भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2078, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2078

[ 2/142-147 दूसरा अध्याय 61 लिये जाते, तब छोटे-हरिदास दूरमें रहकर ही उनके दर्शन करते ॥ 142 ॥ धर्मसेतु धर्मरक्षक महाप्रभुका परम कारुण्य :- महाप्रभु-कृपासिन्धु, के पारे बुझिते? निज-भक्ते दण्ड करेन धर्म बुझाइते ॥ 143 ॥ अनुवाद-महाप्रभु कृपाके सिन्धु हैं, इसे कौन समझ सकता है? जगत्में धर्मकी शिक्षा देनेके लिये वे अपने भक्त तकको दण्ड प्रदान करते हैं॥ 143 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि कपटतापूर्वक अवैध स्त्री-सङ्ग भी पापोंमें-से एक पाप मात्र है, तथापि जगतवासियोंको दो मुख्य शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने अपने भक्त हरिदासको दण्ड प्रदान किया-(1) वास्तविक वैष्णवोंकी त्रिगुणातीत अप्राकृत परमोच्च स्थिति है एवं (2) भविष्यकालके बिद्ध प्राकृत-सहजिया आदि उपधर्म और अपधर्मका पालन करनेवाले नारकी व्यक्तियोंका व्यवहार अत्यन्त अधर्मकी नींवके ऊपर बना हुआ और शुद्ध वैष्णव धर्मके सम्पूर्ण विपरीत और स्वतन्त्र है। श्रीमाधवी देवी-उच्चाधिकारिणी महाभागवत हैं; उनके पास जाकर चावलकी भिक्षा ग्रहण करना हरिदास जैसे प्रभु-पार्षदका अवैध-कार्य नहीं होनेपर भी भविष्यमें ऐसे उदाहरण अथवा आदर्शका अनुकरण करके अनेक लोग शठता और कपटताका विस्तार करके कलिजनोचित अवैष्णव-मतका प्रचार कर सकते हैं, - उसको रोकनेके उद्देश्यसे जगद्गुरु लोकशिक्षक भगवान्की यह हरिदास-सम्बन्धिनी दण्ड-लीला है। श्रीगौरसुन्दरने असामान्य दयाके सागर होनेपर भी कलियुगके जीवोंकी दुर्बलताको समझकर ही इस प्रकारके सङ्गत्याग रूपी सुकठोर दण्डका विधान करके अमन्दोदया-दयाकी पराकाष्ठाको प्रदर्शित किया ॥ 143 ॥ छोटे हरिदासके दण्डको देखकर साधकोंका पुरुष अथवा भोक्ताके अभिमानसे इन्द्रिय-तर्पणके उद्देश्यसे भोगमय नेत्रोंसे भोग्य-स्त्री-दर्शनका त्याग :- देखि' त्रास उपजिल सब भक्तगणे। स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री-सम्भाषणे ॥ 144 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदासको दिये जा रहे दण्डको देखकर सभी भक्तोंके हृदयमें भय उत्पन्न हो गया। इसलिये सभीने स्वप्न तकमें भी स्त्रीके साथ सम्भाषण करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'त्रास उपजिल सब भक्तगणे',- वैरागी-वेषधारी (साधक) भक्तोंमें ऐसा भय उपस्थित हुआ कि उन्होंने किसी स्त्रीके साथ बात तक करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥ अनुभाष्य- 'स्त्री-सम्भाषण',- भोक्ता अथवा पुरुष- अभिमानसे अपनी इन्द्रियोंकी भोग्या समझकर स्त्रीके साथ विषयी व्यक्तिकी जो बातचीत होती है, वह स्त्री-सम्भाषण है॥ 144 ॥ एक वर्षके बाद भी महाप्रभुकी अटल निरपेक्षता :- एइमते हरिदासेर एकवत्सर गेल। तबु महाप्रभुर मने प्रसाद नहिल ॥ 145 ॥ अनुवाद-इस प्रकार छोटे-हरिदासका एक वर्ष व्यतीत हो गया, किन्तु तब भी महाप्रभुके मनमें उनके प्रति कृपाका आभास भी नहीं दिखा ॥ 145 ॥ महाप्रभुके ऐसे व्यवहारको देखकर छोटे-हरिदासके द्वारा महाप्रभुकी सेवाकी प्राप्तिका सङ्कल्प लेकर प्रयागमें जाकर त्रिवेणीमें देहत्याग :- रात्रि-शेषे प्रभुरे दण्डवत् हञा। प्रयागेते गेल कारेह किछु ना बलिया ॥ 146 ॥ अनुवाद-एक रात्रिके अन्तमें छोटे-हरिदास महाप्रभुको बाहरसे ही दण्डवत् प्रणाम करके बिना किसीको बताये प्रयाग चले गये ॥ 146 ॥ प्रभुपद-प्राप्ति लागि' सङ्कल्प करिल। त्रिवेणी प्रवेश करि' प्राण छाड़िल ॥ 147 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदासने महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिका सङ्कल्प किया और त्रिवेणीमें प्रवेश करके उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये ॥ 147 ॥