श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें56 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/108-116 ] स्नेहे रान्धिल प्रभुर प्रिय ये व्यञ्जन। देउल-प्रसाद, आदा-चाकि, लेम्बु-सलवण ॥ 108 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने बहुत प्रेमसे महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले पकवान बनाये। उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद और पचानेके लिये घिसी हुई अदरक, नींबूके साथ नमक एकत्रित करके रखे ॥ 108 ॥ अनुभाष्य— देउल प्रसाद,—देवालयका प्रसाद अर्थात् श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे लाया गया महाप्रसाद ॥ 108 ॥ महाप्रभुके द्वारा भोजन और सूक्ष्म-चावलकी प्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :— मध्याह्ने आसिया प्रभु भोजने बसिला। शाल्यन्न देखि' प्रभु आचार्ये पुछिला ॥ 109 ॥ “उत्तम अन्न एत तण्डुल काँहाते पाइला ?” आचार्य कहे,—माधवी-पाश मागिया आनिला ॥ 110 ॥ अनुवाद—मध्याह्नके समय महाप्रभु श्रीभगवान् आचार्यके स्थानपर आकर भोजनके लिये बैठे। भोजनमें श्वेत पतले चावलोंको देखकर महाप्रभुने उनसे पूछा,—“ये बड़े उत्तम चावल हैं, इतने चावल तुम्हें कहाँसे मिले ?” श्रीभगवान् आचार्यने उत्तर दिया, —‘माधवी देवीसे माँगकर लाये गये हैं ॥'109-110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'शाल्यन्न',—श्वेत पतले चावल ॥ 109 ॥ आचार्यके द्वारा माधवी और छोटे-हरिदासके नामका उल्लेख :— प्रभु कहे,—“कोन् याइ' मागिया आनिल ?” छोट हरिदासेर नाम आचार्य कहिल ॥ 111 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“कौन जाकर माँगकर लाया है ?” श्रीभगवान् आचार्यने छोटे-हरिदासका नाम बताया ॥ 111 ॥ भोजनके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दको छोटे- हरिदासके अपने घरमें प्रवेशके लिये निषेध-आज्ञा :— अन्न प्रशंसिया प्रभु भोजने बसिला। निजगृहे आसि' गोविन्देरे आज्ञा दिला ॥ 112 ॥ “आजि हैते एइ मोर आज्ञा पालिबा। छोट हरिदासे इँहा आसिते ना दिबा ॥”113 ॥ अनुवाद—चावलोंकी प्रशंसा करके बैठकर महाप्रभुने भोजन किया। तब अपने वासस्थानपर आकर उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“आजसे मेरी इस आज्ञाका पालन करना—छोटे-हरिदासको यहाँ मत आने देना ॥”112-113 ॥ हरिदासका गम्भीर दुःख और उपवास :— द्वार-माना, हरिदास दुःखी हैल मने। कि लागिया द्वार-माना केह नाहि जाने ॥ 114 ॥ अनुवाद—'महाप्रभुका द्वार मेरे लिये बन्द हैं'—ऐसा सुनकर छोटे-हरिदासका मन बहुत दुःखी हुआ। कोई नहीं समझ पाया कि छोटे-हरिदासको वहाँ आनेके लिये मना क्यों किया है ॥ 114 ॥ तिन दिन हरिदास करे उपवास। स्वरूपादि सबे पुछिला प्रभुर पाश ॥ 115 ॥ महाप्रभुके निकट जाकर श्रीस्वरूप आदिके द्वारा हरिदासके प्रवेश-निषेधके कारणकी जिज्ञासा :— “कोन् अपराध प्रभु, कैल हरिदास ? कि लागिया द्वार-माना, करे उपवास ?”116 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासने तीन दिन तक उपवास किया। तब श्रीस्वरूप दामोदर आदि सभी भक्तों ने महाप्रभुसे पूछा,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदासने कौन-सा अपराध किया है ? आपने किस कारणसे उसे अपने द्वारपर आनेके लिये मना किया है ? वह तीन दिनसे उपवास कर रहा है ॥”115-116 ॥