भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2076, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2076

[ 2/123-132 दूसरा अध्याय 59 अमृतप्रवाह भाष्य- 'अल्प अपराध',- माधवी देवीके पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेमें छोटे-हरिदासका अन्य कोई उद्देश्य नहीं था, केवल महाप्रभुकी सेवासुख-वासना ही थी, तथापि उस कार्यमें एक अपराध हुआ था। वैरागीका वेश लेकर पुनः स्त्रियोंके साथमें सम्भाषण करना जो एक अपराध है, वह यद्यपि वैरागीके लिये महत् अपराध है, किन्तु प्रभुकी सेवाके लिये उस प्रकारके अपराधको 'सामान्य' कहकर भी कहा जा सकता है ॥ 123 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुकी निरपेक्षता और वज्रसे भी अधिक कठोरता :- प्रभु कहे,- “मोर वश नहे मोर मन। प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे स्पर्शन ॥ 124 ॥ महाप्रभुका तीव्र शासन :- निज कार्ये याह सबे, छाड़ वृथा कथा। कह यदि पुनः, आमा ना देखिबे हेथा ॥" 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मेरा मन मेरे वशमें नहीं है। वह स्त्रीसे सम्भाषण करनेवाले वैरागीका स्पर्श नहीं करना चाहता। व्यर्थकी बातें छोड़कर सभी अपने-अपने कामपर जाओ। यदि पुनः आप लोगोंने ऐसी बात कही तो फिर मुझे यहाँपर कभी नहीं देखोगे ॥” 124-125 ॥ महाप्रभुके वचन सुनकर सभीको भय और लज्जा :- एत शुनि' सबे निज-कर्णे हस्त दिया। निज-निज कार्ये सबे गेल त' उठिया ॥ 126 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सबने अपने कानोंको हाथोंसे ढक लिया और सभी उठकर अपने-अपने कामपर चले गये ॥ 126 ॥ दुर्बोध्य महाप्रभुकी लीलाका तात्पर्य :- महाप्रभु मध्याह्न करिते चलि' गेला। बुझन ना याय एइ महाप्रभुर लीला ॥ 127 ॥ अनुवाद-महाप्रभु भी मध्याह्नके कृत्य करनेके लिये चले गये। महाप्रभुकी इस लीलाको कोई भी समझ नहीं पा रहा था ॥ 127 ॥ हरिदासके लिये श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके द्वारा महाप्रभुके समीप आवेदन :- आर दिन सबे परमानन्दपुरी-स्थाने। 'प्रभुके प्रसन्न कर'-कैला निवेदने ॥ 128 ॥ अनुवाद-अगले दिन सभी भक्त श्रीपरमानन्द पुरीके स्थानपर गये और उनसे निवेदन किया,- 'आप ही महाप्रभुको शान्त कीजिये ॥' 128 ॥ तबे पुरी-गोसाञि एका प्रभुस्थाने आइला। नमस्करि' प्रभु ताँरे सम्भ्रमे बसाइला ॥ 129 ॥ अनुवाद-तब श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामी अकेले महाप्रभुके वासस्थानपर आये। महाप्रभुने उन्हें प्रणाम करके आदरसहित बैठाया ॥ 129 ॥ पुछिला,- “कि आज्ञा, केने हैल आगमन ?” हरिदासे प्रसाद लागि' कैला निवेदन ॥ 130 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - “मेरे लिये क्या आदेश है? आपका किस उद्देश्यसे आगमन हुआ है?" श्रीपरमानन्द पुरीने निवेदन करते हुए कहा कि 'छोटे-हरिदासके प्रति आप कृपा करें'- मैं इस उद्देश्यसे आया हूँ ॥ 130 ॥ महागम्भीर महाप्रभुके द्वारा असन्तुष्ट चित्तके कारण श्रीगोविन्दके साथ पुरी त्याग करके आलालनाथ जानेके भयका प्रदर्शन :- शुनिया कहेन प्रभु, - “शुनह, गोसाञि। सब वैष्णव लञा तुमि रह एइ ठाञि ॥ 131 ॥ मोरे आज्ञा हय, मुञि याङ आलालनाथ। एकले रहिब ताँहा, गोविन्द-मात्र साथ ॥" 132 ॥ अनुवाद-श्रीपरमानन्दपुरीकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,- “हे गोसाईं, सुनिये ! आप सभी वैष्णवोंके साथ मिलकर यहीं रहिये। मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं