श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें12 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/81-90 ] महाप्रभुका श्रीरूपकृत श्लोकके पाठसे प्रेमावेश :- हेनकाले प्रभु आइला ताँहारे मिलिते। चाले श्लोक देखि' प्रभु लागिला पड़िते ॥ 81 ॥ श्लोक पड़ि' प्रभु सुखे प्रेमाविष्ट हैला। हेनकाले रूप-गोसाञि स्नान करि' आइला ॥ 82 ॥ अनुवाद-उसी समय महाप्रभु श्रीरूपसे मिलनेके लिये आये। महाप्रभुने झोपड़ीकी छतमें रखे तालपत्रको देखा और उसे निकालकर उसपर लिखे श्लोकको पढ़ने लगे। श्लोकको पढ़कर महाप्रभु आनन्दसे प्रेमाविष्ट हो गये। तभी श्रीरूप-गोस्वामी स्नान करके आ गये॥ 81-82 ॥ श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी अकृत्रिम स्नेह-कृपा :- प्रभु देखि' दण्डवत् प्राङ्गुणे पड़िला। प्रभु ताँरे चापड़ मारि' कहिते लागिला ॥ 83 ॥ श्रीरूपको गाढ़ आलिङ्गन :- “गूढ़ मोर हृदय तुमि जानिला केमने?” एत कहि' रूपे कैला दृढ़ आलिङ्गने ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीरूपने प्राङ्गणमें ही दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु श्रीरूपको प्रेमसे एक हल्केसे चपत लगाकर कहने लगे,-“हे रूप! तुमने मेरे हृदयके गूढ़भावको कैसे जान लिया?” यह कहकर उन्होंने श्रीरूपका दृढ़ आलिङ्गन किया॥ 83-84 ॥ महाप्रभुके द्वारा अज्ञ होनेका अभिनय करते हुए श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोक दिखलाकर रहस्यपूर्वक श्रीस्वरूपसे श्रीरूपके द्वारा उनके मनोभावोंको जाननेके कारणकी जिज्ञासा :- से-श्लोक लञा प्रभु स्वरूपे देखाइला। स्वरूपेर परीक्षा लागि' ताँहारे पुछिला ॥ 85 ॥ “मोर अन्तर-वार्त्ता रूप जानिल केमने?” स्वरूप कहे,-“जानि, कृपा करियाछ आपने ॥ 86 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीरूपकी महाप्रभुकी कृपा प्राप्तिका अनुमान :- अन्यथा ए अर्थ कार नाहि हय ज्ञान। तुमि पूर्वे कृपा कैला, करि अनुमान ॥” 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उस तालपत्रपर लिखे श्लोकको लाकर श्रीस्वरूप दामोदरको दिखलाकर उनकी परीक्षा करनेके लिये उनसे पूछा,-“रूपने मेरे हृदयकी गूढ़ बातको कैसे जान लिया?” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“अवश्य ही आपने रूपपर कृपा की है, अन्यथा उस श्लोकके अर्थको कोई भी नहीं जान सकता। इसलिये मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने पूर्वकालमें इसपर कृपा की होगी॥” 85-87 ॥ स्वरूपसे महाप्रभुके द्वारा प्रयागमें रूपशिक्षा-वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,-“इँहो आमाय प्रयागे मिलिल। योग्यपात्र जानि मोर कृपा त' हइल ॥ 88 ॥ तबे शक्ति सञ्चारि' आमि कैलुँ उपदेश। तुमिह कहिओ इँहाय रसेर विशेष ॥” 89 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“यह (रूप) मुझसे प्रयागमें मिला था। इसे योग्यपात्र जानकर मैंने इसपर कृपा की थी। तब मैंने इसमें अपनी शक्तिका सञ्चार करके इसे उपदेश दिया था। हे स्वरूप ! तुम भी इसे उपदेश देना और विशेषकर रसत्तत्वके विषयमें बतलाना॥” 88-89 ॥ श्रीस्वरूपके अनुमानकी यथार्थता :- स्वरूप कहे,-“याते एइ श्लोक देखिलुँ। तुमि करियाछ कृपा, तबँहि जानिलु ॥ 90 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे कहा,-“मैंने जैसे ही इस श्लोकको देखा, मैं तभी जान गया कि आपने इसपर कृपा की है॥ 90 ॥