भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2046

[ 1/158–161 पहला अध्याय 29 अमृतप्रवाह भाष्य—आमकी कलियोंकी मधुके द्वारा मधुर, सुगन्धके क्षरणके द्वारा बारम्बार वन्दना करनेवाले भ्रमरोंसे परिपूर्ण, चन्दन-पर्वतसे (मलयसे) प्रवाहित होनेवाली पवनके मन्द-मन्द सञ्चालनके द्वारा आन्दोलित यह श्रीवृन्दावन मेरा अतुलनीय आनन्द वर्धित कर रहा है। देखो, यह वृन्दावन—दिव्य लताओंसे लिपटा हुआ है; लताओंके अग्रभागमें पुष्प शोभायमान हैं; पुष्पोंपर मधुकर (भँवरे) मधुपान करके प्रमत्त हो रहे हैं; और उन मधुकरका गान कर्णके लिये रसायन है॥ 158-159॥ अनुभाष्य— [हे मधुमङ्गल], माकन्दप्रकरमकरन्दस्य (माकन्दप्रकराणाम् आम्रमुकुलसमूहानां मकरन्दस्य) मधुरे सुगन्धौ विनिस्यन्दे मुहुः (पुनः पुनः) वन्दीकृतमधुपवृन्दं (वन्दीकृतम् आबद्धं मधुपवृन्दं भृङ्गकुलं येन तत्) चन्दनगिरेः (मलयपर्वतस्य) मन्दोन्नतिभिः (मृदुसञ्चालितैः) अनिलैः (समीरैः) कृतान्दोलं (कम्पितं, परिचालितं) इदं वृन्दाविपिनं मम अतुलम् आनन्दं तुन्दिलयति (वर्धयति)। [हे श्रीदामन्, इदमेव] वृन्दावनं दिव्यलतापरीतं (दिव्यवल्लीवेष्टितं); लताः च पुष्पस्फुरिताग्रभाजः (पुष्पैः स्फुरितं अग्रं भजन्ति याः ताः), पुष्पाणि च स्फीतमधुव्रतानि (स्फीताः प्रमत्ताः मधुपाः येषु तानि); मधुव्रताश्च श्रुतिहारिगीताः (कर्णरसायनं गीतं येषां ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158-159॥ विदग्धमाधव (1/31)में श्रीमथुमङ्गलके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति— क्वचिद्भृङ्गीगीतं क्वचिदनिलभङ्गी-शिशिरता क्वचिद्वल्लीलास्यं क्वचिदमलमल्लीपरिमलः। क्वचिद्धाराशाली करकफलपाली-रसभरो हृषीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम्॥ 160॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखे, यह वृन्दावन हमारी इन्द्रियोंको नाना प्रकारसे आनन्दित कर रहा है, किसी स्थानपर भ्रमरोंका गीत हो रहा है, कोई स्थान मन्द-मन्द मलयकी समीरके द्वारा शीतल हो रहा है, किसी स्थानपर लताएँ नृत्य कर रही हैं, किसी स्थानपर मल्लिका-पुष्पोंकी अमल सुगन्ध प्रवाहित हो रही है और किसी स्थानपर पंक्तियोंमें लगे अनारके फल [रसकी अधिकताके कारण जिह्वाको सुखप्रद] रस बहा रहे हैं॥ 160॥ अनुभाष्य— [हे मधुमङ्गल], इदं वृन्दावनं हृषीकाणां (चक्षुकर्ण- नासाजिह्वात्वगादीनां) वृन्दं (समूहं) प्रमदयति (आह्लादयति); [यथा,—कर्णप्रमदाय] क्वचित् भृङ्गीगीतं; [त्वगिन्द्रियसुखाय] क्वचित् अनिल-भङ्गीशिशिरता (अनिलस्य वायोः भङ्गी मान्द्यं तया शिशिरता शैत्यं—मन्दानिलस्य शैत्यमित्यर्थः); [नेत्रानन्दाय] क्वचित् वल्लीलास्यं (लतान्नृत्यं); [नासा-प्रमदाय] क्वचित् अमलमल्लीपरिमलः (मल्लयाः मल्लिकायाः अमलः अविमिश्रः परिमलः सुगन्धः); [जिह्वा-सुखाय] क्वचित् धाराशाली (पंक्तिक्रम-विन्यासविशिष्टा) करकफलपालीरसभरः (करकफलपाली दाड़िम्बफलश्रेणी तस्याः रसाधिक्यम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160॥ वहाँ मुरली जैसे :— विदग्धमाधव (3/1)में श्रीललिताके प्रति पौर्णमासीकी उक्ति— परामृष्टाङ्गुष्ठत्रयमसितरत्नैरुभयतो वहन्ती सङ्कीर्णौ मणिभिररुणैस्तत्परिसरौ। तयोर्मध्ये हीरोज्ज्वलविमल-जाम्बूनदमयी करे कल्याणीयं विहरति हरेः केलिमुरली॥ 161॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 161॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दोनों सिरोंपर तीन अँगुलीके परिमाणवाली इन्द्रनीलमणिके द्वारा जड़ित, उसके भीतर दोनों ओर तीन अँगुलीके परिमाणवाली अरुणमणिसे जड़ित और उसके मध्यमें हीरोंसे उज्ज्वलित विमल स्वर्णमयी यह कल्याणी कृष्ण-क्रीड़ा-मुरली कृष्णके हाथोंमें विहार कर रही है॥ 161॥ अनुभाष्य— उभयतः (वंश्याः शिरसि पुच्छे च) अङ्गुष्ठत्रयम् (अङ्गुष्ठत्रय