श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें58 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/119-123 ] विशिष्टः) इन्द्रियग्रामः (इन्द्रियसमूहः) विद्वांसं (बन्धमोक्षवित्- पुरुषम्) अपि कर्षति (आकर्षति, बन्धाय नियोजयति)। श्लोक-भावानुवाद—माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ सटकर नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि प्रचुर बलयुक्त इन्द्रियाँ बन्धन और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको भी आकर्षित कर लेती हैं अर्थात् उसे बन्धनमें नियोजित कर देती हैं॥ 119॥ श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी तृप्तिके विधानको छोड़नेपर ही अनधिकारी कृत्रिम-वैरागीका पुरुषाभिमानमें प्रकृतिका भोग एवं बाहरी वेषके आश्रयमें कृत्रिम अस्थिर वैराग्य हेतु जिह्वा-उदर-उपस्थ लाम्पट्य :- क्षुद्रजीव सब मर्कट-वैराग्य करिया। इन्द्रिय चराञा बुले 'प्रकृति' सम्भाषिया॥ ”120 ॥ अनुवाद—अनेक लोग संसारमें विषयोंको प्राप्त करनेमें असफल होकर वैरागीका वेश धारण करके मर्कट-वैराग्य (मध्यलीला 16/238 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) प्रदर्शित करते हैं। वे इन्द्रियोंके वशीभूत होकर इधर-उधर भ्रमण करते हुए स्त्रियोंसे सम्भाषण करते हैं॥ ”120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधनभक्तिका विवेचन करते करते भावके उदित होनेपर जिस पुरुषमें विरक्ति उत्पन्न होती है, उसका ही वैराग्यमें अधिकार है। उस अवस्थाको प्राप्त करनेसे पहले जो 'भेक' (वैरागी-वेष) ग्रहण करते हैं, उन्हींके वैराग्यका नाम 'मर्कटवैराग्य' है। अनधिकारी जीव किसी-न-किसी कारणसे अनुचित समयपर वैराग्य ग्रहण करके उसके बाद इन्द्रियोंके वशीभूत होकर प्रकृति अर्थात् स्त्रियोंके साथ सम्भाषण करने लगता है। इन्हें धर्मध्वजी अथवा धर्मके नामपर कलङ्क जानकर अवश्य ही दूर रखना चाहिये॥ 120॥ अनुभाष्य—'मर्कट',—सौत्र मर्क (गत्यर्थक)+अटन् कर्तृवाच्ये,—चञ्चल, अस्थिर; 'इन्द्रिय चराञा',—इन्द्रियोंके वशीभूत होकर; 'बुले',—भ्रमण करता है। बाहरसे वैराग्य दिखलाकर जो लोगोंसे सम्मान संग्रह करते हैं एवं विषय-भोगवासनासे निर्मुक्त हृदयवाले नहीं हो सकनेके कारण स्त्रियोंके साथ भोगबुद्धिसे वार्तालाप करके स्वयंको 'पुरुष' मानकर आठ प्रकारसे स्त्रियोंके सङ्गकी वासना करते हैं, ऐसे प्राकृत-सहजिया जीव कभी भी 'महत्'-शब्दसे सम्बोधन योग्य नहीं हैं। विवित्सा अथवा धीर-संन्यासियोंमें स्त्री-सम्भाषणरूप अपराध—उनके स्वयंके लिये विशेष रूपसे अमङ्गलका कारण है, किन्तु श्रीरामानन्द आदि प्रमुख 'विद्वत्' अथवा 'नरोत्तम'-संन्यासी परमहंसोंको यदि कोई अक्षजज्ञानी [जिनका ज्ञान इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञान तक ही सीमित है] अपने दुर्भाग्यवशातः स्त्री-सम्भाषी समझें, तब उनका पतन अवश्यम्भावी है॥ 120॥ महाप्रभुका क्रोधके आवेशमें स्थानका त्याग, सभी भक्तोंके द्वारा मौन धारण :- एत कहिं महाप्रभु अभ्यन्तरे गेला। गोसाञिर आवेश देखि' सबे मौन हैला॥ 121 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु भीतर चले गये। उनके क्रोधके आवेशको देखकर सभी मौन हो गये॥ 121 ॥ अनुभाष्य—'आवेश',—क्रोधका आवेश॥ 121 ॥ अगले दिन हरिदासके लिये भक्तोंका महाप्रभुके निकट आवेदन :- आर दिने सबे मेलि' प्रभुर चरणे। हरिदास लागि' किछु कैला निवेदने ॥ 122 ॥ “अल्प अपराध, प्रभु, करह प्रसाद। एबे शिक्षा हइल, ना करिबे अपराध ॥ ”123 ॥ अनुवाद—अगले दिन सभी भक्तोंने मिलकर छोटे-हरिदासके लिये महाप्रभुके चरणोंमें कुछ निवेदन किया,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदाससे थोड़ा अपराध हो गया है, आप उसपर कृपा कीजिये। अब उसे अच्छी शिक्षा मिल गयी है, वह अब पुनः अपराध नहीं करेगा॥ ”122-123 ॥