श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2070, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/84-91 दूसरा अध्याय 53 ]
अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—आदिलीलाकी 10/136 संख्या देखें ॥ 84 ॥ सख्यभावाक्रान्त-चित्त, गोप-अवतार। स्वरूप-गोसाञि-सह सख्य-व्यवहार ॥ 85 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यका चित्त सख्य-भावसे विभावित था, क्योंकि वे व्रजलीलाके गोपबालकके अवतार थे। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ भी उनका सख्य व्यवहार था ॥ 85 ॥ बीच-बीचमें अपने घरपर रसोई बनाकर एकमात्र महाप्रभुको ही निमन्त्रण :— एकान्तभावे आश्रियाछेन चैतन्यचरण। मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करेन निमन्त्रण ॥ 86 ॥ अनुवाद—उन्होंने एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किया हुआ था। बीच-बीचमें वे रसोई बनाकर श्रीचैतन्य महाप्रभुको निमन्त्रण भी किया करते थे ॥ 86 ॥ घरे भात करि' करेन विविध व्यञ्जन। एकले गोसाञि लञा करान भोजन ॥ 87 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्य अपने घरमें अनेक प्रकारके पकवान बनाते थे और वे महाप्रभुको अकेले ले जाकर उनको ही भोजन कराते थे ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—'घरे भात करि'—श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादको मँगवाकर उसके द्वारा अपने परिवारके सदस्यों, भिक्षुकों तथा निमन्त्रित व्यक्तियोंको तृप्त करनेके स्थानपर उन्हें घरपर भोजन करवाने हेतु चावल आदि अर्थात् साधारण द्रव्य आदि बनानेको 'घरभात' कहते हैं। उड़ीसामें 'आमानी' एवं 'प्रसादी'—दो शब्दोंका व्यवहार होता है; श्रीजगन्नाथदेवके उद्देश्यसे बनाये गये नैवेद्य-भोगके समर्पित होनेपर वह 'प्रसाद' एवं साधारण खाद्य वस्तुओंको पकानेपर वह 'आमानी' अर्थात् श्रीजगन्नाथदेवका 'उच्छिष्ट नहीं' है, ऐसा समझना होगा ॥ 87 ॥
भगवान् आचार्य एवं उनके पिता और छोटे भाईका चरित्र :— ताँर पिता 'विषयी' बड़ शतानन्द-खाँन। 'विषयविमुख' आचार्य—'वैराग्यप्रधान' ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके पिता शतानन्द खाँन बहुत ही अधिक 'विषयी' अर्थात् धनवान् थे, किन्तु श्रीभगवान् आचार्य धन-सम्पत्तिसे विरक्त थे। उनका जीवन वैराग्यपूर्ण था ॥ 88 ॥ 'गोपाल-भट्टाचार्य' नाम, ताँर छोट भाइ। काशीते वेदान्त पड़ि' गेला आचार्य ठाञि ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके छोटे भाईका नाम गोपाल भट्टाचार्य था, वह काशीमें वेदान्त पढ़कर श्रीभगवान् आचार्यके घर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आया ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—'वेदान्त',—यहाँपर वेदान्त या शारीरक सूत्रका तात्पर्य शङ्कराचार्य-कृत निर्विशेष-ब्रह्मपरक भाष्यसे है। 'आचार्य',—बड़े भाई श्रीभगवान् आचार्य ॥ 89 ॥ आचार्य ताहारे प्रभुपदे मिलाइला। अन्तर्यामी प्रभु चित्ते सुख ना पाइला ॥ 90 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने अपने छोटे भाईको महाप्रभुसे मिलवाया। अन्तर्यामी महाप्रभुको गोपाल भट्टाचार्यसे मिलकर हृदयमें आनन्द नहीं हुआ ॥ 90 ॥ शुद्धकृष्णभजनसे ही गौर-प्रीति, अभक्तकी भक्ति विरोधी बिद्धा-चेष्टासे महाप्रभुके द्वारा उसका अनादर :— आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे प्रीत्याभास। कृष्णभक्ति बिना प्रभुर ना हय उल्लास ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीभगवान् आचार्यके भाई होनेके कारण उसके प्रति बाहरमें प्रसन्नता दिखलायी, किन्तु जिसके हृदयमें श्रीकृष्णभक्ति न हो, उससे मिलनेपर महाप्रभुको उल्लास नहीं होता ॥ 91 ॥