भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2066, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2066

[ 2/46-57 दूसरा अध्याय 49 पौषमासे आइल दुँहे सामग्री करिया। सन्ध्या-पर्यन्त रहे अपेक्षा करिया ॥ 46 ॥ अनुवाद—जब पौष मास आ गया, तब श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों प्रतिदिन महाप्रभुके अभिवादन और सेवाके लिये सभी प्रकारकी सामग्री प्रस्तुत करके सन्ध्या तक उनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ 46 ॥ महाप्रभुके नहीं आनेके कारण दोनोंका दुःख :- एइमत मास गेल, गोसाञि ना आइला। जगदानन्द, शिवानन्द दुःखित हइला ॥ 47 ॥ अनुवाद—इस प्रकार धीरे-धीरे पौष-मास समाप्त होनेको आया, किन्तु महाप्रभु नहीं आये। श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीशिवानन्द सेन बहुत दुःखी हुए ॥ 47 ॥ अनुभाष्य—'गोसाञि,'—महाप्रभु ॥ 47 ॥ श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीका आगमन तथा उनके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :- आचम्बिते नृसिंहानन्द ताँहाइ आइला। दुँहे ताँरे मिलि' तबे स्थाने बसाइला ॥ 48 ॥ दुँहे दुःखी भावे देखि' कहे नृसिंहानन्द। “तोमा दुँहाकारे केने देखि निरानन्द ? ? ” 49 ॥ अनुवाद—अचानक ही श्रीनृसिंहानन्द (श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी) वहाँ आ गये। वे दोनों (श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित) उनसे मिले और उन्हें एक आसनपर बैठाया। उन दोनोंको दुःखी देखकर श्रीनृसिंहानन्दने पूछा, — “मैं आप दोनोंको दुःखी क्यों देख रहा हूँ?” 48-49 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना :- तबे शिवानन्द ताँरे सकल कहिला। “आसिते आज्ञा दिया प्रभु केने ना आइला ॥” 50 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन्हें सारा वृत्तान्त सुनानेके पश्चात् कहा,—“आनेका सन्देश देकर भी महाप्रभु क्यों नहीं आये ?” 50 ॥ श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आश्वासन तथा प्रबोध-दान :- शुनि' ब्रह्मचारी कहे, — “करह सन्तोषे। आमि त' आनिब ताँरे तृतीय दिवसे ॥” 51 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने कहा, — “आप थोड़ा शान्त रहिये। मैं महाप्रभुको आजसे तीसरे दिन ही यहाँ ले आऊँगा ॥” 51 ॥ श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्द, दोनोंको विश्वास :- ताँहार प्रभाव-प्रेम जाने दुइजने। आनिबे प्रभुरे एबे निश्चय कैला मने ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके प्रभाव एवं महाप्रभुके प्रति उनके प्रेमके विषयमें भली-भाँति जानते थे। इसलिये उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि ये महाप्रभुको अवश्य ही यहाँ ले आयेंगे ॥ 52 ॥ 'नृसिंहानन्द'-नामकी प्राप्तिका कारण :- 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' — ताँर निज-नाम। 'नृसिंहानन्द' - नाम ताँर कैला गौरधाम ॥ 53 ॥ अनुवाद—उनका वास्तविक नाम तो 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' था। श्रीगौरसुन्दरने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम प्रदान किया था ॥ 53 ॥ महाप्रभुको प्रकट करनेकी प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी प्रतिज्ञा और भोग पकानेका प्रयास :- दुइदिन ध्यान करि' शिवानन्देरे कहिल। “पाणिहाटि-ग्रामे आमि प्रभुरे आनिल ॥ 54 ॥ कालि मध्याह्ने तँहो आसिबेन तोमार घरे। पाक-सामग्री आनह, आमि भिक्षा दिमु ताँरे ॥ 55 ॥ तबे ताँरे एथा आमि आनिब सत्वर। निश्चय कहिलाङ, किछु सन्देह ना कर ॥ 56 ॥ ये चाहिये, ताहा कर हुआ तत्पर। अति त्वराय करिब पाक, शुन अतःपर ॥ 57 ॥