भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2069, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2069

52 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/75-84 ] अगली वर्षाऋतुके समय गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें गमन :- वर्षान्तरे शिवानन्द लञा भक्तगण। नीलाचले देखे याञा प्रभुर चरण॥ 75॥ अनुवाद—अगले वर्ष महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शनके लिये श्रीशिवानन्द सेन भक्तोंको साथ लेकर नीलाचल श्रीजगन्नाथपुरीमें गये॥ 75॥ एकदिन महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंहानन्दके पूर्वोक्त भोजनके वृत्तान्तका वर्णन :- एकदिन सभाते प्रभु बात चालाइला। नृसिंहानन्देर गुण कहिते लागिला॥ 76॥ “गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन। कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्टान्न-व्यञ्जन॥" 77॥ अनुवाद—एकदिन भक्तोंकी सभामें बातचीत करते हुए महाप्रभु प्रसङ्ग उठाकर श्रीनृसिंहानन्दके गुणोंका वर्णन करने लगे,—“पिछले वर्ष पौष मासमें नृसिंहानन्दने मुझे भोजन कराया था। मैंने वैसे मिष्टान्न और व्यञ्जन पहले कभी नहीं खाये थे॥" 76-77॥ अनुभाष्य—'बात चालाइला',—प्रसङ्ग उठाया॥ 76॥ महाप्रभुके वचनोंसे श्रीशिवानन्दका पूर्व-सन्देह भङ्ग :- शुनि' सभ्यगण मने आश्चर्य मानिल। शिवानन्देर मने तबै प्रत्यय जन्मिल॥ 78॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ और श्रीशिवानन्द सेनके मनमें दृढ़ विश्वास उत्पन्न हुआ कि वह घटना सत्य थी॥ 78॥ चार स्थानोंपर महाप्रभुका 'नित्य-आविर्भाव' :- एइमत शचीगृहे सतत भोजन। श्रीवासेर गृहे करेन कीर्त्तन-दर्शन॥ 79॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीशचीमाताके घरमें सदा भोजन करते तथा श्रीवास पण्डितके घरमें कीर्तनके समय वहाँ उपस्थित होते॥ 79॥ नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' बारे बारे। 'निरन्तर आविर्भाव' राघवेर घरे॥ 80॥ अनुवाद—महाप्रभु बार-बार आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यको देखते तथा श्रीराघव पण्डितके घरमें भी उनका 'निरन्तर आविर्भाव' होता॥ 80॥ भक्तोंके प्रेमके वशीभूत श्रीगौरसुन्दर :- प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम। प्रेमवश हञा ताहा देन दरशन॥ 81॥ अनुवाद—श्रीगौराङ्ग महाप्रभु प्रेमके वशीभूत हैं। वे जहाँ कहींपर भी उत्तम प्रेमको देखते हैं, वहींपर ही प्रेमके वशीभूत होकर दर्शन देते हैं॥ 81॥ श्रीशिवानन्दका अनिर्वचनीय गौरप्रेम :- शिवानन्देर प्रेमसीमा के कहिते पारे? याँर प्रेमे वश प्रभु आइसे बारे बारे॥ 82॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके प्रेमकी सीमाका कौन वर्णन कर सकता है? जिनके प्रेमके वशीभूत होकर महाप्रभु बार बार उनके निकट आते हैं॥ 82॥ श्रीगौरके 'आविर्भाव'के श्रवणसे श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाको जानना :- एइ त' कहिलु गौरेर 'आविर्भाव'। इहा येइ शुने, जाने चैतन्य-प्रभाव॥ 83॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके [नित्य और कभी-कभी] 'आविर्भाव'के विषयमें वर्णन किया। इसे जो कोई भी श्रवण करता है, वह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको जान जाता है॥ 83॥ अन्य प्रसङ्ग-वर्णन, भगवान् आचार्यका वृत्तान्त-वर्णन :- पुरुषोत्तमे प्रभु-पाशे भगवान् आचार्य। परम वैष्णव तँहो सुपण्डित आर्य॥ 84॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके पास भगवान् आचार्य रहते थे, वे परम वैष्णव, सुविद्वान और सज्जन व्यक्ति थे॥ 84॥

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