भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2030, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2030

[ 1/91–98 पहला अध्याय 13 फलके द्वारा उसके कारणका अनुमान :- न्याय-वचन- “फलेन फलकारणमनुमीयते॥” 91 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-फलके द्वारा ही फलके कारणका अनुमान होता है॥ 91 ॥ जैसा कारण वैसा कार्य :- नैषधी (3/17)में दमयन्तीके प्रति हंसवाक्य- स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां नाना-मृणालाग्रभुजो भजामः। अन्नानुरूपां तनुरूपऋद्धिं कार्यं निदानाद्धि गुणानधीते॥” 92 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्वर्ग-गङ्गाके सुवर्ण-कमलके अग्र भागोंका भोजन करके ही हम उनके समान शरीरके सौन्दर्यको प्राप्त हुए हैं; क्योंकि मूलकारणके अनुरूप ही गुणगण उदित होते हैं॥” 92 ॥ अनुभाष्य- [हे दमयन्ति,] स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां (स्वर्गाप-गायाः स्वर्गङ्गायाः मन्दाकिन्याः हेममृणालिनीनां स्वर्णतुल्यपद्मानां) नानाम्ॄणालाग्रभुजः (विविध-कोमल-पद्माग्रभोजनशीलाः वयम्) अन्नानुरूपां (भुक्तसदृशीं) तनुरूपऋद्धिं (देहलावण्य-समृद्धिं) भजामः (प्राप्नुमः); हि (यतः) कार्यं (फलं) निदानात् (आदिकारणात्) गुणान् अधीते (प्राप्नोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥ चातुर्मास्यके अन्त होनेपर गौड़ीयगणोंका गौड़में लौटना :- चातुर्मास्य रहि' गौड़े वैष्णव चलिला। रूप-गोसाञि महाप्रभुर चरणे रहिला॥ 93 ॥ अनुवाद-गौड़ीय भक्त चातुर्मासके अन्त तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहकर गौड़देश लौट गये। किन्तु श्रीरूप-गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंमें वहीं रह गये॥ 93 ॥ एकदिन श्रीरूपके नाटक लिखते समय महाप्रभुका अकस्मात् आगमन :- एकदिन रूप करेन नाटक-लिखन। आचम्बिते महाप्रभुर हैल आगमन॥ 94 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीरूप-गोस्वामी नाटक लिख रहे थे कि अकस्मात् महाप्रभुका वहाँ आगमन हुआ॥ 94 ॥ श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका बैठना :- सम्भ्रमे दुँहे उठि' दण्डवत् हैला। दुँहे आलिङ्गिया प्रभु आसने बसिला॥ 95 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपने शीघ्रतासे उठकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु दोनोंको आलिङ्गन करके आसनपर बैठ गये॥ 95 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप-लिखित एक पत्रको उठाना और श्रीरूपकी लिखावटको देखकर सन्तोषकी प्राप्ति :- 'क्या पुँथि लिख?' बलि' एकपत्र निला। अक्षर देखिया प्रभु मने सुखी हैला॥ 96 ॥ अनुवाद-'कौन-सा ग्रन्थ लिख रहे हो?'—यह कहकर महाप्रभुने एक तालपत्र हाथमें ले लिया। श्रीरूपकी लिखावटको देखकर महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 96 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपकी लिखावटकी प्रशंसा :- श्रीरूपेर अक्षर-येन मुकुतार पाँति। प्रीत हञा करेन प्रभु अक्षरेर स्तुति॥ 97 ॥ अनुवाद-श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षर मानों मुक्ताओंकी पंक्ति हो। प्रसन्न होकर महाप्रभुने श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षरोंकी बहुत प्रशंसा की॥ 97 ॥ एक श्लोकको देखकर महाप्रभुमें प्रेमावेश :- सेइ पत्रे प्रभु एक श्लोक देखिला। पड़ितेइ श्लोक, प्रेमे आविष्ट हइला॥ 98 ॥