श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 2/158–166 दूसरा अध्याय 63 श्रीस्वरूपके द्वारा छोटे-हरिदासके गुण और सद्गतिकी प्रशंसा :- आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर सेवन। प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर मरण ॥ 158 ॥ दुर्गति ना हय तार, सद्गति से हय। प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा निश्चय ॥” 159 ॥ अनुवाद—सम्पूर्ण जीवन ही छोटे-हरिदासने श्रीकृष्णका कीर्त्तन किया है, महाप्रभुकी सेवा की है, वह महाप्रभुका कृपा-पात्र है तथा क्षेत्रमें उसने देह त्याग किया है। उसकी कभी भी दुर्गति नहीं हो सकती, उसकी सद्गति ही हुई होगी। यह महाप्रभुकी कोई लीला है, निश्चय ही तुम लोगोंको बादमें उसका पता चलेगा॥” 158-159 ॥ प्रयागसे नवद्वीपमें लौटे एक वैष्णवके मुखसे श्रीवासादिके द्वारा हरिदासके देहत्यागका श्रवण :- प्रयाग हइते एक वैष्णव नवद्वीप आइल। हरिदासेर वार्त्ता तेंहो सबारे कहिल ॥ 160 ॥ अनुवाद—प्रयागसे एक वैष्णव नवद्वीपमें आये तथा उन्होंने छोटे-हरिदासकी आत्महत्याके विषयमें सबको बतलाया॥ 160 ॥ यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल। शुनि' श्रीवासादिरे मने विस्मय हइल ॥ 161 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासने जिस प्रकारसे सङ्कल्प ग्रहण किया था, जिस प्रकारसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया था, यह सब बतलाया। इसे सुनकर श्रीवासादि भक्तोंके मनमें बहुत विस्मय हुआ॥ 161 ॥ अगले वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- वर्षान्तरे शिवानन्द सब भक्त लञा। प्रभुरे मिलिला आसि' आनन्दित हञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—एक वर्षके बाद श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथपुरी आये और बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे आकर मिले॥ 162 ॥ श्रीवासके द्वारा महाप्रभुसे छोटे हरिदासके सम्बन्धमें जिज्ञासा और महाप्रभुका उत्तर :- “हरिदास काँहा ?” यदि श्रीवास पुछिला। “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—प्रभु उत्तर दिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने पूछा,—“छोटा-हरिदास कहाँ है?” महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मनुष्य अपने कर्मोंका फल भोग करता है॥” 163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—मनुष्य अपने कर्मोंके फलका भोग करता है॥ 163 ॥ श्रीवासके द्वारा छोटे-हरिदासके देहत्यागके वृत्तान्तका वर्णन :- तबे श्रीवास तार वृत्तान्त कहिल। यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ॥ 164 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने छोटे-हरिदासने जैसे सङ्कल्प किया और जैसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया—यह सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ 164 ॥ सद्धर्मके रक्षक जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा विधिकी व्यवस्थाका विधान :- शुनि' प्रभु हासि' कहे सुप्रसन्न चित्त। “प्रकृति-दर्शन कैले एइ प्रायश्चित ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीवास पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने हृदयमें बहुत प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए कहा,—“स्त्रीका भोगबुद्धिसे दर्शन करनेका यही प्रायश्चित है॥” 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भेकधारी अर्थात् वैरागी-वेषधारी साधक वैष्णव यदि इच्छापूर्वक स्त्रीका दर्शन करता है, तो अगले जन्ममें इस दोषसे मुक्त होनेके अभिप्रायसे त्रिवेणीमें डूबकर मरना ही प्रायश्चित्त है॥ 165 ॥ दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। त्रिवेणी आदि विष्णुतीर्थमें देहत्यागका फल :- स्वरूपादि मिलि' तबे विचार करिला। त्रिवेणी-प्रभावे हरिदास प्रभुपाश आइला ॥ 166 ॥
64 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/166-169 ] अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने मिलकर विचार किया कि त्रिवेणीमें प्राण त्यागनेके प्रभावसे छोटा-हरिदास महाप्रभुके समीप आ गया है॥ 166 ॥ महाप्रभुकी लीला भक्तोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन स्वरूप :- एइमत लीला करे शचीर नन्दन। याहा शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय कर्ण-मन॥ 167 ॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर भक्तोंके कान तथा मन आनन्दित हो जाते हैं॥ 167 ॥ छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदान-लीलामें शिक्षणीय विषय :- आपन कारुण्य, लोके वैराग्य-शिक्षण। स्वभक्तेर गाढ़-अनुराग-प्रकटीकरण॥ 168 ॥ तीर्थेर महिमा, निज-भक्ते आत्मसात्। एक लीलाय करेन प्रभु कार्य पाँच-सात॥ 169 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदानकी एक लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने पाँच-सात कार्य सिद्ध किये हैं। जैसे—अपनी करुणाका प्रकाश, लोगोंको वैराग्यकी शिक्षा, अपने भक्तोंके अपने प्रति गाढ़ अनुरागको प्रकट करना, तीर्थकी महिमा तथा अपने भक्तोंको आत्मसात् करना आदि॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा छोटे-हरिदासको दण्ड प्रदान करनेकी लीलाके द्वारा शुद्ध गौरकृष्ण भजनके इच्छुक साधक महाप्रभुकी निम्नलिखित शिक्षाको लक्ष्य करेंगे—
- भगवान् श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति परम करुणायुक्त होकर अपने पार्षद-भक्त छोटे-हरिदासका भी बाहरी रूपसे त्याग किया। यदि महाप्रभु उनका त्याग नहीं करते, तब फिर अवैधरूपसे आश्रय पाकर कलिकालके दुर्बल जीव प्राकृत-सहजिया आदि जड़ीय अपधर्म और उपधर्मको 'वैष्णवधर्म' मानकर नरकमें सड़ते रहते, उसमें महाप्रभुकी करुणाका परिचय नहीं होता।
- प्रचारकारी वैष्णवाचार्यका आसन और आचरणकारी भक्तका आसन कैसा होना उचित है, उसका इस दण्ड-प्रदानके माध्यमसे महाप्रभुने सर्वसाधारणको उपदेश दिया है।
- शुद्ध, सरल और निष्पाप जीवनयुक्त होकर भगवद्भक्तोंका जिस प्रकार श्रीगौरकी सेवा करना कर्त्तव्य है, महाप्रभुने जीवोंको वैसे कृष्णेतर-विषयभोग-त्यागरूपी वैराग्य'की शिक्षा प्रदान की।
- महाप्रभुके निजभक्तोंका सुनिर्मल चरित्र कितना उच्च और लोभनीय आदर्श-स्थल है एवं (शुद्ध) सद्भक्तोंको वे किस प्रकार अपना जन मानकर ग्रहण करते हैं तथा कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंके प्रति अनुरागकी छायासे कैसा विषमय फल उत्पन्न होता है,
