भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2065

48 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/36-45 ] होकर उनके द्वारा अर्पित भोजनको ग्रहण किया, इस प्रसङ्गको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये॥ ३६॥ श्रीकान्त सेनकी कथा; महाप्रभुके दर्शनके लिये उनका अकेले श्रीक्षेत्रमें गमन :- शिवानन्देर भागिना श्रीकान्त-सेन नाम। प्रभुर कृपाते तेंहो बड़ भाग्यवान् ॥ ३७॥ एक वत्सर तेंहो प्रथम एकेश्वर। प्रभु देखिबारे आइला उत्कण्ठा अन्तर ॥ ३८ ॥ अनुवाद - श्रीशिवानन्द सेनके भाञ्जे जिनका नाम श्रीकान्त-सेन था, वे महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेके कारण बड़े सौभाग्यशाली थे। एक वर्ष वे अकेले ही हृदयमें उत्कण्ठाके कारण महाप्रभुके दर्शनोंके लिये श्रीजगन्नाथपुरी गये ॥ ३७-३८ ॥ अनुभाष्य - 'एकेश्वर',—अकेले, सेवकके बिना ॥ ३८ ॥ उनके प्रति महाप्रभुकी कृपा और आदेश :- महाप्रभु तांरे देखि' बड़ कृपा कैला। मास-दुइ तेंहो प्रभुर निकटे रहिला ॥ ३९ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने उनको देखकर उनपर बहुत कृपा की। श्रीकान्त-सेन दो मास तक महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे ॥ ३९ ॥ गौड़ीय-भक्तोंको पुरी आनेके लिये निषेध-आज्ञा :- तबे प्रभु ताँरे आज्ञा कैला गौड़े याइते। भक्तगणे निषेधिला इहाँके आसिते ॥ ४० ॥ पौषमासमें स्वयं गौड़देशमें जानेका निर्णय :- “ए-वत्सर ताँहा आमि याइमु आपने। ताँहाइ मिलिमु सब अद्वैतादि सने ॥ ४१ ॥ शिवानन्दे कहिह,—आमि एइ पौषमासे। आचम्बिते अवश्य आमि याइब ताँर पाशे ॥ ४२ ॥ जगदानन्द हय ताँहा, तेंहो भिक्षा दिबे। सबारे कहिह,—ए वत्सर केह ना आसिबे ॥” ४३ ॥ अनुवाद-जब श्रीकान्त सेन गौड़देशमें लौटने लगे, तब महाप्रभुने उनके माध्यमसे गौड़देशके भक्तोंको उस वर्ष श्रीजगन्नाथपुरी आनेके लिये निषेध करते हुए कहा,—“इस वर्ष मैं स्वयं गौड़देश आऊँगा, मैं वहींपर ही श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे मिलूँगा। शिवानन्द सेनसे कहना कि मैं इस पौष-मासमें अवश्य अचानक ही उनके पास आऊँगा। जगदानन्द पण्डित वहींपर हैं, वे मेरे लिये भोजनकी व्यवस्था कर देंगे। तुम सभीसे कहना कि इस वर्ष यहाँ कोई भी नहीं आये॥” ४०-४३ ॥ अनुभाष्य - 'इँहाँके',—इस स्थानपर, श्रीपुरुषोत्तम-क्षेत्रमें। 'ताँहा',—गौड़देशमें ॥ ४०-४१ ॥ गौड़देशमें आकर श्रीकान्तके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाको बतलाना, भक्तोंका आनन्दपूर्वक गौड़में ही रहना :- श्रीकान्त आसिया गौड़े सन्देश कहिल। शुनि' भक्तगण-मने आनन्द हइल ॥ ४४ ॥ अनुवाद-श्रीकान्तने गौड़देशमें आकर सभी भक्तोंको महाप्रभुका सन्देश सुनाया। महाप्रभुके सन्देशको सुनकर भक्तोंके मनमें बहुत आनन्द हुआ ॥ ४४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'सन्देश',—संवाद ॥ ४४ ॥ अनुभाष्य - 'सन्देश',—अगले पौषमासमें महाप्रभुके गौड़देशमें आगमनकी वार्त्ता ॥ ४४ ॥ श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्दके द्वारा प्रतिदिन महाप्रभुकी प्रतीक्षा :- चलितेछिला आचार्य, रहिला स्थिर हञा। शिवानन्द, जगदानन्द रहे प्रत्याशा करिया ॥ ४५ ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य अन्य भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ पुरी जानेके लिये तत्पर हो रहे थे, परन्तु वे महाप्रभुके सन्देशको सुनकर रुक गये। श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित भी प्रतिदिन महाप्रभुके आनेकी प्रतीक्षामें वहीं रह गये ॥ ४५ ॥ अनुभाष्य - 'आचार्य',—श्रीअद्वैत प्रभु ॥ ४५ ॥