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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2031, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2031

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14 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/98-104 ] अनुवाद-महाप्रभुने उस पत्रपर लिखे एक श्लोकको देखा। उस श्लोकको पढ़ते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये॥ 98 ॥ कृष्णनाम-माधुर्यका आस्वादन-सूचक श्लोक :- विदग्धमाधव (1/15)में नान्दीके प्रति पौर्णमासीका वाक्य- तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये कर्णक्रोडकड़म्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम्। चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥ 99 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कृष्ण' ये दो वर्ण कितने अमृतके साथ उत्पन्न हुए हैं, मैं उसे नहीं जानती; -देखो, जब (नर्तकीकी भाँति) वे मुखमें नृत्य करते हैं, तब बहुतसे मुख प्राप्त करनेके लिये रतिका विस्तार (अर्थात् आसक्ति वर्धित) करते हैं; जब कर्णकुहरोंमें प्रवेश करते हैं (अङ्कुरित होते हैं), तब अरबों कानोंके लिये स्पृहा उत्पन्न होती है; जब चित्तके प्राङ्गणमें (सङ्गिनीरूपमें) उदित होते हैं, तब समस्त इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं [अर्थात् अपनेमें आविष्ट करके उन्हें चेष्टाशून्य कर देते हैं] ॥ 99 ॥ अनुभाष्य- कृष्णः इति वर्णद्वयी कियद्भिः (कियत्परिमितैः) अमृतैः [सह] जनिता (उत्पादिता), [तत् अहं] नो जाने (न वेद्मि), [यतः सा हे नान्दीमुखि], तुण्डे (मुखे) ताण्डविनी (ताण्डवं-'पुंनृत्यं ताण्डवं प्रोक्तं' इति वाक्यात् 'नाट्यं', तत् कुर्वती सती) तुण्डावली-लब्धये (बहुवदनश्रेणीनां प्राप्तये) रतिं (स्पृहां) वितनुते (प्रकाशयति); कर्णक्रोडकड़म्बिनी (कर्णपदव्यां कड़म्बिनी अङ्कुरिता सती) कर्णाबुदेभ्यः (अर्बुदसंख्यामित-कर्णलाभाय) स्पृहां (वाञ्छां) घटयते; चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी (चेतः एव प्राङ्गणं तस्मिन् सहचरी सती) सर्वेन्द्रियाणाम् (इन्द्रियसमुहानां) कृतिं (व्यापारं) विजयते (पराजयते, तदाविष्टं कारयित्वा चेष्टाशून्यं करोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥ श्लोकको सुनकर नामाचार्यका आनन्दसे नृत्य :- श्लोक शुनि' हरिदास हइला उल्लासी। नाचिते लागिला श्लोकेर अर्थ प्रशंसि' ॥ 100 ॥ श्लोककी अद्वितीय कृष्णनाम-माहात्म्यकी सूचना :- “कृष्णनामेर महिमा शास्त्र-साधु-मुखे जानि। नामेर महिमा ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥” 101 ॥ अनुवाद-उपरोक्त श्लोकको सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उल्लसित होकर नाचने लगे और श्लोकके भावार्थकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“मैंने शास्त्रोंसे और साधुओंके मुखसे कृष्णनामकी महिमाको जाना है, किन्तु आज तक नामकी ऐसी महिमा कहींपर भी नहीं सुनी ॥” 100-101 ॥ महाप्रभुका मध्याह्न स्नानके लिये गमन :- तबे महाप्रभु दुँहे करि' आलिङ्गन। मध्याह्न करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 102 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु दोनोंको (श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूपको) आलिङ्गन करके मध्याह्नके स्नानके लिये समुद्रकी ओर चल दिये ॥ 102 ॥ अन्य एकदिन श्रीस्वरूप-रामानन्द-भट्टादिके साथ महाप्रभुका श्रीरूपके समीप आगमन :- आर दिन महाप्रभु देखि' जगन्नाथ। सार्वभौम-रामानन्द-स्वरूपादि-साथ ॥ 103 ॥ मार्गमें स्वयं अपने श्रीमुखसे श्रीरूपकी प्रशंसा करना :- सबे मिलि' चलि आइला श्रीरूपे मिलिते। पथे ताँर गुण सबारे लागिला कहिते ॥ 104 ॥ अनुवाद-अन्य एकदिन महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदर आदिको साथ लेकर श्रीरूपसे मिलनेके लिये चल पड़े। मार्गमें महाप्रभु सबको श्रीरूपके गुणोंकी प्रशंसा करने लगे ॥ 103-104 ॥

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