[ 2/168-172 दूसरा अध्याय 65 उसे भी महाप्रभुने प्रदर्शित किया। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मधुर लीलाएँ समुद्रकी 5) छोटे-हरिदासके प्रति महाप्रभुकी दण्ड-विधानरूपी भाँति गहरी हैं जिनकी थाह पाना सम्भव नहीं हैं। इन्हें अमन्दोदया दया एवं महाप्रभुके प्रति छोटे-हरिदासकी साधारण लोग नहीं समझ सकते, केवल 'धीर' भक्त ही सेवाबुद्धि अथवा गाढ़ अनुराग कितना अधिक परिमाणमें इन्हें समझ सकते हैं॥ 170 ॥ था, उसे दिखलानेके लिये उनकी सामान्य त्रुटि भी तर्कपन्थाको त्याग करके श्रौत-पथके महाप्रभु सहन करनेके लिये सहमत नहीं थे। महाप्रभुके आश्रयमें सभीको अप्राकृत चैतन्य-लीलाका गाढ़ अनुरागके पात्र होनेकी इच्छा करनेपर शुद्धभजनके श्रवण करनेके लिये ग्रन्थकारका अनुरोध :— इच्छुक भक्तगण सब प्रकारके लौकिक इन्द्रियसुखकी विश्वास करिया शुन चैतन्यचरित। लालसाका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करेंगे, अन्यथा श्रीगौरहरि तर्क ना करिह, तर्के हबे विपरीत ॥ 171 ॥ उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका श्रद्धा 6) यदि कोई प्रयागादि विष्णु-तीर्थमें देहत्याग करता और विश्वासपूर्वक श्रवण करो। इनमें किसी प्रकारका है, तो अपराध आदि शोधित और मुक्त होकर उसे कोई तर्क मत करना, तर्कसे विपरीत फल ही प्राप्त सुकृति तथा सद्गतिकी प्राप्ति होती है। होता है॥ 171 ॥ 7) लोकशिक्षाके लिये अपने भक्त छोटे-हरिदासको ग्रहण नहीं करके बादमें उनके मुखसे श्रीकृष्ण श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कीर्तन-श्रवणरूप सेवा स्वीकार करके महाप्रभुने उनको चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 172 ॥ अपने भक्तके रूपमें स्वीकार किया ॥ 168-169 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदासदण्ड- दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रूप-शिक्षा-नाम द्वितीयः परिच्छेदः। असत्सङ्ग त्यागमें दृढ़ प्रयत्नवान् बुद्धिमान् निष्कपट अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृष्णभजनके इच्छुकका ही परम गम्भीर श्रीकृष्ण-चैतन्यकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका लीलाके मर्मको अनुभव करनेमें अधिकार :— वर्णन कर रहा है॥ 172 ॥ मधुर चैतन्यलीला—समुद्र-गम्भीर। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदासदण्ड- लोके नाहि बुझे, बुझे येइ 'भक्त' 'धीर' ॥ 170 ॥ रूप-शिक्षा-नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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तीसरा अध्याय कथासार-पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें किसी सुन्दरी ब्राह्मणी युवतीका एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र था। उसे प्रतिदिन महाप्रभुके पास आते देखकर श्रीदामोदर पण्डितने [महाप्रभुसे] कहा,-"बालकसे प्रीति करनेसे लोग आपके चरित्रपर सन्देह करेंगे।" यह बात सुनकर महाप्रभुने एकदिन श्रीदामोदरको श्रीनवद्वीपमें अपनी माता श्रीशचीकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया और कहा,-"मैं बीच-बीचमें माताके पास जाकर भोजन करता हूँ-यह बात उन्हें स्मरण करा देना।" श्रीदामोदर महाप्रसाद आदि लेकर नवद्वीप गये। उसके बाद एकदिन महाप्रभुने ब्रह्म-हरिदाससे पूछा,- "कलिकालमें सभी यवनोंका किस प्रकार उद्धार होगा?" श्रीहरिदासने उसके लिये उच्च-सङ्कीर्तनके माहात्म्यको बतलाकर सभी नामाभाससे उद्धार प्राप्त करेंगे- ऐसा सिद्धान्त वर्णन किया। यहाँपर श्रीहरिदास ठाकुरके पूर्व-वृत्तान्तका वर्णन करते हुए श्रीकविराज-गोस्वामीने बेनापोलके वनमें पाखण्डी ब्रह्मबन्धु रामचन्द्र-खाँनके द्वारा भेजी गयी वेश्या जिसका श्रीहरिदासकी कृपासे उद्धार हुआ था, उसका विवरण कहा। वैष्णव-अपराधसे और बादमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके अभिशापसे रामचन्द्र खाँनकी जो दुर्दशा हुई थी, वह भी वर्णित हुई है। बेनापोलसे चाँदपुरमें आकर श्रीहरिदास श्रीबलराम-आचार्यके घरपर रहे। उसके बाद हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारकी सभामें नामतत्त्वको लेकर श्रीहरिदास ठाकुर और गोपाल चक्रवर्त्ती नामक आरिन्दा-ब्राह्मणके साथ जो सब वार्तालाप हुआ था एवं श्रीहरिदासके प्रति अपराध करनेसे गोपाल चक्रवर्त्तीको 'कोढ़-रोगरूपी' दण्डकी प्राप्ति हुई थी, उसका वर्णन है। श्रीहरिदास ठाकुर चाँदपुरसे शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैताचार्यके घरपर रहे। वहाँ मायादेवी छल करनेके लिये आयी और उसने श्रीहरिदासकी कृपासे श्रीकृष्णनामको प्राप्त किया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च ॥ १ ॥ अनुवाद-मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं)के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परातपर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य-अन्त्यलीला 2/1 संख्या देखें ॥ १ ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ २॥ एक विधवा-ब्राह्मणीके महासौभाग्यवान् सुन्दर पुत्रके प्रति महाप्रभुका अहैतुक कृपा-स्नेह :- पुरुषोत्तमे एक उड़िया-ब्राह्मणकुमार। पितृशून्य, महासुन्दर, मृदुव्यवहार ॥ ३ ॥ अनुवाद-श्रीपुरुषोत्तम धाममें एक उड़िया ब्राह्मण बालक रहता था। उसके पिता परलोक सिधार गये थे।
68 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/3-12 ] वह बालक अत्यन्त सुन्दर था और उसका व्यवहार भी बहुत मृदु था ॥ ३ ॥ प्रभु-स्थाने नित्य आइसे, करे नमस्कार। प्रभु-सने बात् कहे, प्रभु- 'प्राण' तार ॥ 4 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर आता और महाप्रभुको प्रणाम करता था। उनसे निःसङ्कोच होकर बातें करता, क्योंकि महाप्रभु उसके 'प्राण' स्वरूप थे ॥ 4 ॥ इसमें श्रीदामोदर पण्डितका अनुमोदन नहीं :- प्रभुते ताहार प्रीति, प्रभु दया करे। दामोदर तार प्रीति सहिते ना पारे ॥ 5 ॥ अनुवाद-उस बालककी महाप्रभुके प्रति प्रीति और महाप्रभुकी उसपर कृपा थी। श्रीदामोदर पण्डित उसकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिको सहन नहीं कर पा रहे थे॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर', - श्रीदामोदर-पण्डित ॥ 5 ॥ श्रीदामोदरके द्वारा मना करनेपर भी ब्राह्मण-बालकका महाप्रभुके प्रति अनुराग :- बार बार निषेध करे ब्राह्मणकुमारे। प्रभुरे ना देखिले सेइ रहिते ना पारे ॥ 6 ॥ अनुवाद-श्रीदामोदर पण्डित बार बार उस ब्राह्मण बालकको महाप्रभुके पास आनेके लिये मना करते, किन्तु वह बालक महाप्रभुको देखे बिना रह नहीं पाता था ॥ 6 ॥ बालसुलभ-धर्मवशतः स्नेहमय महाप्रभुके निकट उसका प्रतिदिन आगमन :- नित्य आइसे, प्रभु तारे करे महाप्रीत। याँहा प्रीति ताँहा आइसे, - बालकेर रीत ॥ 7 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके पास आता तथा महाप्रभु उससे बहुत अधिक स्नेह करते। बालकका तो स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे जहाँ प्रीति मिलती है, वह वहीं आता है ॥ 7 ॥ श्रीदामोदरके लिये दो सङ्कट :- ताहा देखि' दामोदर दुःख पाय मने। बलिते ना पारे, बालक निषेध ना माने ॥ 8 ॥ अनुवाद-ऐसा देखकर श्रीदामोदर पण्डितके मनमें बहुत दुःख होता। वे कुछ कह भी नहीं पाते, क्योंकि बालक उनके निषेधको नहीं मानता था ॥ 8 ॥ एकदिन महाप्रभुके निकटसे बालकका अपने स्थानपर प्रस्थान :- आर दिन सेइ बालक प्रभु-स्थाने आइला । गोसाञि तारे प्रीति करि' वार्त्ता पुछिला ॥ 9 ॥ कतक्षणे से बालक उठि' यबे गेला। सहिते ना पारे, दामोदर कहिते लागिला ॥ 10 ॥ अनुवाद-एकदिन वह बालक जब महाप्रभुके वासस्थानपर आया, तब महाप्रभुने उससे प्रीतिपूर्वक अनेक बातें पूछीं। थोड़ी देरीके बाद जब वह ब्राह्मण बालक उठकर चला गया, तब श्रीदामोदर पण्डित यह सब सहन नहीं कर पानेके कारण कहने लगे ॥ 9-10 ॥ अधीर दामोदरका अभियोग और महाप्रभुके कार्यकी समालोचना :- “अन्योपदेशे पण्डित”, कहे गोसाञिर ठाञि। 'गोसाञि' 'गोसाञि' एबे जानिमु 'गोसाञि' ॥ 11 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 11 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीदामोदर पण्डित महाप्रभुको कहने लगे, - “आप अन्योंको उपदेश प्रदान करते समय 'पण्डित' हैं और सभी आपको 'गोसाईं' 'गोसाईं' (आचार्य) कहते हैं; इस बार जाना जायेगा कि आप किस प्रकार 'गोसाईं' बने रह सकते हैं ॥ 11 ॥ एबे गोसाञिर गुण सब लोके गाइबे। गोसाञि-प्रतिष्ठा सब पुरुषोत्तमे हइबे ॥” 12 ॥ अनुवाद-अब सभी लोग गोसाईंके गुणोंका गान
