भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2082

[ 2/168-172 दूसरा अध्याय 65 उसे भी महाप्रभुने प्रदर्शित किया। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मधुर लीलाएँ समुद्रकी 5) छोटे-हरिदासके प्रति महाप्रभुकी दण्ड-विधानरूपी भाँति गहरी हैं जिनकी थाह पाना सम्भव नहीं हैं। इन्हें अमन्दोदया दया एवं महाप्रभुके प्रति छोटे-हरिदासकी साधारण लोग नहीं समझ सकते, केवल 'धीर' भक्त ही सेवाबुद्धि अथवा गाढ़ अनुराग कितना अधिक परिमाणमें इन्हें समझ सकते हैं॥ 170 ॥ था, उसे दिखलानेके लिये उनकी सामान्य त्रुटि भी तर्कपन्थाको त्याग करके श्रौत-पथके महाप्रभु सहन करनेके लिये सहमत नहीं थे। महाप्रभुके आश्रयमें सभीको अप्राकृत चैतन्य-लीलाका गाढ़ अनुरागके पात्र होनेकी इच्छा करनेपर शुद्धभजनके श्रवण करनेके लिये ग्रन्थकारका अनुरोध :— इच्छुक भक्तगण सब प्रकारके लौकिक इन्द्रियसुखकी विश्वास करिया शुन चैतन्यचरित। लालसाका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करेंगे, अन्यथा श्रीगौरहरि तर्क ना करिह, तर्के हबे विपरीत ॥ 171 ॥ उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका श्रद्धा 6) यदि कोई प्रयागादि विष्णु-तीर्थमें देहत्याग करता और विश्वासपूर्वक श्रवण करो। इनमें किसी प्रकारका है, तो अपराध आदि शोधित और मुक्त होकर उसे कोई तर्क मत करना, तर्कसे विपरीत फल ही प्राप्त सुकृति तथा सद्गतिकी प्राप्ति होती है। होता है॥ 171 ॥ 7) लोकशिक्षाके लिये अपने भक्त छोटे-हरिदासको ग्रहण नहीं करके बादमें उनके मुखसे श्रीकृष्ण श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कीर्तन-श्रवणरूप सेवा स्वीकार करके महाप्रभुने उनको चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 172 ॥ अपने भक्तके रूपमें स्वीकार किया ॥ 168-169 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदासदण्ड- दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रूप-शिक्षा-नाम द्वितीयः परिच्छेदः। असत्सङ्ग त्यागमें दृढ़ प्रयत्नवान् बुद्धिमान् निष्कपट अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृष्णभजनके इच्छुकका ही परम गम्भीर श्रीकृष्ण-चैतन्यकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका लीलाके मर्मको अनुभव करनेमें अधिकार :— वर्णन कर रहा है॥ 172 ॥ मधुर चैतन्यलीला—समुद्र-गम्भीर। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदासदण्ड- लोके नाहि बुझे, बुझे येइ 'भक्त' 'धीर' ॥ 170 ॥ रूप-शिक्षा-नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।