भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2080, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2080

[ 2/158–166 दूसरा अध्याय 63 श्रीस्वरूपके द्वारा छोटे-हरिदासके गुण और सद्गतिकी प्रशंसा :- आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर सेवन। प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर मरण ॥ 158 ॥ दुर्गति ना हय तार, सद्गति से हय। प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा निश्चय ॥” 159 ॥ अनुवाद—सम्पूर्ण जीवन ही छोटे-हरिदासने श्रीकृष्णका कीर्त्तन किया है, महाप्रभुकी सेवा की है, वह महाप्रभुका कृपा-पात्र है तथा क्षेत्रमें उसने देह त्याग किया है। उसकी कभी भी दुर्गति नहीं हो सकती, उसकी सद्गति ही हुई होगी। यह महाप्रभुकी कोई लीला है, निश्चय ही तुम लोगोंको बादमें उसका पता चलेगा॥” 158-159 ॥ प्रयागसे नवद्वीपमें लौटे एक वैष्णवके मुखसे श्रीवासादिके द्वारा हरिदासके देहत्यागका श्रवण :- प्रयाग हइते एक वैष्णव नवद्वीप आइल। हरिदासेर वार्त्ता तेंहो सबारे कहिल ॥ 160 ॥ अनुवाद—प्रयागसे एक वैष्णव नवद्वीपमें आये तथा उन्होंने छोटे-हरिदासकी आत्महत्याके विषयमें सबको बतलाया॥ 160 ॥ यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल। शुनि' श्रीवासादिरे मने विस्मय हइल ॥ 161 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासने जिस प्रकारसे सङ्कल्प ग्रहण किया था, जिस प्रकारसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया था, यह सब बतलाया। इसे सुनकर श्रीवासादि भक्तोंके मनमें बहुत विस्मय हुआ॥ 161 ॥ अगले वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- वर्षान्तरे शिवानन्द सब भक्त लञा। प्रभुरे मिलिला आसि' आनन्दित हञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—एक वर्षके बाद श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथपुरी आये और बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे आकर मिले॥ 162 ॥ श्रीवासके द्वारा महाप्रभुसे छोटे हरिदासके सम्बन्धमें जिज्ञासा और महाप्रभुका उत्तर :- “हरिदास काँहा ?” यदि श्रीवास पुछिला। “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—प्रभु उत्तर दिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने पूछा,—“छोटा-हरिदास कहाँ है?” महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मनुष्य अपने कर्मोंका फल भोग करता है॥” 163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—मनुष्य अपने कर्मोंके फलका भोग करता है॥ 163 ॥ श्रीवासके द्वारा छोटे-हरिदासके देहत्यागके वृत्तान्तका वर्णन :- तबे श्रीवास तार वृत्तान्त कहिल। यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ॥ 164 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने छोटे-हरिदासने जैसे सङ्कल्प किया और जैसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया—यह सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ 164 ॥ सद्धर्मके रक्षक जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा विधिकी व्यवस्थाका विधान :- शुनि' प्रभु हासि' कहे सुप्रसन्न चित्त। “प्रकृति-दर्शन कैले एइ प्रायश्चित ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीवास पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने हृदयमें बहुत प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए कहा,—“स्त्रीका भोगबुद्धिसे दर्शन करनेका यही प्रायश्चित है॥” 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भेकधारी अर्थात् वैरागी-वेषधारी साधक वैष्णव यदि इच्छापूर्वक स्त्रीका दर्शन करता है, तो अगले जन्ममें इस दोषसे मुक्त होनेके अभिप्रायसे त्रिवेणीमें डूबकर मरना ही प्रायश्चित्त है॥ 165 ॥ दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। त्रिवेणी आदि विष्णुतीर्थमें देहत्यागका फल :- स्वरूपादि मिलि' तबे विचार करिला। त्रिवेणी-प्रभावे हरिदास प्रभुपाश आइला ॥ 166 ॥

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