[ 3/12-23 तीसरा अध्याय 69 करेंगे और सम्पूर्ण पुरुषोत्तम क्षेत्रमें गोसाईंको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होगी॥" 12 ॥ महाप्रभुको मर्यादा दिखलाकर श्रीदामोदरके द्वारा तिरस्कार और शासन :- शुनि' प्रभु कहे,—"क्या कह, दामोदर?" दामोदर कहे,–"तुमि स्वतन्त्र ईश्वर' ॥ 13 ॥ स्वच्छन्दे आचार कर, के पारे बलिते? मुखर जगतेर मुख पार आच्छादिते ॥ 14 ॥ पण्डित हञा मने केने विचार ना कर? राण्डी ब्राह्मणीर बालके प्रीति केने कर??15 ॥ यद्यपि ब्राह्मणी सेइ तपस्विनी सती। तथापि ताहार दोष—सुन्दरी युवती ॥ 16 ॥ तुमिह—परम युवा, परम सुन्दर। लोकेर काणाकाणि-बाते देह अवसर ॥" 17 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—"हे दामोदर! क्या कह रहे हो?" श्रीदामोदर पण्डितने कहा,—"आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आप स्वतन्त्र होकर जैसा चाहें वैसा आचरण कर सकते हैं, आपको कौन कुछ कह सकता है? क्या आप वाचाल लोगोंके मुखको ढक सकते हैं? पण्डित होनेपर भी आप स्वयं विचार क्यों नहीं करते? आप विधवा ब्राह्मणीके पुत्रसे प्रीति क्यों करते हैं? यद्यपि वह ब्राह्मणी तपस्विनी सती-साध्वी स्त्री है, तो भी उसका एक दोष है कि वह सुन्दरी युवती है। आप भी परम युवा और परम सुन्दर हैं। आप लोगोंको कानाफूसी करनेका अवसर प्रदान कर रहे हैं॥" 13-17 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राण्डी',–विधवा ॥ 15 ॥ श्रीदामोदरके वाक्य-दण्डको सुनकर महाप्रभुका मन-ही-मनमें विचार :- एत बलि' दामोदर मौन हइला। अन्तरे सन्तोष प्रभु हासि' विचारिला ॥ 18 ॥ "इहारे कहिये शुद्धप्रेमेर तरङ्ग। दामोदर-सम मोर नाहि 'अन्तरङ्ग' ॥" 19 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीदामोदर पण्डित मौन हो गये। उनकी बात सुनकर महाप्रभुके हृदयमें सन्तोष हुआ तथा उन्होंने मुस्कुराकर मन-ही-मन विचार किया,—"इसीको शुद्धप्रेमकी तरङ्ग कहते हैं, वास्तवमें दामोदरके समान मेरा कोई 'अन्तरङ्ग' नहीं है॥" 18-19 ॥ एतेक विचारि' प्रभु मध्याह्ने चलिला। आर दिने दामोदरे निभृते बोलाइला ॥ 20 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभु मध्याह्न कृत्योंके लिये चल दिये। अगले दिन उन्होंने श्रीदामोदर पण्डितको एकान्तमें बुलाया ॥ 20 ॥ नवद्वीपमें शचीमाताकी देखभाल करनेके लिये पण्डितको भेजना :- प्रभु कहे,—"दामोदर, चलह नदीया। मातार समीपे तुमि रह ताँहा याञा ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"दामोदर, तुम नदीया जाओ। वहाँ जाकर तुम मेरी माताके पास जाकर रहो ॥ 21 ॥ महाप्रभुके द्वारा दामोदरकी छलसे स्तुति :- तोमा बिना ताँहार रक्षक नाहि आन। आमाकेह याते तुमि कैला सावधान ॥ 22 ॥ तोमा सम 'निरपेक्ष' नाहि मोर गणे। 'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना याय रक्षणे ॥ 23 ॥ अनुवाद—तुम्हारे अतिरिक्त उनकी रक्षा अन्य कोई नहीं कर सकता। क्योंकि तुमने तो मुझे भी सावधान किया है। तुम्हारे समान 'निरपेक्ष' अन्य कोई भी मेरे परिकरोंमें नहीं है। वास्तवमें निरपेक्ष हुए बिना धर्मकी रक्षा नहीं की जा सकती ॥ 22-23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मरक्षकगण निरपेक्ष होंगे, अर्थात्
किसी भी प्रकारकी लोकापेक्षाके द्वारा धर्मको कुण्ठित नहीं होने देंगे॥ २३ ॥ आमा हैते ये ना हय, से तोमा हैते हय। आमारे करिला दण्ड, आन केबा हय ॥ २४ ॥ अनुवाद-मुझसे भी जो निरपेक्षत्वकी रक्षाका कार्य नहीं हो सकता, वह तुम कर सकते हो। तुमने तो मुझपर भी अनुशासन किया है, अन्योंका तो फिर कहना ही क्या ? ॥ २४ ॥ अनुभाष्य-'ये ना हय, से', - जो निरपेक्षत्व रक्षित नहीं होता, वह ॥ २४ ॥ मातार गृहे रह याइ मातार चरणे। तोमार आगे नाहि कार स्वच्छन्दाचरणे ॥ २५ ॥ मध्ये मध्ये आसिबा कभु आमार दर्शने। शीघ्र करि' पुनः ताँहा करह गमने ॥ २६ ॥ अनुवाद-तुम माताके घरपर जाकर उनके श्रीचरणोंमें ही रहना, क्योंकि तुम्हारे आगे कोई भी स्वच्छन्द आचरण नहीं कर पायेगा। बीच-बीचमें कभी मुझसे मिलनेके लिये आना तथा फिर शीघ्र ही पुनः वहाँ लौट जाना ॥ २५-२६॥ महाप्रभुके सुखी होनेका वर्णन करके शुद्धगौर- स्नेहवात्सल्यमयी शचीमाताको सन्तुष्ट करनेका आदेश :- मातारे कहिह मोर कोटी नमस्कारे। मोर सुख-कथा कहि' सुख दिह' ताँरे ॥ २७ ॥ 'निरन्तर निज-कथा तोमारे शुनाइते। एइ लागि' प्रभु मोरे पाठाइला इँहाते ॥ '२८ ॥ एत कहि' मातार मने सन्तोष जन्माइह। आर गुह्यकथा ताँरे स्मरण कराइह ॥ २९ ॥ अनुवाद-माताको मेरा कोटि-कोटि नमस्कार कहना। मैं यहाँ बहुत सुखी हूँ-ऐसा बताकर माताको सुखी करना। और उनसे कहना कि 'प्रभुने निरन्तर अपनी बातें आपको सुनानेके लिये ही मुझे यहाँ भेजा है।' ऐसा कहकर माताके मनको सन्तुष्ट करना तथा उन्हें मेरी अन्य एक और गूढ़ बात स्मरण करवाना॥ २७-२९ ॥ माताके घरमें महाप्रभुका आविर्भाव और भोजनलीला :- 'बारे बारे आसि' आमि तोमार भवने। मिष्ठान्न व्यञ्जन सब करिये भोजने ॥ ३० ॥ भोजन करिये आमि, तुमि ताहा जान। बाह्य करिते ताहा स्फूर्त्ति करि' मान' ॥ ३१ ॥ अनुवाद-मैं बार-बार आपके घरमें आकर जो मिठाइयाँ-पकवान आप मेरे लिये बनाती हैं, उन सबको मैं खाता हूँ। आप जानती हैं कि मैं आकर खाता हूँ, किन्तु विरहके कारण बाहरसे उसे आप केवल स्फूर्त्ति ही मानती हैं ॥ ३०-३१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जगत्में जब आपकी बाह्यदृष्टि होती है, तब आपके मनमें, - 'निमाइ मेरे स्मरण पथपर आया था' -ऐसी स्फूर्तिमात्र होती है; किन्तु मैं वास्तवमें आपके निकट जाकर अन्न-पकवान आदि खाता हूँ॥ ३१॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, “बाह्य विरह.....मान"-परवर्ती 36 संख्या देखें। बाह्य दृष्टिसे विरहके कारण आप मुझे प्रत्यक्ष रूपसे नहीं देखनेपर भी मेरी भोजन-लीलाके भली-भाँति दर्शनसे प्रगाढ़ वात्सल्यप्रेमसे भरकर मानो मुझे साक्षात् रूपसे ही अनुभव कर रही हैं, ऐसा मानकर भ्रम करती हैं ॥ ३१ ॥ माताके विश्वासको उत्पन्न करनेके लिये एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एइ माघ-संक्रान्त्ये तुमि रन्धन करिला। नाना व्यञ्जन, क्षीर, पिठा, पायस रान्धिला ॥ ३२ ॥ कृष्णे भोग लागाञा यबे कैला ध्यान। आमार स्फूर्त्ति हैल, अश्रु भरिल नयन ॥ ३३ ॥ आस्ते-व्यस्ते आमि गिया सकलि खाइल। आमि खाइ, देखि' तोमार सुख उपजिल ॥ ३४ ॥
[ 3/32-45 तीसरा अध्याय 71 क्षणेके अश्रु मुछिया शून्य देखि पात। स्वप्न देखिलुँ, 'येन निमाञि खाइल भात' ॥ 35 ॥ बाह्य विरह-दशाय पुनः भ्रान्ति हैल। 'भोग ना लागाइलुँ, - एइ ज्ञान हैल ॥ 36 ॥ पाकपात्रे देखिला सब अन्न आछे भरि'। पुनः भोग लागाइला स्थान-संस्कार करि' ॥ 37 ॥ अनुवाद—इसी माघ मासकी संक्रान्तिके दिन ही आपने अनेक पकवान, घना दूध, पीठा तथा खीर आदि बनाये। श्रीकृष्णको भोग लगानेके बाद जब आपने ध्यान किया, तब आपको मेरी स्फूर्ति हो आयी और आपकी आँखोंमें आँसू भर आये। मैं शीघ्रतासे वहाँ गया और मैंने सब कुछ खा लिया। मुझे खाते देखकर आपको बहुत प्रसन्नता हुई थी। थोड़ी देरके बाद आँसुओंको पोंछकर आपने भोजनके पात्रको खाली देखा। तब आपने सोचा, - 'मैंने स्वप्नमें देखा है कि निमाइने सब कुछ खाया है।' बाहरसे मुझसे विरहकी दशामें आपको पुनः भ्रान्ति हुई और ऐसा प्रतीत हुआ, - 'मैंने भोग ही नहीं लगाया है।' तब आपने रसोईके बर्तनोंको जाकर देखा कि बर्तन तो सब भरे हुए हैं। तब आपने स्थानको साफ करके पुनः भोग लगाया ॥ 32-37 ॥ शचीमाताका शुद्ध गौरवात्सल्य-प्रेम :- एइमत बार बार करिये भोजन। तोमार शुद्धप्रेमे मोरे करे आकर्षण ॥ 38 ॥ अनुवाद—इस प्रकार आप जो कुछ मेरे लिये बनाती हैं, मैं बार-बार आकर वह सब खाता हूँ, क्योंकि आपका शुद्धप्रेम मुझे आकर्षित करता है ॥ 38 ॥ महाप्रभुके अतुलनीय मातृभक्तिसूचक वचन :- तोमार आज्ञाते आमि आछि नीलाचले। निकटे लञा याओ आमा तोमार प्रेमबले ॥ 