श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2018, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय कथासार—महाप्रभुके श्रीवृन्दावनसे श्रीक्षेत्रमें आगमनका समाचार पाकर गौड़ीय भक्तों ने पुरुषोत्तम धामकी यात्रा की। श्रीशिवानन्द सेन एक कुत्तेको भी पार करानेका खर्चा देकर ले जा रहे थे। एक रातमें कुत्तेको भात नहीं देनेपर वह अकेला महाप्रभुके पास चला गया। अगले दिन श्रीशिवानन्दादिने महाप्रभुके निकट पहुँचकर देखा कि वह कुत्ता महाप्रभुके द्वारा दिये गये नारियलकी गिरिके प्रसादको खा रहा है; बादमें वह कुत्ता उद्धार प्राप्त करके (वैकुण्ठ) चला गया। इधर श्रीरूपगोस्वामी वृन्दावनसे यात्रा करके गौड़ीय भक्तोंके साथ नहीं आ पानेके कारण कुछ दिन बादमें नीलाचल आकर श्रीहरिदासके साथ रहे। महाप्रभु श्रीरूपके द्वारा विरचित “प्रियः सोऽयं” श्लोकको पढ़कर बहुत ही आनन्दित हुए। एक दिन महाप्रभुने श्रीराय-रामानन्द, श्रीसार्वभौमादि भक्तोंके साथ श्रीहरिदासके वासस्थानपर आकर श्रीरूपके ‘ललितमाधव’ और ‘विदग्धमाधव’ नामक दो नाटकोंके मङ्गलाचरणादि श्लोकोंका श्रवण किया। श्रीरामानन्द रायने उन दोनों नाटकोंके अनेक अङ्ग-प्रत्यङ्गका विचार करके ऐसा स्थिर किया कि दोनों नाटक ही सर्वोत्कृष्ट हुए हैं। चातुर्मास्यके बाद गौड़ीय-भक्तोंने महाप्रभुकी आज्ञासे गौड़देशकी यात्रा की। श्रीरूपगोस्वामी श्रीक्षेत्रमें ही रहे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा लँगड़ेको पर्वत पार करनेकी शक्ति प्रदान करती है और गूँगेसे वेदका पाठ करवा देती है, मैं उन्हीं ईश्वर श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— यत्कृपा (यत् यस्य चैतन्यचन्द्रस्य अनुकम्पा) पङ्गुं (पदविक्षेपणशक्तिविहीनं जनं) शैलं (परमोच्चगिरिशिखरं) लङ्घयते (उत्तारयति), मूकं (वाक्शक्तिविहीनं जनं) श्रुतिं (वेदम्) आवर्त्तयेत् (पाठयति), तम् ईश्वरं परमेश्वरं (कृष्णचैतन्यं महाप्रभुम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ सज्जनोंकी कृपाकी याचना :— दुर्गमे पथि मेऽन्धस्य स्खलत्पादगतेर्मुहुः। स्वकृपा-यष्टिदानेन सन्तः सन्त्ववलम्बनम्॥2॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥2॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुगण अपनी कृपारूपी लाठी देकर मुझ दुर्गम पथमें पुनः-पुनः फिसलनेवाले और अन्धेका सहारा हों॥2॥ अनुभाष्य— सन्तः (साधवः) स्वकृपा-यष्टिदानेन (निजदयारूपावलम्बन- प्रदानेन) दुर्गमे (दुस्तरे) पथि (संसारे) मुहुः (पुनः पुनः) स्खलत्पादगतेः (विक्षिप्तचरणस्य पथभ्रष्टस्य), अन्धस्य (नयन- विहीनस्य) मे (मम) अवलम्बनम् (आश्रयपदं) सन्तु (भवन्तु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥2॥ परमदयालु परमेश्वर श्रीकृष्णचैतन्यमहाप्रभुकी वन्दना :— पङ्गुं लङ्घयते शैलं मूकमावर्त्तयेच्छ्रुतिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे कृष्णचैतन्यमीश्वरम्॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ॥3॥ एइ छय गुरुर करों चरण वन्दन। याहा हैते विघ्ननाश, अभीष्ट-पूरण॥4॥