भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2032, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2032

[ 1/105-111 पहला अध्याय 15 श्रीरूपके द्वारा रचित "प्रियः सोऽयं" और "तुण्डे ताण्डविनी" श्लोककी प्रशंसा :- दुइ श्लोक कहि' प्रभुर हैल महासुख। निज-भक्तेर गुण कहे हञा पञ्चमुख ॥ 105 ॥ श्रीराय और श्रीभट्टसे स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके गुणोंका वर्णन :- सार्वभौम-रामानन्दे परीक्षा करिते। श्रीरूपेर गुण दुँहारे लागिला कहिते ॥ 106 ॥ अनुवाद- महाप्रभुको श्रीरूपके द्वारा रचित 'प्रियः सोऽयं' और 'तुण्डे ताण्डविनी'- इन दो श्लोकोंका पाठ करके ऐसा आनन्द हुआ कि वे मानो पाँच मुखवाले होकर अपने भक्तके गुणोंका वर्णन करने लगे। महाप्रभु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द रायके द्वारा श्रीरूपकी परीक्षा करवानेके लिये उन्हें अपने साथ श्रीरूपके पास लेकर जा रहे थे। महाप्रभु उन दोनोंसे श्रीरूपके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ 105-106 ॥ भगवान्का भक्तवात्सल्य :- ईश्वर-स्वभाव'-भक्तेर ना लय अपराध। अल्पसेवा बहु माने आत्मपर्यन्त प्रसाद ॥ 107 ॥ अनुवाद- ईश्वरका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे अपने भक्तके अपराधोंको ग्रहण नहीं करते। अपितु अपने भक्तके द्वारा की गयी थोड़ी-सी सेवाको भी बहुत मानकर उन्हें स्वयं तकको भी प्रदान कर देते हैं॥ 107 ॥ अनुभाष्य - 'आत्मपर्यन्त प्रसाद'- आत्माको अर्थात् स्वयंको प्रदान करने रूपी अनुग्रह तक करते हैं॥ 107 ॥ भक्तके प्रति भगवान्का व्यवहार :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/138) में- भृत्यस्य पश्यति गुरून्नपि नापराधान् सेवां मनागपि कृतां बहुधाभ्युपैति। आविष्करोति पिशुनेष्वपि नाभ्यसूयां शीलेन निर्मलमतिः पुरुषोत्तमोऽयम् ॥ 108 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् पुरुषोत्तम - अपनी निर्मल-मति तथा अपने शीलता धर्मके द्वारा इन सेवकोंके भारी सब अपराधोंको भी नहीं देखते; अति अल्प सेवाको भी बहुत मानते हैं और स्वयंकी निन्दा करनेवाले दुर्जनके प्रति भी असूया (दोष-दृष्टि) आविष्कार (प्रकाश) नहीं करते ॥ 108 ॥ अनुभाष्य - अयं निर्मलमतिः (निर्मला नैसर्गिक-रागद्वेषादिवर्जिता मतिः यस्य सः) पुरुषोत्तमः (कृष्णः, - 'कमलेक्षणः' इति पाठान्तरे) शीलेन (सत्स्वभावेन) भृत्यस्य (किङ्करस्य) गुरून् (महतः) अपि अपराधान् न पश्यति; मनाक् (ईषत्) अपि कृतां (अनुष्ठितां) सेवां बहुधा (बहुप्रकारतया) अभ्युपैति (अङ्गीकरोति); पिशुनेषु (खलेषु दुर्जनेषु वा) अपि अभ्यसूयात् (दोषदृष्टिं) न आविष्करोति (न प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको उनके गणोंके सहित प्रणाम :- भक्तसङ्गे प्रभु आइला, देखि' दुइ जन। दण्डवत् हञा कैला चरण-वन्दन ॥ 109 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंके सङ्ग आये हैं, यह देखकर श्रीरूप और श्रीहरिदास ठाकुरने दण्डवत् होकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 109 ॥ भक्तोंसे घिरे हुए महाप्रभुके सामने उनसे निम्न आसनपर दोनोंका दीनतापूर्वक बैठना :- भक्तसङ्गे कैला प्रभु दुँहारे मिलन। पिण्डात बसिला प्रभु लञा भक्तगण ॥ 110 ॥ रूप, हरिदास दुँहे बसिला पिण्डातले। सबार अग्रे ना उठिला पिँड़ार उपरे ॥ 111 ॥ अनुवाद - महाप्रभु अपने भक्तों सहित श्रीरूप और श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले। महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ लेकर चबूतरेके ऊपर बैठ गये। श्रीरूप और श्रीहरिदास

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