39 ॥ एइमत बार बार कराइह स्मरण। मोर नाम लञा ताँर वन्दिह चरण ॥" 40 ॥ अनुवाद—मैं आपकी आज्ञासे ही नीलाचलमें रह रहा हूँ, तो भी आप मुझे अपने प्रेमके बलसे अपने निकट खींच लेती हैं। हे दामोदर ! इस प्रकार बार बार तुम उन्हें ये बातें स्मरण कराना तथा मेरी ओरसे उनके चरणोंकी वन्दना करना ॥" 39-40 ॥ एत कहि' जगन्नाथेर प्रसाद आनाइला। माताके, वैष्णवे दिते पृथक् पृथक् कैला ॥ 41 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मँगवाया। महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको उसके पृथक्-पृथक् भाग करके श्रीशचीमाता और अन्य-अन्य वैष्णवोंको देनेके लिये दिया ॥ 41 ॥ श्रीदामोदरका नवद्वीपमें आगमन और श्रीशची और श्रीअद्वैतादि भक्तोंको लाया हुआ महाप्रसाद देना :- तबे दामोदर चलि' नदीया आइला। मातारे मिलिया ताँर चरणे रहिला ॥ 42 ॥ आचार्यादि वैष्णवेरे महाप्रसाद दिला। प्रभुर यैछे आज्ञा, पण्डित ताहा आचरिला ॥ 43 ॥ अनुवाद—तब श्रीदामोदर पण्डित जगन्नाथ पुरीसे चलकर नवद्वीप आ गये। श्रीशचीमातासे मिलकर वे उनके चरणोंके आश्रयमें रहने लगे। श्रीदामोदर पण्डितने श्रीअद्वैताचार्य आदि वैष्णवोंको महाप्रसाद दिया। महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको जो आज्ञा दी थी, उन्होंने उसीका पालन किया ॥ 42-43 ॥ नवद्वीपमें श्रीदामोदरके कठोर शासनके द्वारा मर्यादा-संस्थापन, सभीको ही भय :- दामोदर-आगे स्वातन्त्र्य ना हय काहार। ताँर भये सबे करे सङ्कोच व्यवहार ॥ 44 ॥ प्रभुगुणे याँर देखे अल्प मर्यादा-लङ्घन। वाक्यदण्ड करि' करे मर्यादा-स्थापन ॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितके आगे कोई भी स्वतन्त्र आचरण नहीं करता था, उनके भयसे सभी
72 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/44-54 ] मर्यादापमें ही रहते थे। श्रीदामोदर पण्डित महाप्रभुके भक्तोंमें-से यदि किसीको थोड़ी भी मर्यादाका उल्लङ्घन करते हुए देखते, तब वे उसे डाँटकर मर्यादाका स्थापन करते थे॥ 44-45॥ श्रीदामोदरके वाक्यदण्डके वृत्तान्तके श्रवणसे आत्मेन्द्रियतृप्ति वाञ्छारूपी छल और अपराधका नाश :- एइ त' कहि दामोदेरेर वाक्यदण्ड। याहार श्रवणे भागे 'अज्ञान पाषण्ड' ॥ 46 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने [ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने] श्रीदामोदर पण्डितके वचनोंके द्वारा शासनका वर्णन किया, जिसके श्रवणसे 'अज्ञान' और 'पाखण्डता' आदि भाग जाते हैं॥ 46॥ अनुभाष्य- 'भागे', - पलायन करता है॥ 46॥ महागम्भीर-रहस्यमयी चैतन्यलीला :- चैतन्येर लीला-गम्भीर, कोटिसमुद्र हैते। कि लागि' कि करे, केह ना पारे बुझिते ॥ 47 ॥ अतएव गूढ़ अर्थ किछुइ ना जानि। बाह्य अर्थ करिबारे करि टानाटानि ॥ 48 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ करोड़ों समुद्रोंसे भी गहरी हैं। वे किसलिये क्या करते हैं, इसे कोई भी नहीं समझ सकता। इसलिये मैं महाप्रभुकी लीलाओंके गूढ़ अर्थोंको बिल्कुल भी नहीं जानता हूँ, केवल बाहरी अर्थोंको प्रकाशित करनेके लिये ही प्रयास कर रहा हूँ॥ 47-48॥ महाप्रभु-श्रीहरिदास-संवाद; महाप्रभुका प्रश्न, श्रीहरिदासका उत्तर :- एकदिन प्रभु हरिदासरे मिलिला। ताँहा लञा गोष्ठी करि' ताँहारे पुछिला ॥ 49 ॥ अनुवाद-प्रतिदिनकी भाँति एकदिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले और उनसे वार्तालाप करते हुए उनसे पूछा ॥ 49 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें इस स्थानपर यह श्लोक दिखलायी देता है, - "दामोदराद् वाक्यदण्डमङ्गीकृत्य दयानिधिः। गौरः स्वां हरिदासास्याद्-गूढ़लीलामथाशृणोत्॥" [अर्थात् "दयानिधि श्रीगौरचन्द्रने श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा दिये गये वाक्यरूपी शासनको अङ्गीकार करनेके पश्चात् श्रीहरिदासके मुखसे अपनी गूढ़लीलाका श्रवण किया।] ॥ 49 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदाससे कलियुगमें सुदुराचारी अन्त्यज्य-आदिके उद्धारके उपायकी जिज्ञासा :- "हरिदास, कलिकाल यवन अपार। गो-ब्राह्मणे हिंसा करे महा-दुराचार ॥ 50 ॥ इहा-सबार कोन् मते हइबे निस्तार ? ताहार हेतु ना देखिये,-ए दुःख अपार ॥" 51 ॥ अनुवाद-"हे हरिदास ! कलियुगमें असंख्य यवन हैं। वे गायों तथा ब्राह्मणोंके प्रति हिंसा करनेवाले महा-दुराचारी हैं। इन सबका किस प्रकारसे उद्धार होगा? इनके उद्धारका कोई उपाय नहीं देख पानेके कारण मुझे बहुत दुःख होता है ॥" 50-51 ॥ श्रीहरिदासका उत्तर; नामाभासके माहात्म्यका वर्णन :- हरिदास कहे, - "प्रभु, चिन्ता ना करिह। यवनेर संसार देखि' दुःख ना भाविह ॥ 52 ॥ यवनसकलेर मुक्ति हबे अनायासे। 'हा राम, हा राम' बलि' कहे नामाभासे ॥ 53 ॥ महाप्रेमे भक्त कहे, - 'हा राम, हा राम'। यवनेर भाग्य देख, लय सेइ नाम ॥ 54 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "हे प्रभो! आप चिन्ता मत कीजिये। संसारमें यवनोंके दुःखोंको देखकर दुःखी मत होइये। इन यवनोंकी मुक्ति तो अनायास ही हो जायेगी, क्योंकि ये लोग तो 'हा राम, हा राम' बोलकर नामाभास करते हैं। एक भक्त
[ 3/52-59 तीसरा अध्याय 73 महाप्रेमसे—'हा राम, हा राम' पुकारता है। आप इन यवनोंका भाग्य देखिये, ये भी उसी नामका उच्चारण करते हैं॥52-54॥ अजामिलका पुत्रनाम-सङ्केतसे नामाभास :- अजामिल पुत्रे बोलाय बलि' 'नारायण'। विष्णुदूत आसि' छाड़ाय ताहार बन्धन॥57॥ नामाभासका अतुलनीय प्रभाव :- यद्यपि अन्यत्र सङ्केते हय नामाभास। तथापि नामेर तेज ना हय विनाश॥55॥ अनुवाद—यमदूतोंको देखकर भयभीत हुए अजामिलने अपने पुत्रको 'नारायण' कहकर पुकारा था, किन्तु उस नामके उच्चारणसे ही विष्णुदूतोंने आकर यमदूतोंसे उसके बन्धनको छुड़वाया था॥57॥ अनुवाद—यद्यपि भगवान्के अतिरिक्त किसी अन्यको लक्ष्य करके भगवद्-नामका उच्चारण करनेसे नामाभास होता है, तथापि नामकी अप्राकृत शक्ति नष्ट नहीं होती॥55॥ 'हा राम'-उच्चारणसे नामाभास :- 'राम' दुइ अक्षर इहा नहे व्यवहित। प्रेमवाची 'हा'-शब्द ताहाते भूषित॥58॥ अनुवाद—'राम' नाममें दो अक्षर 'रा' और 'म' हैं और वे पृथक्-पृथक् नहीं हैं तथा वे प्रेम दर्शानेवाले 'हा' शब्दसे विभूषित हैं॥58॥ नृसिंह-पुराण-वचन— दंष्ट्रि... उक्त्वापि मुक्तिमाप्नोति किं पुनः श्रद्धया गृणन्॥56॥ नामका अतुलनीय तेज :- नामेर अक्षर-सबरे एइ त' स्वभाव। व्यवहित हैले ना छाड़े आपन-प्रभाव॥59॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥56॥ अनुवाद—नामके समस्त अक्षरोंका यही तो स्वभाव है कि व्यवहित (अनुचित उच्चारण) होनेपर भी अपने प्रभावको नहीं छोड़ते॥59॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी म्लेच्छने किसी जंगली सूअरके द्वारा दाँतोंसे आघात किये जानेपर घृणापूर्वक 'हाराम', 'हाराम' यह शब्द बोलनेपर भी मृत्युके समय मुक्तिको प्राप्त किया था। 'हाराम'-शब्दमें 'हा राम' यह साङ्केतिक 'राम' शब्द होनेपर, उस म्लेच्छका नामके सङ्केतसे (नामाभासके बलसे) उद्धार हो गया। श्रद्धापूर्वक 'राम'-नाम लेनेसे क्या होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥56॥ अनुभाष्य—'व्यवहित',—यहाँपर, वर्ण अथवा अक्षरगत व्यवधान अथवा तत्त्वगत व्यवधान उद्दिष्ट नहीं हुआ है। क्योंकि, वैसा जड़ीय व्यवधान—श्रद्धाहीन जीवोंके आत्मेन्द्रिय तर्पण अथवा जड़ीय भोग परायण प्रवृत्तिसे उत्पन्न होता है, अतएव वह शुद्धनाम नहीं है। वह जड़ीय शब्द अथवा अक्षरका एकत्रित होना मात्र है। वह शुद्धनामके उच्चारणके फलका अर्थात् कृष्णप्रेम प्राप्तिका बाधक मात्र है। दूसरी ओर, यहाँपर सेवोन्मुख व्यक्तिका अस्फुट अथवा खण्ड आंशिक नामोच्चारण रूपी व्यवधान ही उद्दिष्ट हुआ है, जिस कारण उसके होनेपर भी श्रीनामप्रभु सेवोन्मुख व्यक्तिके श्रद्धायुक्त हृदयमें अपने प्रभाव अर्थात् अनर्थोंके नाश और प्रेमोदयरूपी फलके दानकी शक्ति प्रकटित करते हैं॥59॥ अनुभाष्य— दंष्ट्रि... सः) म्लेच्छः (यवनः) 'हाराम' इति (यावनिक-भाषायाम् अस्पृश्यत्वज्ञापकं शब्दविशेषं) पुनः पुनः उक्त्वा अपि मुक्तिं (नामाभासबलेन भवबन्धनात् मोचनम्) आप्नोति (आप); श्रद्धया गृणन् [नामः बलेन] किं पुनः [वक्तव्यम्]? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। यवनोंकी भाषामें 'हाराम' किसी अछूत वस्तुको बतलानेवाला विशेष शब्द है॥56॥
