श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2058, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/213-222 पहला अध्याय 41 अनुवाद—इस प्रकार दोनों कृष्णकथाके आनन्दमें निमग्न हो रहे थे। श्रीरूपने श्रीहरिदासके साथ सुखपूर्वक समयको व्यतीत किया ॥ 213 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़से आये भक्तोंका गौड़में लौटना :— चारि मास रहि' सब प्रभुर भक्तगण। गोसाञि विदाय दिला, गौड़े करिला गमन ॥ 214 ॥ अनुवाद—गौड़देशसे आये महाप्रभुके भक्त चार मास तक जगन्नाथपुरीमें रहे। तब महाप्रभुने उन्हें विदायी दी और वे सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 214 ॥ दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंमें अवस्थान :— श्रीरूप प्रभुपदे नीलाद्रि रहिला। दोलयात्रा प्रभुसङ्गे आनन्दे देखिला ॥ 215 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंमें नीलाद्रिमें (श्रीजगन्नाथ पुरीमें) ही रहे और उन्होंने आनन्दपूर्वक महाप्रभुके साथ दोलयात्राके दर्शन किये ॥ 215 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपमें शक्तिसञ्चार :— दोलयात्रा रहि' प्रभु रूपे आज्ञा दिला। अनेक प्रसाद करि' शक्ति सञ्चारिला ॥ 216 ॥ वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनको पुरी भेजनेकी आज्ञा :— “वृन्दावने याह' तुमि, रहिह वृन्दावने। एकबार इँहा पाठाइह सनातने ॥ 217 ॥ वृन्दावनमें चार प्रकारकी सेवाका कार्यभार प्रदान— (1) भक्तिरसशास्त्रकी रचना, (2) लुप्ततीर्थोंका उद्धार, (3) श्रीविग्रह और मन्दिरमें सेवाका संस्थापन और (4) अप्राकृत-भक्ति-रसप्रचार :— व्रजे याइ' रसशास्त्र करिह निरूपण। लुप्त-तीर्थ सब ताँहा करिह प्रचारण ॥ 218 ॥ कृष्णसेवा, रसभक्ति करिह प्रचार। आमिह देखिते ताहा याइमु एकबार ॥ "219 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने दोलयात्राके समाप्त हो जानेपर श्रीरूपपर अनेक प्रकारसे कृपा करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया और उन्हें आज्ञा दी,—“तुम वृन्दावनमें जाओ और वृन्दावनमें ही रहना। सनातनको एकबार यहाँ जगन्नाथपुरीमें भेजना। व्रजमें जाकर रसशास्त्रोंका निरूपण करना। वहाँके समस्त लुप्त-तीर्थोंको प्रकाशित करना। कृष्णविग्रह-सेवा और रसभक्तिका प्रचार करना। मैं भी एकबार वृन्दावनका दर्शन करने जाऊँगा ॥ ”216-219 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुका पुनः वृन्दावन गमन नहीं सुना जाता ॥ 219 ॥ पहले अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका आलिङ्गन, श्रीरूपका प्रणाम :— एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। रूप-गोसाञि शिरे धरे प्रभुर चरण ॥ 220 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया। श्रीरूप गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण किया ॥ 220 ॥ गौड़देशसे होते हुए श्रीरूपका व्रजमें आगमन :— प्रभुर भक्तगण-पाशे विदाय लइया। पुनरपि गौड़पथे वृन्दावने आइला ॥ 221 ॥ अनुवाद—श्रीरूपने महाप्रभुके समस्त भक्तोंसे विदायी ली और पुनः गौड़देशसे होते हुए वृन्दावन आ गये ॥ 221 ॥ महाप्रभु-रूप-मिलन-संवादके श्रवणसे अचैतन्य जीवको श्रीचैतन्य-चरणकमलोंकी प्राप्ति :— एइ त' कहिलाङ पुनः रूपेर मिलन। इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 222 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके साथ श्रीरूपके पुनः