श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2022, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/32-37 पहला अध्याय 5 अनुवाद—अगले दिन वह कुत्ता किसीको दिखलायी नहीं दिया। वह कुत्ता सिद्ध-देहको प्राप्त करके वैकुण्ठमें चला गया॥ 32॥ आलौकिक लीलामय महाप्रभु :- ऐछे दिव्यलीला करे शचीर नन्दन। कुकुरके 'कृष्ण' कहाञा करिला मोचन॥ 33॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी अनेक दिव्य लीलाएँ करते हैं। उन्होंने कुत्तेके मुखसे 'कृष्ण' कहलवाकर उसका उद्धार कर दिया॥ 33॥ श्रीरूपका वृन्दावन आगमन और नाटक-रचना आरम्भ :- एथा प्रभु-आज्ञाय रूप आइला वृन्दावन। कृष्णलीला-नाटक करिते हैल मन॥ 34॥ अनुवाद—इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुकी आज्ञासे प्रयागसे वृन्दावन आ गये और वहाँ उनकी कृष्णलीला-विषयक-नाटक लिखनेकी इच्छा हुई॥ 34॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णलीला-नाटक'—कृष्णलीला- विषयक नाटक॥ 34॥ वृन्दावने नाटकेर आरम्भ करिला। मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' तथाइ लिखिला॥ 35॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने वृन्दावनमें कृष्णलीला- विषयक नाटकको लिखना आरम्भ किया। उन्होंने उस नाटक ग्रन्थका मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' वहीं लिखा॥ 35॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नान्दी-श्लोक'—नाटकके आरम्भमें जिस मङ्गलाचरण-श्लोकका पाठ होता है, उसे 'नान्दी'-श्लोक कहते हैं॥ 35॥ अनुभाष्य—'नान्दी'—नाटकचन्द्रिका में— “प्रस्तावनायास्तु मुखे नान्दी कार्या शुभावहा। आशीर्नमस्क्रिया-वस्तुनिर्देशान्यतमान्विता॥ अष्टाभिर्दशभिर्युक्ता किंवा द्वादशभिः पदैः। चन्द्रनामाङ्किता प्रायो मङ्गलार्थ पदोज्ज्वला। मङ्गलं चक्रकमलचकोरकुमुदादिकम्॥” [अर्थात् “प्रस्तावनाके प्रारम्भमें नान्दी-कार्य शुभकारी होता है। आशीर्वाद, नमस्कार और वस्तुनिर्देशसे संयुक्त नान्दी आठ, दस अथवा बारह पदोंसे युक्त होता है और प्रायः चन्द्र नामसे अङ्कित होकर मङ्गलसूचक पदसे शोभित होता है। चक्र, कमल, चकोर, कुमुद आदि ही मङ्गल हैं।”] साहित्यदर्पण छठे अध्याय 282 संख्यामें— “आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते। देवद्विज-नृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता॥” [अर्थात् “देव, ब्राह्मण, राजा आदिके जिन आशीर्वाद-सूचक वचनोंसे संयुक्त स्तुति नटगण प्रयोग किया करते हैं, उससे आनन्द उत्पन्न होता है, इसलिये वह नान्दी-नामसे कहा जाता है।”]॥ 35॥ अपने छोटे भाईके साथ श्रीरूपकी गौड़देश यात्रा और सूत्र-आकारमें नाटककी पाण्डुलिपिकी रचना :- पथे चलि' आइसे नाटकेर घटना भाविते। कड़चा करिया किछु लागिला लिखिते॥ 36॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी अपने छोटे भाई श्रीअनुपमके साथ वृन्दावनसे गौड़देशकी ओर चल पड़े। श्रीरूप गोस्वामी मार्गमें चलते-चलते नाटकमें वर्णन होनेवाले घटनाओंका चिन्तन करते जा रहे थे और उन्होंने मार्गमें ही सूत्ररूपमें नाटककी पाण्डुलिपिकी रचना की॥ 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कड़चा'—प्रारूप अथवा पाण्डुलिपि॥ 36॥ गौड़में श्रीअनुपमको गङ्गाप्राप्ति :- एइमते दुइभाइ गौड़देशे आइला। गौड़े आसि' अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति हैला॥ 37॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनों भाई गौड़देशमें आ पहुँचे। गौड़देशमें आनेपर श्रीअनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई अर्थात् उनका वहींपर देहत्याग हुआ॥ 37॥