74 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/60 ] दस-अपराध रहित नामाभासके श्रवण, कीर्तन और स्मरणके फलसे ही अनर्थ-नाश; नामापराधसे—अनर्थनिवृत्ति और प्रेममें बाधा :— पद्मपुराण-वचन— नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोत्रमूलं गतं वा शुद्धं वाशुद्धवर्णं व्यवहित-रहितं तारयत्येव सत्यम्। तच्चेद्देह-द्रविण-जनता-लोभ-पाषण्ड-मध्ये निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्नमेवात्र विप्र॥ 60 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक हरिनास भी जिसके मुखमें उदित होता है, स्मरणके पथ अथवा कानमें जाता है, वह नाम शुद्धवर्णके द्वारा ही कहा जाय अथवा त्रुटियुक्त अशुद्धवर्णके द्वारा ही कहा जाय, त्रुटि रहित ही हो, अथवा खण्ड-उच्चारित ही हो, नाम-ग्रहण करनेवालेका अवश्य ही उद्धार करेगा। हे विप्र, नामका ऐसा माहात्म्य है, किन्तु यदि वह नामाक्षर देह, धन, पुत्र-परिवार तथा लोभ आदि पाषाणरूप अपराधोंके ऊपर पतित होनेपर [अर्थात् उनके उद्देश्यसे लेनेपर] शीघ्र फलजनक नहीं होता अर्थात् नामापराधसे निवृत्तिका जो उपाय है, उसका आश्रय नहीं करनेपर नामापराध दूर नहीं होता। (‘लोभ-पाषण्ड-मध्ये’ ऐसा पाठ भी है) ॥ 60 ॥ अनुभाष्य— हे विप्र, एकं नाम (कृष्णनाम) यस्य (सुकृतिनः) वाचि (उच्चारितं) स्मरणपथगतं (स्मृतमित्यर्थः) श्रोत्रमूलं गतं (आकर्णितं) वा, शुद्धवर्णं अशुद्धवर्णं वा, व्यवहितरहितं (व्यवहितानि व्यवधानानि दशनामापराधुरूपाणि अन्तराणि तैः रहितं शून्यं निरन्तरमिति यावत्; यद्वा, व्यवहितं तद्रहितं च; तत्र ‘व्यवहितं’ शब्दान्तरेण अक्षरान्तरेण भावान्तरेण वा अन्तरितं, ‘तद्रहितं’ केनचिदंशेन हीनम् अपि) वा [सत्, तादृशोच्चारणकारिणं] तारयति (उद्धारयति) एव [इति] सत्यम्; चेत् (यदि) तत् (नाम) देह-द्रविण-जनता-लोभ-पाषण्ड-मध्ये (‘देहः’ नश्वरं कुणपं, ‘द्रविणं’ धनं, ‘जनता’ आभिजनस्य, स्त्रीजनस्य लोकसंग्रहमूलायाः प्रतिष्ठायाः वा स्पृहा, ‘लोभः’ असति बहिरर्थे लौल्यं, जिह्वालाम्पट्यं वा, ‘पाषण्डः’ हरिगुरुवैष्णवावज्ञारूपः अपराधः,—एतेषु मध्ये) निक्षिप्तं (विन्यस्तं, निजेन्द्रियतर्पणकामनार्ये प्रयुक्तं अनुशीलितं वा तदा) अत्र (इहलोके) [तुच्छफल- प्रदत्वात्] शीघ्रं (सद्यः) फलजनकं (परमफलप्रदं) न स्यात् (न भवेत्)। श्लोक-भावानुवाद—हे ब्राह्मण, एक कृष्णनाम जिस सुकृतिवान्के द्वारा उच्चारित होता अथवा उसके स्मरणपथपर आता है अथवा उसके कर्णमें प्रवेश करता है, वह शुद्धवर्ण हो अथवा अशुद्धवर्ण हो अथवा दशनामापराधस्वरूप बाधासे रहित अर्थात् निरन्तर हो अथवा जो नाम खण्ड-उच्चारित (शब्द अथवा अक्षर अथवा भावकी त्रुटियुक्त) हो अथवा चिद्-अंशसे भी रहित हो अर्थात् जड़भावसे भी किया जाय, वह नाम-उच्चारणकारीका उद्धार करता है, यह सत्य है। किन्तु यदि वह नाम नश्वर शरीर, धन, पुत्र-परिवार-स्त्री, प्रतिष्ठाकी लालसासे लोकसंग्रह, असत् लौकिक वस्तुएँ, असत् मत अथवा हरि-गुरु-वैष्णव-अवज्ञारूप अपराध आदि अपनी इन्द्रियोंको सन्तुष्ट करनेकी कामनासे लिया जाय, तो वह इस लोकमें तुच्छफल (सांसारिक नश्वर वस्तुएँ) प्रदान करेगा, किन्तु परमफल (कृष्णप्रेम) शीघ्र नहीं प्रदान करेगा। हरिभक्तिविलासके एकादश विलास 289 संख्याकी दिग्दर्शिनी टीकामें श्रीसनातन प्रभु— “वाचि गतं प्रसङ्गाद् वाङ्मध्ये प्रवृत्तमपि, स्मरणपथगतं कथञ्चिन्मनःस्पृष्टमपि, श्रोत्रमूलं गतं किञ्चित् श्रुतमपि; शुद्धवर्णं वा अशुद्धवर्णमपि वा, ‘व्यवहितं’ शब्दान्तरेण यद्व्यवधानं, वक्ष्यमाण-नारायण-शब्दस्य किञ्चिदुच्चारणानन्तरं प्रसङ्गादापतितं शब्दान्तरं तेन रहितं सत्; यद्वा, यद्यपि ‘हलं रिक्तम्’ इत्याद्युक्तौ हकार-रिकारयोर्व्यक्त्या हरीति नामास्त्येव, तथा ‘राजमहिषी’ इत्यत्र राम-नामापि, एवमन्यदप्यूह्यम्; तथापि तत्तन्नाम-मध्ये व्यवधायकमक्षरान्तरमस्तीत्येतादृश-व्यवधानरहितमित्यर्थः। यद्वा, व्यवहितञ्च तद्रहितञ्चापि वा तत्र ‘व्यवहितं’—नाम्नः किञ्चिदुच्चारणानन्तरं कथञ्चिदापतितं शब्दान्तरं समाधाय पश्चात्त्रामावशिष्टाक्षरग्रहणमित्येवं रूपं, मध्ये शब्दान्तरेणान्तरितमित्यर्थः, ‘रहितं’ पश्चादवशिष्टाक्षरग्रहणवर्जितं, केनचिदंशेन हीनमित्यर्थः। तथापि तारयत्येव, सर्वैभ्यः पापेभ्योऽपराधेभ्यश्च संसारादप्युद्धारयत्येवेति सत्यमेव। किन्तु नामसेवनस्य मुख्यं यत् फलं, तन्न सद्यः
[ 3/60-62 तीसरा अध्याय 75 ]
सम्पद्यते। तथा देहभरणाद्यर्थमपि नामसेवनेन मुख्यं फलमाशु न सिध्यतीत्याह—तच्चेदिति। तन्नाम चेत् यदि देहादिमध्ये निक्षिप्तं, देहभरणाद्यर्थमेव विन्यस्तं, तदापि फलजनकं न भवति किम्? अपि तु भवत्येव, किन्तु अत्र इहलोके शीघ्रं न भवति, किन्तु विलम्बेनैव भवतीत्यर्थः।” [अर्थात् “श्रीनाम 'वाचि गत' अर्थात् प्रसङ्गवशतः जिह्वापर प्रवृत्त होनेपर भी, 'स्मरणपथगत' अर्थात् किसी प्रकारसे मनसे स्पृष्ट होनेपर भी, 'श्रोत्रमूलं गत' अर्थात् थोड़ासा सुनायी देनेपर भी, शुद्धवर्ण अथवा अशुद्धवर्ण होनेपर भी एवं 'व्यवहितरहित'-व्यवहित अर्थात् शब्दान्तरके द्वारा जो व्यवधान, जैसे, (1) विचाराधीन 'नारायण'-शब्दके किञ्चित् उच्चारणके बाद प्रसङ्गवशतः आये किसी अन्य शब्द, उस प्रकारके व्यवधानसे रहित होकर, अथवा (2) यद्यपि 'हलं रिक्तम्', इस प्रकारकी उक्तिमें 'ह'-कार और 'रि'-कार इन दोनोंकी वृत्तिके द्वारा 'हरि', यह नाम बनता है, उसी प्रकार 'राजमहिषी'—कहनेपर उसमें 'राम' नाम भी होता है, इस प्रकार नहीं कहे गये अन्य जो सब नाम होते हैं, तथापि उन-उन नामोंके बीचमें व्यवधान उत्पन्न करनेवाले अन्य जो अक्षर वर्तमान रहते हैं, उस प्रकारके व्यवधानसे रहित—यही अर्थ है; अथवा (3) 'व्यवहितरहित'के अर्थमें 'व्यवहित' और 'उससे रहित', इनका इस प्रकार अर्थ भी होता है—यहाँपर 'व्यवहित'का अर्थ है—नामके किञ्चित् उच्चारणके पश्चात् किसी भी प्रकारसे आये अन्य शब्दको संलग्न करनेके पश्चात् नामके बचे हुए अक्षरको ग्रहण करना, इस प्रकारके बाधायुक्त-रूप अर्थात् शब्दान्तरके द्वारा बदला हुआ (व्यवहित) यही अर्थ, एवं 'तद्रहित'का अर्थ—नामका बचा हुआ जो अक्षर है, उसे ग्रहण किये बिना अर्थात् किसी अंशमें हीन (कम), यह अर्थ; तथापि उक्त नाम 'तारयत्येव' अर्थात् सब प्रकारके पापोंसे एवं अपराधोंसे यहाँ तक कि संसारसे भी उद्धार करता है—यह सत्य ही है; किन्तु नामसेवनका जो मुख्य फल है, वह शीघ्र ही प्राप्त नहीं होता। और देहभरणादिके लिये नामसेवनके द्वारा मुख्य फल शीघ्र सिद्ध नहीं होता—यही 'तच्चेद्' इत्यादि अंशसे कहा जा रहा है। वह नाम यदि देहादिमें निक्षिप्त होता है अर्थात् देहभरणादिके लिये विन्यस्त (रचित) होता है, ऐसा होनेपर भी क्या वह फलजनक नहीं होता? निश्चय ही होता है, तब भी 'अत्र' अर्थात् इस लोकमें, शीघ्र नहीं होता, किन्तु विलम्बसे होता है—यह अर्थ है।] मध्यलीला 16/72 संख्याका अनुभाष्य एवं भक्तिसन्दर्भकी 265 संख्यामें श्रीजीवप्रभुके द्वारा रचित इस श्लोककी कारिका देखें॥ 60॥ नामाभाससे समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति :— नामाभास हैते हय सर्वपापक्षय। नामाभास हैते हय संसारेर क्षय॥ 61॥ अनुवाद—नामाभाससे समस्त प्रकारके पापोंका नाश होता है और नामाभाससे संसार-बन्धन कट जाता है॥ 61॥ नामाभाससे महापातकका नाश :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/103)— तं निर्व्याजं भज गुणनिधे पावनं पावनानां श्रद्धा-रज्यन्मतिरतितरामुत्तमःश्लोकमौलिम्। प्रोद्यन्नन्तःकरणकुहरे हन्त यन्नामभानो- राभासोऽपि क्षपयति महापातकध्वान्तराशिम्॥ 62॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 62॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गुणनिधे, आप परमपावन उत्तमःश्लोक शिरोमणि श्रीकृष्णका श्रद्धामूलक मतिके साथ अति शीघ्र सरलभावसे भजन करो; क्योंकि उनके नामरूपी सूर्यका आभास भी अन्तःकरणमें उदित होनेपर महापापरूपी अन्धकारसमूहको विनष्ट कर देता है॥ 62॥ अनुभाष्य— हे गुणनिधे, यन्नामभानोः (यस्य भगवतः नाम एव भानुः भास्करः तस्य नामरूपिणः सूर्यस्य) आभासः
