भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2021

4 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/22-32 ] कुक्कुर नाहि पाय भात, शुनि' दुःखी हैला। कुक्कुर चाहिते दश-मनुष्य पाठाइला॥ २२॥ अनुवाद—सेवकने जब कहा कि कुत्तेको भोजन नहीं दिया गया, तब श्रीशिवानन्द सेनको बहुत दुःख हुआ और उन्होंने कुत्तेको ढूँढ़नेके लिये दस लोगोंको भेजा॥ २२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चाहिते'—खोजने॥ २२॥ चाहिया ना पाइल कुक्कुर, लोक सब आइला। दुःखी हञा शिवानन्द उपवास कैला॥ २३॥ अनुवाद—बहुत खोजनेपर भी जब वह कुत्ता नहीं मिला, तब सभी लोग लौट आये। श्रीशिवानन्द सेनने दुःखी होकर उस रात्रि उपवास किया॥ २३॥ प्रभाते कुक्कुर चाहि' काँहा ना पाइल। सकल वैष्णवेर मने चमत्कार हैल॥ २४॥ अनुवाद—प्रातःकालमें भी पुनः सभीने कुत्तेको सर्वत्र ढूँढ़ा, किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं चला। ऐसा देखकर सभी वैष्णवोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥ २४॥ उत्कण्ठाय चलि' सबे आइला नीलाचले। पूर्ववत् महाप्रभु मिलिला सकले॥ २५॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये वे सब वहाँसे चल पड़े और नीलाचल आ पहुँचे। महाप्रभु पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंसे मिले॥ २५॥ सबा लञा कैला जगन्नाथ-दरशन। सबा लञा महाप्रभु करेन भोजन॥ २६॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ ले जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ भोजन किया॥ २६॥ पूर्ववत् सबारे प्रभु पाठाइला वासा-स्थाने। प्रभु-स्थाने आर दिन सबार गमने॥ २७॥ अनुवाद—पूर्व वर्षोंकी भाँति महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके रहनेके स्थानपर भेजा। अगले दिन सभी भक्त महाप्रभुसे उनके वासस्थानपर मिलनेके लिये आये॥ २७॥ आसिया देखिल सबे सेइ त' कुक्कुरे। प्रभु-पाशे बसियाछे किछु अल्पदूरे॥ २८॥ अनुवाद—वहाँ आकर सभी भक्तोंनै देखा कि वह कुत्ता महाप्रभुके पास उनसे थोड़ी दूरीपर ही बैठा हुआ है॥ २८॥ प्रसाद नारिकेल-शस्य देन फेलाइञा। 'राम' 'कृष्ण' 'हरि' कह', बलेन हासिया॥ २९॥ अनुवाद—महाप्रभु उसे नारियल प्रसादकी गिरि फेंककर दे रहे थे और मुस्कुराते हुए उसे कह रहे थे—'राम', 'कृष्ण', 'हरि' बोलो॥ २९॥ शस्य खाय कुक्कुर, 'कृष्ण' कहे बार बार। देखिया लोकेर मने हैल चमत्कार॥ ३०॥ अनुवाद—वह कुत्ता नारियलकी गिरि खा रहा था और बार-बार 'कृष्ण' नाम बोल रहा था। उस कुत्तेको 'कृष्ण' नाम बोलते देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ॥ ३०॥ शिवानन्द कुक्कुर देखि' दण्डवत् कैला। दैन्य करि' निज अपराध क्षमाइला॥ ३१॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कुत्तेको देखकर उसे दण्डवत् प्रणाम किया और दीनतापूर्वक अपने किये अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना की॥ ३१॥ कुत्तेकी सिद्धि और वैकुण्ठ-प्राप्ति :- आर दिन केह तार देखा ना पाइला। सिद्ध-देह पाञा कुक्कुर वैकुण्ठेते गेला॥ ३२॥