णके हाथके आलिङ्गनरूपी सेवाको स्वीकार कर रही हो?163 ॥ अनुभाष्य— हे सखि मुरलि; त्वं विशालच्छिद्रजालेन (महादोषसमूहेन) पूर्णा (व्याप्ता), लघुः (लाघववती, गौरवहीना), अतिकठिना (निष्ठुरस्वभावा), ग्रन्थिला (नीविग्रन्थिमोचिका), नीरसा (शुष्का) च असि, तदपि केन पुण्योदयेन (प्राक्तनसुकृतिना) शश्वत् (निरन्तरं) चुम्बनानन्दसान्द्रं (चुम्बनोत्थसुखघनं) हरिकरपरिरम्भं (कृष्णहस्तालिङ्गनं) भजसि (प्राप्नोषि)? श्लोक-भावानुवाद—हे सखि मुरलि; तुम महादोषसमूहसे पूर्ण, गौरवहीन, निष्ठुर स्वभाववाली, नीविकी गाँठको खोल देनेवाली और शुष्क हो, तथापि किस प्राचीन सुकृतिरूप पुण्यके उदित होनेके कारण निरन्तर (कृष्णमुखके) चुम्बनसे उत्पन्न घनानन्दको तथा कृष्णके हाथके आलिङ्गनको प्राप्त किया है? ॥ 163 ॥ वहाँ मुरलीभ्रमण जैसे :- विदग्धमाधव (1/27)में श्रीकृष्णके प्रति मधुमङ्गलकी उक्तिके समय आकाशवाणी— रुन्धन्नम्बुभृतश्चमत्कृतिपरं कुर्वन्मुहुस्तम्बुरुं ध्यानादन्तरयन् सनन्दनमुखान् विस्मापयन् वेधसम्। औत्सुक्यावलिभिर्बलिं चटुलयन् भोगीन्द्रमाघूर्णयन् भिन्दन्नण्डकटाहभित्तिमभितो वभ्राम वंशीध्वनिः ॥ 164 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेघकी गतिको अवरुद्ध करके, तुम्बुरादि गन्धर्वोंको विस्मित करके, [ब्रह्मज्ञानमें रत] सनन्दनादि ऋषियोंके ध्यानको भङ्ग करके, ब्रह्मामें विस्मय उत्पन्न करके, धीर-स्थिर (अर्थात् अटल-अचल) बलिराजको उत्सुकताओंके द्वारा अशान्त-चञ्चल बनाकर,