भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2074, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2074

[ 2/117-119 दूसरा अध्याय 57 स्त्रीसे बातचीत करनेवाले वैरागीके प्रति महाप्रभुका असन्तोष :- प्रभु कहे,–“वैरागी करे प्रकृति सम्भाषण। देखिते ना पारों आमि ताहार वदन ॥ 117 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो वैरागी होकर स्त्रीसे सम्भाषण अर्थात् भोगमय बुद्धिसे वार्तालाप करता है, मैं उस व्यक्तिका मुख नहीं देख सकता ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वैष्णव, या तो गृहस्थ होकर स्त्री-परिवारके साथ रहेंगे, अन्यथा स्त्री-सम्बन्धको परित्याग करके 'वैरागी' होंगे। वैरागी होनेपर फिर स्त्रियोंका दर्शन अथवा उनसे वार्तालाप करनेका अधिकार नहीं रहता। पापवासनाके नहीं रहनेपर भी अथवा बाहरी रूपसे किसी भक्तिके कार्यको उद्देश्य करनेपर भी उस प्रकारसे [स्त्रीके साथ सम्बन्ध-युक्त होना] वैरागीका कर्त्तव्य नहीं है। इसलिये वैरागी होकर जो व्यक्ति स्त्रीसे सम्भाषण करता है, धर्मका नाश करनेवाला होनेके कारण उसका मुख मैं देख नहीं पाऊँगा ॥ 117 ॥ अनुभाष्य—'सरलता'—वैष्णवका प्रधान लक्षण है, एवं 'कपटता'—भक्तिकी विरोधी विशेष उपशाखा है। श्रीकृष्णसे आसक्ति होनेपर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंसे विरक्त होकर भक्त जड़़ीय-भोगमय-दर्शनसे उत्पन्न विषयोंका त्याग करता है। किन्तु लोगोंकी दृष्टिमें उसकी [श्रीकृष्णके प्रति] वैसी आसक्ति प्रमाणित हो जानेके पश्चात् भी पुनः कपटताके प्रकाशित होनेपर लोग उसके व्यवहारके प्रति श्रद्धा नहीं कर पाते ॥ 117 ॥ जड़़ीय इन्द्रियोंका भोग-उन्मुखतारूपी स्वभाव और स्त्री-दर्शनका विषममय फल :- दुर्वार इन्द्रिय करे विषय-ग्रहण। दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि मन ॥ 118 ॥ अनुवाद—इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण करनेसे निरोध करना इतना कठिन है कि लकड़ीसे बनी स्त्रीकी मूर्ति भी मुनि तकके मनको हरण कर लेती है ॥ 118 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि मन',—लकड़ीसे बनी नारी भी मुनिके मनका हरण कर सकती है, अतएव वैरागी व्यक्ति स्त्रीसे सम्बन्धका अवश्य ही त्याग करेंगे ॥ 118 ॥ अनुभाष्य—रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श,—इन पाँच विषयोंको ग्रहण करना ही क्रमशः नेत्र, कान, नाक, जिह्वा और त्वचारूपी पाँच इन्द्रियोंका स्वभाव है। बद्धजीवोंमें-से किसी-किसीके द्वारा स्वयंको इन्द्रियोंके दमन करनेमें समर्थ समझनेपर भी वास्तवमें बहिर्मुखताके कारण उसके लिये इन्द्रियोंका दमन करना अति कठिन है। भोगमय दर्शनसे विषयोंके उपस्थित होनेपर प्राकृत-बुद्धिसम्पन्न मानव मुनिधर्मको ग्रहण करनेपर भी लकड़ीसे बनी नारीकी मूर्तिको देखकर ही क्षुब्ध तथा चञ्चल हो जाता है ॥ 118 ॥ अग्नि और घीकी भाँति पुरुष अभिमानीके लिये स्त्री-सङ्ग-निषेध :- श्रीमद्भागवत (9/19/17)में और मनुसंहिता (2/215) में— मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो वसेत्। बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ 119 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—माताके साथ, बहनके साथ एवं पुत्रीके साथ निर्जनमें कभी भी मत रहना; क्योंकि बलवान् इन्द्रियाँ विद्वान पुरुषके भी मनको आकर्षित कर सकती हैं ॥ 119 ॥ अनुभाष्य—महाराज ययाति कामके वशीभूत और स्त्रीके द्वारा पराजित होकर ग्राम्य विषयसमूह भोग करते-करते अपने सर्वनाशको समझकर अन्तमें निर्वेदयुक्त होकर पत्नी देवयानीको अपने चरित्र और व्यवहारका वर्णन करते हुए स्त्री-सङ्गकी निन्दा कर रहे हैं— मात्रा (जनन्या) स्वस्रा (भगिन्या) दुहित्रा (कन्यया वा सह) अविविक्तासनः (अविविक्तं सङ्कीर्णम् आसनं यस्य सः तथाभूतः) न वसेत् (भवेत् इति पाठान्तरम्; यतः) बलवान् (प्रचुरबल-