76 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/62-68 ] (अपराधरूपतमोऽतीतः ईषत् प्रकाशः) अन्तःकरणकुहरे (चित्तगह्वरे) (उच्चारयन्) धाम (वैकुण्ठपदं) अगात् (जगाम), श्रद्धया प्रोद्यन् (प्रकटयन्) महापातकध्वान्तराशिं (महापातकम् एव (अप्राकृत-दृढ़विश्वासेन सह तत् नाम) गृणन् [सन्] किमुतः ध्वान्तं तस्य राशिम् अन्धकारततिं) हन्त क्षपयति (दूरीकरोति), (किं वक्तव्यम्)? तं पावनानां पावनं (पवित्री कुर्वतां तीर्थानाम् अपि पावनं श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63 ॥ पवित्र्यकरम्) उत्तमःश्लोकमौलिम् (उत् उद्गच्छति तमः यस्मात् तथाभूतः श्लोकः कीर्त्तिः येषां तेषां मौलिं शिरोभूषणं) तं श्लोकका अर्थ :- (श्रीकृष्णं) श्रद्धा-रज्यन्मतिः (श्रद्धया सुदृढ़विश्वासेन रज्यन्ती नामाभासे 'मुक्ति' हय सर्वशास्त्रे देखि। उल्लसन्ती रागमयी मतिः बुद्धिः यस्य तथाभूतः सन्) अतितरां श्रीभागवते ता'ते अजामिल-साक्षी॥" 64 ॥ (शीघ्रं) निर्व्याजं (निष्कपटं यथा स्यात्तथा) भज। श्लोक-भावानुवाद-हे गुणनिधे, जिन भगवान् श्रीकृष्णके अनुवाद-नामाभाससे मुक्ति होती है, ऐसा सभी नामरूपी सूर्यका आभास अर्थात् अपराधरूपी तमः से शास्त्रोंमें दिखलायी देता है। श्रीभागवतमें वर्णित अजामिल अतीत अल्प प्रकाश चित्तरूपी गुहामें प्रकट होते ही इसके साक्षी हैं॥" 64 ॥ महापापके अन्धकारसमूहको नष्ट करके दूर कर देता महाप्रभुके हर्षकी वृद्धि, पुनः प्रश्न :- है, आप इन पवित्रकारी तीर्थोंको भी पवित्र करनेवाले शुनिया प्रभुर सुख बाड़ये अन्तरे। सर्वश्रेष्ठ कीर्त्तिवाले श्रीकृष्णका सुदृढ़ विश्वासके साथ पुनरपि भङ्गी करि' पुछये ताँहारे॥ 65 ॥ रागमयी मति युक्त होकर शीघ्र निष्कपट भावसे भजन स्थावर-जङ्गम-जीवोंके उद्धारके उपायकी जिज्ञासा :- करो॥ 62 ॥ “पृथिवीते बहुजीव—स्थावर-जङ्गम। नामाभाससे मुक्ति :- इहा सबार कि-प्रकारे हइबे मोचन ?” 66 ॥ श्रीमद्भागवत (6/2/49) में- म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम्। अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर महाप्रभुके अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन्॥ 63 ॥ हृदयमें आनन्द वर्धित हो रहा था, इसलिये उन्होंने भङ्गिमाके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरसे पूछा,-“पृथ्वीपर तो अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63 ॥ स्थावर और जङ्गम-बहुत प्रकारके जीव हैं। इन अमृतप्रवाह भाष्य-पुत्रको लक्ष्य करके हरिनाम सबका उद्धार किस प्रकार होगा?" 65-66 ॥ ग्रहण करके ही मरणोन्मुख अजामिलने जब वैकुण्ठधाममें गमन किया, तब श्रद्धापूर्वक नाम लेनेसे क्या होगा, उसे श्रीहरिदासका उत्तर :- कहा नहीं जा सकता (वैकुण्ठगमनकी तो बात ही हरिदास कहे,-“प्रभु, से कृपा तोमार। नहीं) ॥ 63 ॥ स्थावर-जङ्गम आगे करियाछ निस्तार ॥ 67 ॥ अनुभाष्य-मृत्युके समय सङ्केत नामाभासके फलसे अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने उत्तर दिया,-“हे प्रभो ! पापमुक्त अजामिलके पुनर्जीवन प्राप्त करनेके बाद आपने अपनी कृपासे स्थावर और जङ्गम जीवोंका पश्चात्ताप सहित श्रीहरिकी आराधनाके फलसे वैकुण्ठमें पहलेसे ही उद्धार कर दिया है॥ 67 ॥ जानेका वर्णन करके श्रीशुकदेव गोस्वामी अध्यायके स्थावर और जङ्गम, दोनों प्रकारके जीवोंके लिये अन्तमें राजा परीक्षितको प्रसङ्गवशतः नामाभास और उच्चनाम-सङ्कीर्तन श्रवणके प्रभावका वर्णन :- शुद्धनामके माहात्म्यके वैशिष्ट्यका वर्णन कर रहे हैं- तुमि ये करियाछ एड उच्च सङ्कीर्त्तन । अजामिलः म्रियमाणः (मृत्युमुखासीनः अवशत्वेन श्रद्धाविहीनोऽपि) स्थावर-जङ्गमेर सेइ हयत' श्रवण ॥ 68 ॥ पुत्रोपचारितं (नारायणेति पुत्र-नामतया कथितं) हरेः नाम गृणन्
[ 3/68-77 तीसरा अध्याय 77 अनुवाद—आपने जो उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन किया है, स्थावर और जङ्गम—सभीने ही तो वह सुना है जिससे उनका कल्याण हो गया है ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—उच्च-सङ्कीर्तनका प्रभाव—चैःभाः आदिखण्ड 16/277-291 संख्या एवं महाप्रभुके द्वारा सङ्कीर्तनका प्रवर्त्तन—आदिलीला 3/76 संख्या और मध्यलीला 11/97-98 संख्या देखें ॥ 68 ॥ शुनिया जङ्गमेर हय संसार-क्षय। स्थावरे शब्द लागे, प्रतिध्वनि हय ॥ 69 ॥ 'प्रतिध्वनि' नहे, सेइ करये 'कीर्त्तन'। तोमार कृपार एइ अकथ्य कथन ॥ 70 ॥ अनुवाद—आपके उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिको सुनकर जङ्गम प्राणियोंका संसार क्षय हो गया है। स्थावर प्राणियोंसे उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिके टकरानेसे उनसे भी प्रतिध्वनि होती है। वास्तवमें वह प्रतिध्वनि नहीं, अपितु स्थावर प्राणियोंके द्वारा किया जानेवाला कीर्तन ही है। आपकी कृपाका यह अचिन्त्य कथन है ॥ 69-70 ॥ सकल जगते हय उच्च सङ्कीर्त्तन। शुनिया प्रेमावेशे नाचे स्थावर-जङ्गम ॥ 71 ॥ अनुवाद—आपकी कृपासे समस्त जगत्में उच्च-सङ्कीर्तन हो रहा है, जिसे सुनकर स्थावर तथा जङ्गम प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे हैं ॥ 71 ॥ महाप्रभुकी लीलासे उच्च-सङ्कीर्तनके श्रवणके दृष्टान्तका प्रदर्शन :- यैछे कैला झारिखण्डे वृन्दावन याइते। बलभद्र-भट्टाचार्य कहियाछेन आमाते ॥ 72 ॥ अनुवाद—आपने वृन्दावन जाते समय झारिखण्डके वनमें उच्च-सङ्कीर्तन किया था, उसके प्रभावसे जो कुछ घटित हुआ था, वह सब बलभद्र भट्टाचार्यने मुझे बतलाया है ॥ 72 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/24-54 संख्या देखें ॥ 72 ॥ वासुदेव जीव लागि' कैल निवेदन। तबे अङ्गीकार कैला जीवेर मोचन ॥ 73 ॥ अनुवाद—जिस समय श्रीवासुदेव दत्तने जीवोंके उद्धारके लिये आपसे निवेदन किया था, उस समय आपने जीवोंका उद्धार करना स्वीकार किया था॥ 73 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 15/159-179 संख्या देखें॥ 73 ॥ जगद्गुरु आचार्यरूपमें नाम-प्रेम प्रचारके द्वारा महाप्रभुकी जीवोंके उद्धारकी लीलाके रहस्यका उद्घाटन :- जगत् निस्तारिते तोमार अवतार। भक्तभाव आगे तांते कैला अङ्गीकार ॥ 74 ॥ उच्च सङ्कीर्त्तन तांते करिला प्रचार। 'स्थिर'-'चर' जीवेर खण्डाइला संसार ॥ ”75 ॥ अनुवाद—समस्त जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है। उसपर भी आपने भक्तके भावको अङ्गीकार करके स्वयं उच्च-सङ्कीर्तनका प्रचार किया है। आपने उसके द्वारा स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंका संसार-मोचन कर दिया है॥” 74-75 ॥ अनुभाष्य—'स्थिर-चर',—स्थावर और जङ्गम ॥ 75 ॥ महाप्रभुके द्वारा जीवोंकी मुक्तिकी प्राप्तिके बाद ब्रह्माण्डकी अवस्थाकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“सब जीव मुक्ति यबे पाबे। एइ त' ब्रह्माण्ड तबे जीवशून्य हबे ! !”76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यदि समस्त जीवोंको ही मुक्तिकी प्राप्ति हो जायेगी, तब तो यह ब्रह्माण्ड जीवोंसे रहित हो जायेगा ॥ ”76 ॥ श्रीहरिदासका उत्तर; महाप्रभुकी कृपासे उनके प्रकटकालीन समस्त जीवोंके उद्धारके बाद पुनः कारणोदशायी महाविष्णुसे प्रकटित जीवोंके द्वारा जगत् व्याप्ति :- हरिदास बोले,—“तोमार यावत् मर्त्ये स्थिति। तावत् स्थावर-जङ्गम, सर्व जीव-जाति ॥ 77 ॥
