भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2077, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2077

60 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/131–142 ] आलालनाथ चला जाऊँ। मैं वहाँ अकेला रहूँगा, केवल गोविन्दको अपने साथ ले जाऊँगा॥"131–132॥ एत बलि' प्रभु यदि गोविन्दे बोलाइला। पुरीरे नमस्कार करि' उठिया चलिला ॥ 133 ॥ अनुवाद—यह कहकर तभी महाप्रभुने श्रीगोविन्दको बुलाया और श्रीपरमानन्द पुरीको प्रणाम करके उठकर चल दिये॥ 133 ॥ श्रीपुरी-गोस्वामीको लज्जा और भय एवं दैन्यपूर्वक महाप्रभुको घरमें लौटाकर लाना :— आस्ते-व्यस्ते पुरी गोसाञि प्रभु-आगे गेला। अनुनय करि' प्रभुरे घरे फिराइला ॥ 134 ॥ अनुवाद—शीघ्रतासे श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं महाप्रभुके आगे गये और अनुनय-विनय करके महाप्रभुको उनके वासस्थानमें लौटा लाये॥ 134 ॥ श्रीपुरीके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति और अपने स्थानपर लौटना :— “तोमार ये इच्छा कर, स्वतन्त्र ईश्वर। केबा कि बलिते पारे तोमार उपर ? ? 135॥ लोकहित लागि' तोमार सब व्यवहार। आमि सब ना जानि गम्भीर हृदय तोमार ॥” 136 ॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरीने कहा,—“आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी जैसी इच्छा हो आप वैसा ही कीजिये। आपके ऊपर कौन क्या कह सकता है? आपके सभी व्यवहार लोगोंके हितके लिये ही हैं। हम उन सबको नहीं समझ सकते, क्योंकि आपके हृदयके विचार अति गम्भीर हैं॥” 135–136 ॥ विफल-मनोरथ होकर भक्तोंका हरिदासके समीप जाना :— एत बलि' पुरी-गोसाञि गेला निज-स्थाने। हरिदास-स्थाने गेला सब भक्तगणे ॥ 137 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी अपने स्थानपर लौट गये। सभी भक्त मिलकर छोटे-हरिदासके स्थानपर गये॥ 137 ॥ श्रीस्वरूप-गोस्वामीके द्वारा हरिदासको आशा और सान्त्वना देना :— स्वरूप-गोसाञि कहे,—“शुन, हरिदास। सबे तोमार हित वाञ्छि, करह विश्वास ॥ 138 ॥ प्रभु हठ पड़ियाछे स्वतन्त्र ईश्वर। कभु कृपा करिबेन दयालु अन्तर ॥ 139 ॥ तुमि हठ कैले ताँर हठ से बाड़िबे। स्नान-भोजन कैले, आपने क्रोध याबे ॥” 140 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने कहा,—“हे हरिदास, सुनो! हम सब तुम्हारा हित चाहते हैं, तुम हमारी बातपर विश्वास करो। महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं, अभी उन्होंने हठ पकड़ ली है। कभी-न-कभी तो वे अवश्य ही तुमपर कृपा करेंगे, क्योंकि उनका हृदय तो भीतरसे दयासे पूर्ण है। यदि तुम हठ करोगे, तो फिर उसे देखकर महाप्रभुका हठ भी बढ़ जायेगा। इसलिये तुम स्नान तथा भोजन करो। धीरे-धीरे महाप्रभुका क्रोध भी स्वयं ही दूर हो जायेगा॥” 138–140 ॥ अनुभाष्य—'हठ',—बलका प्रयोग, ज़िद॥ 139 ॥ एत बलि' तारे स्नान-भोजन करावा। आपन भवन आइला तारे आश्वासिया ॥ 141 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने छोटे-हरिदासको स्नान तथा भोजन करनेके लिये प्रेरित किया और उन्हें आश्वासन देकर वे अपने स्थानपर लौट गये॥ 141 ॥ दूर रहकर हरिदासके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :— प्रभु यदि यान जगन्नाथ-दरशने। दूरे राहि' हरिदास करेन दर्शने ॥ 142 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 2077, कुल 2549 में से · BharatKosha