श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें62 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/148-157 ] छोटे-हरिदासके द्वारा अपनी दिव्य देहसे अलक्षित रूपमें महाप्रभुके समीप कीर्तन-गान-सेवा :- सेइक्षणे प्रभुस्थाने दिव्यदेहे आइला। प्रभुकृपा लञा अन्तर्धाने रहिला ॥ 148 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदास उसी समय दिव्य देह धारण करके महाप्रभुके निकट आये और महाप्रभुकी कृपा प्राप्त की। वे सभीके लिये अदृश्य ही रहे॥ 148 ॥ गन्धर्वदेहे गान करेन अन्तर्धाने। रात्रे प्रभुरे शुनाय, अन्य नाहि जाने ॥ 149 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदास अदृश्य रूपमें गन्धर्वके समान दिव्य देहके द्वारा रात्रिके समय महाप्रभुको अपने गानका श्रवण कराते। महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस बातको नहीं जानता था॥ 149 ॥ एकदिन महाप्रभुके द्वारा भक्तोंसे हरिदासके विषयमें पूछना :- एकदिन महाप्रभु पुछिला भक्तगणे। “हरिदास काँहा? तारे आनह एखाने ॥” 150 ॥ अनुवाद-एकदिन महाप्रभुने भक्तोंसे पूछा,—“छोटा- हरिदास कहाँ है? उसे यहाँपर लेकर आओ॥” 150 ॥ सभीके द्वारा हरिदासके सम्बन्धमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- सबे कहे,—“हरिदास वर्षपूर्ण दिने। रात्रे उठि' काँहा गेला, केह नाहि जाने ॥” 151 ॥ अनुवाद-सभी भक्तोंने कहा,—“एक वर्ष पूर्ण होनेके बाद छोटा-हरिदास रात्रिमें उठकर कहीं चला गया। वह कहाँ गया, यह कोई भी नहीं जानता॥” 151 ॥ महाप्रभुका हास्य; उसे देखकर भक्तोंको विस्मय :- शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिया रहिला। सब भक्तगण-मने विस्मय जन्मिला ॥ 152 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु थोड़ा-सा मुस्कुराये। महाप्रभुको मुस्कुराते देखकर सब भक्तोंके मनमें विस्मय हुआ ॥ 152 ॥ एकदिन समुद्र-स्नानके समय श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दादि भक्तोंके द्वारा अलक्षित हरिदासके गानका श्रवण :- एकदिन जगदानन्द, स्वरूप, गोविन्द। काशीश्वर, शङ्कर, दामोदर, मुकुन्द ॥ 153 ॥ समुद्रस्नाने गेला सबे, शुने कथो दूरे । हरिदास गायेन, येन डाकि' कण्ठस्वरे ॥ 154 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द-सभी भक्त मिलकर समुद्र स्नान करनेके लिये गये। उन्होंने छोटे-हरिदासको कुछ दूरीपर गान करते हुए सुना जैसे वे अपने पूर्व स्वरमें उन्हें बुला रहे हैं॥ 153-154 ॥ मनुष्य ना देखे-मधुर गीतमात्र सुने। गोविन्दादि सब मेलि' कैल अनुमाने ॥ 155 ॥ श्रीस्वरूपके अतिरिक्त श्रीगोविन्दादि भक्तोंका अनुमान-हरिदासको आत्महत्याके फलसे ब्रह्मराक्षसयोनिकी प्राप्ति :- “विषादि खाञा हरिदास आत्मघात कैल। सेइ पापे जानि 'ब्रह्मराक्षस' हैल ॥ 156 ॥ आकार ना देखि मात्र शुनि तार गान।” स्वरूप कहेन, - “एइ मिथ्या अनुमान ॥ 157 ॥ अनुवाद-परन्तु किसीको भी गान करते छोटे-हरिदास दिखलायी नहीं दिये, उन्हें केवल मधुर गीत ही सुनायी दे रहा था। इसी कारण श्रीगोविन्दादि सभी भक्तोंने अनुमान लगाया,—“लगता है कि छोटे-हरिदासने विष आदि खाकर आत्महत्या की है, जिस पापके फलस्वरूप वह 'ब्रह्मराक्षस' बन गया है। इसी कारण हमें उसका रूप दिखायी नहीं दे रहा, केवलमात्र उसका गान ही सुनायी दे रहा है।” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“आप लोगोंका ऐसा अनुमान मिथ्या है॥ 155-157 ॥