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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2081

64 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/166-169 ] अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने मिलकर विचार किया कि त्रिवेणीमें प्राण त्यागनेके प्रभावसे छोटा-हरिदास महाप्रभुके समीप आ गया है॥ 166 ॥ महाप्रभुकी लीला भक्तोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन स्वरूप :- एइमत लीला करे शचीर नन्दन। याहा शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय कर्ण-मन॥ 167 ॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर भक्तोंके कान तथा मन आनन्दित हो जाते हैं॥ 167 ॥ छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदान-लीलामें शिक्षणीय विषय :- आपन कारुण्य, लोके वैराग्य-शिक्षण। स्वभक्तेर गाढ़-अनुराग-प्रकटीकरण॥ 168 ॥ तीर्थेर महिमा, निज-भक्ते आत्मसात्। एक लीलाय करेन प्रभु कार्य पाँच-सात॥ 169 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदानकी एक लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने पाँच-सात कार्य सिद्ध किये हैं। जैसे—अपनी करुणाका प्रकाश, लोगोंको वैराग्यकी शिक्षा, अपने भक्तोंके अपने प्रति गाढ़ अनुरागको प्रकट करना, तीर्थकी महिमा तथा अपने भक्तोंको आत्मसात् करना आदि॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा छोटे-हरिदासको दण्ड प्रदान करनेकी लीलाके द्वारा शुद्ध गौरकृष्ण भजनके इच्छुक साधक महाप्रभुकी निम्नलिखित शिक्षाको लक्ष्य करेंगे—

  1. भगवान् श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति परम करुणायुक्त होकर अपने पार्षद-भक्त छोटे-हरिदासका भी बाहरी रूपसे त्याग किया। यदि महाप्रभु उनका त्याग नहीं करते, तब फिर अवैधरूपसे आश्रय पाकर कलिकालके दुर्बल जीव प्राकृत-सहजिया आदि जड़ीय अपधर्म और उपधर्मको 'वैष्णवधर्म' मानकर नरकमें सड़ते रहते, उसमें महाप्रभुकी करुणाका परिचय नहीं होता।
  2. प्रचारकारी वैष्णवाचार्यका आसन और आचरणकारी भक्तका आसन कैसा होना उचित है, उसका इस दण्ड-प्रदानके माध्यमसे महाप्रभुने सर्वसाधारणको उपदेश दिया है।
  3. शुद्ध, सरल और निष्पाप जीवनयुक्त होकर भगवद्भक्तोंका जिस प्रकार श्रीगौरकी सेवा करना कर्त्तव्य है, महाप्रभुने जीवोंको वैसे कृष्णेतर-विषयभोग-त्यागरूपी वैराग्य'की शिक्षा प्रदान की।
  4. महाप्रभुके निजभक्तोंका सुनिर्मल चरित्र कितना उच्च और लोभनीय आदर्श-स्थल है एवं (शुद्ध) सद्भक्तोंको वे किस प्रकार अपना जन मानकर ग्रहण करते हैं तथा कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंके प्रति अनुरागकी छायासे कैसा विषमय फल उत्पन्न होता है,
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