78 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/77-84 ] सब मुक्त करि' तुमि वैकुण्ठे पाठाइबा। सूक्ष्मजीवे पुनः कर्मे उद्बुद्ध करिबा॥ 78 ॥ सेइ जीव हबे इँहा स्थावर-जङ्गम। ताहाते भरिबे ब्रह्माण्ड येन पूर्व-सम॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जब तक आप इस मर्त्यलोकमें हैं, तब तक आप स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंको मुक्त करके वैकुण्ठमें भेज देंगे तथा सूक्ष्म जीवोंको पुनः कर्ममें प्रवृत्त कर देंगे। वे जीव फिर यहाँपर स्थावर-जङ्गम बनेंगे और उनसे यह ब्रह्माण्ड फिरसे पूर्वकी भाँति ही भर जायेगा॥ 77-79 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रभो, आपने ब्रह्माण्डमें अवतीर्ण होकर जितने जीवोंके साथ सम्बन्ध बनाया है, सभीका उद्धार हो जायेगा। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड यद्यपि उद्धार प्राप्त कर लेगा, तथापि आप अनन्त सूक्ष्मजीवोंको कर्मक्षेत्रमें पुनः प्रवृत्त करेंगे। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड पुनः जीवोंके द्वारा परिपूर्ण हो जायेगा॥ 78 ॥ पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रके द्वारा जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या लञा। वैकुण्ठके गेला, अन्यजीवे अयोध्या भराञा॥ 80 ॥ अनुवाद—पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्र लीला सम्वरण करके समस्त अयोध्यावासियोंको वैकुण्ठ लेकर चले गये थे। उन्होंने अयोध्याको पुनः अन्य जीवोंसे भर दिया था॥ 80 ॥ अनुभाष्य—रामायण (बङ्गवासी संस्करण)में उत्तरकाण्डके 122 वें सर्गके 21-22 श्लोक एवं 123 सर्ग देखें॥ 80 ॥ अवतारि' तुमि ऐछे पातियाछ हाट। केह ना बुझिते पारे तोमार गूढ़ नाट॥ 81 ॥ अनुवाद—आपने भी अवतरित होकर वैसी ही लीला प्रकटित की है। आपकी गूढ़-लीलाको कोई भी नहीं समझ सकता॥ 81 ॥ पूर्वकालमें श्रीकृष्णके द्वारा की गयी जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन व्रजे कृष्ण करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेरे खण्डाइला संसार॥ 82 ॥ अनुवाद—पहले जैसे श्रीकृष्णने भी व्रजमें अवतरित होकर ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंको संसार-बन्धनसे मुक्त कर दिया था॥ 82 ॥ श्रीकृष्णमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके उद्धारका सामर्थ्य :— श्रीमद्भागवत (10/29/16) में— न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे। योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद्विमुच्यते॥ 83 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनसे यह स्थावर-अस्थावर जगत् सम्पूर्ण रूपमें विमुक्त होता है, जन्मरहित भगवान् योगेश्वर उन श्रीकृष्णके कार्योंमें ऐसा विस्मय प्रकाशित करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 83 ॥ अनुभाष्य—रासपूर्णिमाकी रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनि श्रवण करके श्रीकृष्णके मिलन-सङ्गकी कामना करनेवाली गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन करते करते श्रीशुकदेव परीक्षितको परमेश्वर श्रीकृष्णकी महिमाका कीर्तन करते हुए उपदेशरूपी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं— हे राजन्, यतः (श्रीकृष्णात्) एतत् [स्थावरजङ्गमादिकमपि प्राणिमात्रं विमुच्यते, अतः) भवता भगवति (सर्वैश्वर्यसमन्विते) अजे (स्वयमाविर्भूते) योगेश्वरेश्वरे (योगैश्वर्याणामधीश्वरे परमे परमात्मनि) कृष्णे एवं [मोक्षदानशक्तौ] विस्मयः न च एव कार्यः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ विष्णुपुराण (4/15/17) में— अयं हि भगवान् दृष्टः कीर्त्तितः संस्मृतश्च द्वेषानुबन्धेनाप्यखिल- सुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति, किमुत सम्यग्भक्तिमताम् इति॥ 84 ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:
[ 3/84-90 तीसरा अध्याय 79
[बायाँ कॉलम]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् द्वेषभावसे देखने, कहने या स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल दिया करते हैं, तब सम्पूर्ण रूपसे भक्तिमान् व्यक्तियोंके सम्बन्धमें तो बात ही क्या ? 84 ॥ अनुभाष्य- द्वेषानुबन्धेनापि (शत्रुभावेनापि) अयं भगवान् हि दृष्टः (अवलोकितः), कीर्तितः (वाचा उच्चारितः) [मनसा] संस्मृतः च अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं (मोक्षादिकं) प्रयच्छति, उत सम्यग्भक्तिमताम् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानाद्यभक्तिमार्गत्रयत्यागपराणां शुद्धभक्तानां) किं [वक्तव्यम्]? श्लोक-भावानुवाद-ये भगवान् शत्रुभावसे देखने, बोलने अथवा मनके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल मोक्षादि दिया करते हैं, तब अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञानादि-तीन अभक्ति मार्गोंका त्याग करनेवाले शुद्धभक्तोंके सम्बन्धमें तो क्या कहा जाय ? ॥ 84 ॥ महाप्रभुके प्रकटकालमें ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंका ही उद्धार :- तैछे तुमि नवद्वीपे करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेर करिला निस्तार ॥ 85 ॥ अनुवाद-उसी प्रकार आपने नवद्वीपमें अवतरित होकर समस्त ब्रह्माण्डके जीवोंका उद्धार कर दिया है ॥ 85 ॥ श्रीहरिदासका दैन्य- ये कहे, - 'चैतन्य-महिमा मोर गोचर हय।' से जानुक, मोर पुनः एइ त' निश्चय ॥ 86 ॥ तोमार ये लीला महा-अमृतेर सिन्धु। मोर मनोगोचर নহে तार एकबिन्दु ॥" 87 ॥ अनुवाद-जो कहता है,-'मैंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको जान लिया है', तो वह जाने। किन्तु मेरा तो
[दायाँ कॉलम]
अन्तिम निर्णय यही है कि आपकी जो लीला महा-अमृतके सिन्धुके समान है, उसकी एक भी बूँद मेरे मनके गोचर नहीं है॥" 86-87 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/25-26 संख्या और भाः 10/14/36 देखें ॥ 86-87 ॥ भक्तके द्वारा भगवान्की लीलाके रहस्यके उद्घाटनकी क्षमतासे भगवान्को भी विस्मय :- एत शुनि' प्रभुर मने चमत्कार हैल। 'मोर गूढ़लीला हरिदास केमने जानिल ?' 88 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर महाप्रभुके मनमें आश्चर्य हुआ-'मेरी गूढ़लीलाको हरिदासने कैसे जान लिया ?' 88 ॥ अनुभाष्य - 'गूढ़लीला', - जीवोद्धार-लीला ॥ 88 ॥ महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- मनेर सन्तोषे ताँरे कैला आलिङ्गन। बाह्य प्रकाशिते एसब करिला वर्जन ॥ 89 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया। उन्होंने बाह्यदशा प्रकाशित करके श्रीहरिदास ठाकुरको उनकी महिमाका और गान करनेके लिये मना किया ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीहरिदासके समस्त तात्त्विक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए, किन्तु बाह्यदशा प्रकाश करके अपने स्तुतिवाक्य कहनेसे मना किया ॥ 89 ॥ भक्तोंके वशमें भगवान् :- ईश्वर-स्वभाव,-ऐश्वर्य चाहे आच्छादिते। भक्त-ठाञि लुकाइते नारे, हय त' विदिते ॥ 90 ॥ अनुवाद-ईश्वर सदा अपने ऐश्वर्यको आच्छादित करना चाहते हैं-यह ईश्वरका स्वभाव है। किन्तु भक्तोंके समक्ष उनका ऐश्वर्य छिप नहीं पाता, यह सब जानते हैं ॥ 90 ॥
