भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2060, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2060

दूसरा अध्याय


[बायाँ स्तम्भ]

**कथासार—**महाप्रभुका साक्षात्-दर्शन, आवेश और आविर्भाव जिस-जिस स्थानपर हुआ था, उसका विवरण बतलाते हुए ग्रन्थकारने नकुल ब्रह्मचारीकी कथा, नृसिंहानन्दकी महिमा तथा अन्यान्य भक्तोंकी कथाको लिखा है। भगवान्-आचार्यकी महाप्रभुके प्रति निष्ठा होनेपर भी श्रील स्वरूप-दामोदरने भगवान्के भाई गोपाल-भट्टाचार्यके मुखसे मायावादभाष्यको सुननेके लिये उन्हें निषेध किया। उसके बाद छोटे-हरिदासके द्वारा भगवान्-आचार्यकी आज्ञासे माधवी देवीके पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेपर महाप्रभुने उन्हें वैरागीके स्त्रीसे वार्तालापके दोषके कारण (अपने वासस्थानके द्वारमें प्रवेश करनेके लिये) निषेध किया और वैष्णवोंके अनुरोध करनेपर भी उन्हें पुनः ग्रहण नहीं किया। एक वर्षके बाद छोटे-हरिदासने प्रयाग-त्रिवेणीमें डूबकर प्राण त्याग करनेके बाद अप्राकृत देहसे महाप्रभुको गान सुनाया। गौड़ीय वैष्णवोंके द्वारा आकर इस संवादको कहनेपर श्रीस्वरूपादि सभी इससे अवगत हुए। —(अमृतप्रवाह भाष्य)

छह रूपोंमें विलास करनेवाले आवरण (पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्य-महाप्रभुको और सेवारत प्रेष्ठ सखियोंसे परिवेष्टित श्रीराधाकृष्णको प्रणाम :— वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च॥1॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**मैं श्रीगुरुके चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं, समस्त वैष्णवों, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन


[दायाँ स्तम्भ]

गोस्वामी, गणोंसहित श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव, गणोंसहित श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अहं श्रीगुरोः (मन्त्रदीक्षागुरोः भजनशिक्षागुरोः वा) श्रीयुतपदकमलं (श्रीमच्चरणसरोजं) श्रीगुरून् (परम्परात्पर-प्रभृति-गुरुगणान् श्रीमदानन्दतीर्थ-श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी-प्रमुख गुरुवर्गान्) वैष्णवान् (चतुर्युगोद्भूतान् भागवतान्) च; साग्रजातं (अग्रेजेन श्रीमता गोस्वामिना सनातनेन सह वर्तमान), सहगणरघुनाथान्वितं (स्वभक्तैः सह रूपानुगेन श्रीरघुनाथेन दास-गोस्वामिना च सह सहितं) सजीवं (निजानुकम्पितेन रूपानुगेन श्रीजीवगोस्वामिना सह विद्यमानं) तं श्रीरूपं, साद्वैतं (अद्वैतप्रभुसहितं) सावधूतं (नित्यानन्दप्रभूसमन्वितं) परिजनसहितं (सावरण-पार्षदं) कृष्णचैतन्यदेवं (महाप्रभुं); सहगणललिता-श्रीविशाखान्वितान् (गणेन सखिमञ्जरीभिः सह वर्त्तमानाभ्यां ललिताविशाखाभ्याम् अन्वितान् युक्तान्) श्रीराधाकृष्णपादान् च वन्दे। **श्लोक-भावानुवाद—**मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं) के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परात्पर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता- विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥1॥

जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