श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें54 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/92-98 ] एकदिन श्रीस्वरूपको अपने छोटे भाईके मुखसे शाङ्कर- मायावाद-भाष्यके श्रवणके लिये आचार्यका अनुरोध :- स्वरूपेरे आचार्य कहे आर दिने। “वेदान्त पड़िया गोपाल आसियाछे एखाने ॥ 92 ॥ सबे मेलि' आइस, शुनि 'भाष्य' इहार स्थाने।” प्रेम-क्रोध करि' स्वरूप बलय वचने ॥ 93 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा तिरस्कार :- “बुद्धिभ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर सङ्गे। मायावाद शुनिवारे उपजिल रङ्गे ॥ 94 ॥ समस्त वैष्णवोंके गुरु श्रीदामोदर-स्वरूपके द्वारा मायावादके दोषोंका वर्णन और उसकी निन्दा; शङ्करके मायावाद-भाष्यके प्रति शुद्धविष्णुभजन करनेके इच्छुक व्यक्तिके व्यवहारकी विधि :- वैष्णव हञा येबा शारीरक-भाष्य शुने। सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' आपनारे 'ईश्वर' माने ॥ 95 ॥ अनुवाद—एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे कहा, - “मेरा भाई गोपाल काशीसे वेदान्त पढ़कर यहाँ आया है। हम सब मिलकर उससे वेदान्तके भाष्यका श्रवण करेंगे।” श्रीभगवान् आचार्यके प्रति प्रेम होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने क्रोध करते हुए कहा, –“गोपालका सङ्ग करनेसे तुम्हारी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी है, इसलिये तुम मायावाद सिद्धान्त सुननेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हो। वैष्णव होकर भी जो वेदान्तके शारीरक-भाष्यका श्रवण करता है, वह सेव्य और सेवकके भावको छोड़कर स्वयंको ही 'ईश्वर' मानने लगता है ॥ 92-95 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'शारीरक-भाष्य', - श्रीमत् शङ्कराचार्य-कृत वेदान्त-सूत्र-भाष्य ॥ 95 ॥ अनुभाष्य-केवलाद्वैतवादी शङ्करने कल्पनाका आश्रय लेकर शारीरक-ब्रह्मसूत्र-भाष्यमें 'मायावाद' अथवा 'बिद्ध केवलाद्वैतवाद'की स्थापना की है; किन्तु ब्रह्मसूत्रके श्रीसम्प्रदायी श्रीरामानुज-कृत श्रीभाष्यमें 'विशिष्टाद्वैतवाद', ब्रह्म-सम्प्रदायी श्रीमध्व-कृत पूर्णप्रज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद', चतुःसन-सम्प्रदायी श्रीनिम्बार्क-कृत पारिजात-सौरभ-भाष्यमें 'द्वैताद्वैतवाद' एवं रुद्रसम्प्रदायी श्रीविष्णुस्वामि-कृत सर्वज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद' वेदान्त-तात्पर्य कहा गया है एवं उनमें सेव्य-सेवक-भाव विद्यमान रहनेके कारण ये-भगवान् विष्णुके भक्तोंके लिये पठनीय एवं उनमें निहित तत्त्वसमूह - सत्-सम्प्रदायके द्वारा अर्थात् वैष्णवोंके द्वारा चिरकालसे अत्यन्त आदरणीय हैं। आदिलाला 7/101 संख्याका अनुभाष्य देखें। ब्रह्मसूत्र अथवा वेदान्तकी व्याख्यामें बिद्ध केवलाद्वैतवाद अथवा निर्विशेषब्रह्म- मत-स्थापन हेतु प्रयास करनेपर, वह पूर्णतया शुद्धभक्तिके विरुद्ध कुमतवाद मात्र है ॥ 95 ॥ मायावाद-विषकी तीव्रताका वर्णन और श्रवणसे पतनकी आशङ्का :- महाभागवत, कृष्ण प्राणधन याँर। मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर ॥” 96 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके प्राणधन- कृष्ण हैं, ऐसे जो महाभागवत हैं, वे भी यदि मायावादपूर्ण शारीरकभाष्यको श्रवण करें, तब उनका चित्त भी उस ओर झुककर भक्तिसे च्युत हो जाता है ॥” 96 ॥ आचार्यके द्वारा अपनी श्रीकृष्ण-निष्ठाकी प्रशंसा :- आचार्य कहे, –“आमा सबार कृष्णनिष्ठ-चित्ते। आमा-सबार मन भाष्य नारे फिराइते ॥” 97 ॥ अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्यने कहा, - “हम सबका चित्त तो कृष्णनिष्ठ है, इसलिये शारीरक भाष्य हम सबके मनको विचलित नहीं कर सकता ॥” 97 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा शुद्धभक्तोंके हृदयविदारक मायावादके अर्थका निरूपण :- स्वरूप कहे, –“तथापि मायावाद-श्रवणे। 'चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या'- एइमात्र शुने ॥ 98 ॥