श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2068, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/64-74 दूसरा अध्याय 51 हूँ कि आज तो श्रीनृसिंहदेवका उपवास हो गया। यदि ठाकुरजी ही उपवासी रहेंगे, तब फिर दास किस प्रकारसे जीवित रहेगा?” 64-65 ॥ भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास। नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥ 66 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीनृसिंहानन्दके हृदयमें महाप्रभुको समस्त भोग खाते देखकर उल्लास हो रहा था, किन्तु श्रीनृसिंहदेवको लक्ष्य करके वे बाहरसे कुछ दुःखको प्रकट कर रहे थे॥ 66 ॥ महाप्रभुके द्वारा तीनों पात्रोंके भोजनकी लीलाके द्वारा श्रीप्रद्युम्नको समस्त विष्णुतत्त्वोंके साथ अपने अभेद अथवा एक होनेका प्रदर्शन :- स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य-गोसाञि। जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥ 67 ॥ इहा जानिवारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैल मन। ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य-गोसाईं स्वयं भगवान् हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव एवं श्रीनृसिंहदेवके साथ उनका कोई भेद नहीं है, इस बातको समझनेके लिये श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके मनमें प्रबल इच्छा थी। महाप्रभुने इस तथ्यको समझानेके लिये सम्पूर्ण भोजनको ग्रहण किया॥ 67-68 ॥ भोजनके अन्तमें महाप्रभुका पाणिहाटी स्थित राघव-भवनमें नित्य-अवस्थान हेतु गमन :- भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि। सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥ 69 ॥ अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभु पाणिहाटी चले गये। पाणिहाटीमें महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें बनायी गयी व्यञ्जनकी परिपाटीको देखकर बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 69 ॥ श्रीशिवानन्दकी ब्रह्मचारीके दुःखी होनेके कारणकी जिज्ञासा और ब्रह्मचारीके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- शिवानन्द कहे,—“केने करह फुत्कार?” ब्रह्मचारी कहे,—“देख, प्रभुर व्यवहार ॥ 70 ॥ तिनजनार भोग तेंहो अकेला खाइला। जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥” 71 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीसे कहा,—“आप किसलिये दुःख प्रकाश कर रहे हैं?” श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने उत्तर दिया,—“महाप्रभुके व्यवहारको तो देखो, वे तीन प्रभुओंके भोगको अकेले ही खा गये। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव तथा श्रीनृसिंहदेव उपवासी रह गये॥” 70-71 ॥ श्रीशिवानन्दका सन्देह :- शुनि' शिवानन्देर चित्ते हइल संशय। किवा प्रेमावेशे कहे, किवा सत्य हय ॥ 72 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनके चित्तमें संशय हुआ कि श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी यह बात प्रेमके आवेशमें कह रहे हैं अथवा यह बात सत्य है॥ 72 ॥ श्रीशिवानन्दको श्रीनृसिंहके लिये भोगको लानेका आदेश :- तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी। “सामग्री आनह नृसिंहरे, पुनः पाक करि ॥” 73 ॥ अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्द सेनसे कहा,—“आप श्रीनृसिंहदेवके लिये फिरसे भोग-सामग्री लाकर दीजिये, मैं पुनः रसोई बनाऊँगा॥” 73 ॥ श्रीनृसिंहको पुनः भोग समर्पण :- तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला। पाक करि' नृसिंहरे भोग लागाइला ॥ 74 ॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेन पुनः भोग-सामग्री लेकर आये तथा श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने पकवान बनाकर श्रीनृसिंहदेवको भोग लगाया॥ 74 ॥