80 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/90-98 ] अनुभाष्य—आदिलीला 3/86-89 संख्या देखें ॥ 90 ॥ भक्तके निकट अजित भी पराजित, वैकुण्ठ भी मापने योग्य :— आलवन्दारु अथवा श्रीयामुनाचार्यकृत-स्तोत्ररत्न (18)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमतिशायि- सम्भावनं तव परिव्रढ़िमस्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः ॥ 91 ॥ अनुवाद—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन— इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/88 संख्या देखें ॥ 91 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी प्रशंसा :— तबे महाप्रभु निजभक्त-पाशे याञा। हरिदासेर गुण कहे शतमुख हञा ॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके पास गये और श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका गान करने लगे मानो उनके एक सौ मुख हों ॥ 92 ॥ भक्तगुणोंका कीर्तन करनेवाले भगवान् :— भक्तेर गुण कहिते प्रभुर बाड़ये उल्ल़ास। भक्तगण-श्रेष्ठ तांते श्रीहरिदास ॥ 93 ॥ अनुवाद—भक्तोंके गुणोंका गान करनेसे महाप्रभुका उल्लास बढ़ता ही जाता है, और उसपर भी श्रीहरिदास ठाकुर तो उन भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ 93 ॥ ठाकुर श्रीहरिदासकी अनन्त गुण-राशि :— हरिदासेर गुणगण—असंख्य, अपार। केह कोन अंशे वर्णि' नाहि पाय पार ॥ 94 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके गुण असंख्य, अपार हैं। कोई उनके गुणोंके एक अंशका भी सम्भवतः वर्णन कर सके, किन्तु उनके समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ 94 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीठाकुरके गुण आंशिक रूपसे वर्णित :— चैतन्यमङ्गले श्रीवृन्दावन दास। हरिदासेर गुण किछु करियाछेन प्रकाश ॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन दास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका कुछ प्रकाश किया है ॥ 95 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चैतन्यमङ्गले',—श्रीचैतन्यभागवत आदिखण्डका चौदहवाँ अध्याय देखें ॥ 95 ॥ अपने चित्तकी शुद्धिके लिये श्रीहरिदासके चरित्र-सिन्धुके बिन्दुका स्पर्श :— सब कहा ना याय हरिदासेर चरित्र। केह किछु कहे करिते आपना पवित्र ॥ 96 ॥ अनुवाद—कोई भी श्रीहरिदास ठाकुरके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं कर सकता है। कोई स्वयंको पवित्र करनेके लिये उनके कुछ गुणोंका वर्णन कर सकता है ॥ 96 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें अवर्णित चरित्रके अंशके वर्णनकी ही प्रतिज्ञा :— वृन्दावनदास याहा ना कैला वर्णन। हरिदासेर गुण किछु शुन, भक्तगण ॥ 97 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! अब आप श्रीहरिदास ठाकुरके कुछ गुणोंका श्रवण करो जिनका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारसे वर्णन नहीं किया ॥ 97 ॥ बेनापोलमें श्रीठाकुरके द्वारा रामचन्द्र-खाँनके द्वारा प्रेरित वेश्याके उद्धारका वृत्तान्त :— हरिदास यबे निजगृह त्याग कैला। बेनापोलेर वन-मध्ये कतदिन रहिला ॥ 98 ॥
[ 3/98-107 तीसरा अध्याय 81 अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने जब अपने घरका त्याग किया, तब वे बेनापोलके वनमें आकर कुछ दिनों तक रहे॥98॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बेनापोल',—यशोहर-जिलेका एक ग्राम ॥ 98 ॥ अनुभाष्य—'बेनापोल',—ई, वि, आर, रेल लाइनमें खुलनाके मार्गपर बनगाँओ जंक्शनके बाद बेनापोल स्टेशन (वर्तमानमें बाङ्गलादेशमें) है; उसका निकटवर्ती स्थान ही 'बेनापोल' है ॥ 98 ॥ निर्जन-वने कुटीर करि' तुलसी-सेवन। रात्रि-दिने तिन लक्ष नामसङ्कीर्त्तन ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने निर्जन वनमें एक कुटिया बनायी और वहाँपर उन्होंने तुलसीजीका पौधा लगाया और वे उनकी सेवा करते थे। वे प्रतिदिन रात-दिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे ॥ 99 ॥ ब्राह्मणेर घरे करे भिक्षा-निर्वाहण। प्रभावे सकल लोक करये पूजन ॥ 100 ॥ अनुवाद—वे शरीरका निर्वाह किसी ब्राह्मणके घरसे भिक्षा माँगकर करते थे। श्रीहरिदास ठाकुरके भजनका ऐसा प्रभाव था कि उस क्षेत्रके सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे ॥ 100 ॥ सेइ देशाध्यक्ष नाम—रामचन्द्र खाँन। वैष्णवविद्वेषी सेइ पाषण्ड-प्रधान ॥ 101 ॥ अनुवाद—उस बेनापोलके ज़मींदारका नाम रामचन्द्र-खाँन था। वह वैष्णव-विद्वेषी और महा पाखण्डी था ॥ 101 ॥ हरिदासे लोके पूजे, सहिते ना पारे। ताँर अपमान करिते नाना उपाय करे ॥ 102 ॥ अनुवाद—लोग श्रीहरिदास ठाकुरको इतना सम्मान देते थे, यह रामचन्द्र खाँनसे सहन नहीं हुआ। इसलिये वह श्रीहरिदास ठाकुरको अपमानित करनेके लिये अनेक उपाय करने लगा ॥ 102 ॥ कोनप्रकारे हरिदासेर छिद्र नाहि पाय। वेश्यागणे आनि' करे छिद्रेर उपाय ॥ 103 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन श्रीहरिदास ठाकुरके चरित्रमें किसी प्रकारका कोई दोष ढूँढ़ नहीं पाया। तब उसने वेश्याओंको बुलवाकर श्रीहरिदास ठाकुरको पतित करनेका षड़यन्त्र रचा ॥ 103 ॥ वेश्यागणे कहे, —“एइ वैरागी हरिदास। तुमि-सब कर इहार वैराग्य नाश ॥” 104 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने वेश्याओंसे कहा, —“हरिदास नामक एक वैरागी है। तुम सब किसी प्रकारसे इसके वैराग्यका नाश करो ॥” 104 ॥ वेश्यागण-मध्ये एक सुन्दरी युवती। से कहे, —“तिनदिने हरिब ताँर मति ॥” 105 ॥ अनुवाद—उन वेश्याओंमें एक अत्यन्त सुन्दरी युवती थी। उसने कहा, —“मैं केवल तीन दिनमें ही हरिदासकी मतिको हर लूँगी ॥” 105 ॥ खाँन कहे, —“मोर पाइक याउक तोमार सने। तोमार सहित एकत्र तारे धरि' येन आने ॥” 106 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खानने कहा, —“मेरा सिपाही तुम्हारे साथ जायेगा। जैसे ही वह हरिदासको तुम्हारे साथ देखेगा, उसे रङ्गे हाथों पकड़कर ले आयेगा ॥” 106 ॥ वेश्या कहे, —“मोर सङ्ग हउक एकबार। द्वितीयबारे धरिते पाइक लइमु तोमार ॥” 107 ॥ अनुवाद—वेश्याने कहा, —“पहले एकबार मेरे साथ उसका सङ्ग होने दो, फिर दूसरी बार मैं आपके सिपाहीको उसे पकड़नेके लिये साथ ले जाऊँगी ॥” 107 ॥
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82 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/108-120 ] रात्रिकाले सेइ वेश्या सुवेश धरिया। हरिदासेर वासाय गेल उल्लसित हञा॥ 108 ॥ अनुवाद—रात्रिकालमें बहुत आकर्षक वेश धारण करके वह वेश्या बहुत प्रसन्न होकर श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियामें गयी॥ 108 ॥ तुलसी नमस्करि' हरिदासेर द्वारे याञा। गोसाञिरे नमस्करि' रहिला दाण्डाञा॥ 109 ॥ अनुवाद—उस वेश्याने कुटियाके बाहर तुलसीजीको प्रणाम किया और श्रीहरिदास ठाकुरकी कुटियाके द्वारपर जाकर उनको नमस्कार किया तथा वह वहीं खड़ी हो गयी॥ 109 ॥ अङ्ग उघाड़िया देखाय बसिया दुयारे। कहिते लागिला किछु सुमधुर स्वरे॥ 110 ॥ “ठाकुर, तुमि—परमसुन्दर, प्रथम यौवन। तोमा देखि' कोन् नारी धरिते पारे मन??111॥ तोमार सङ्गम लागि' लुब्ध मोर मन। तोमा ना पाइले प्राण ना याय धारण॥” 112 ॥ अनुवाद—फिर वह वेश्या अपने अङ्गोंको कुछ अनावृत करके श्रीहरिदास ठाकुरको दिखलाते हुए द्वारपर बैठ गयी और सुमधुर स्वरमें कहने लगी,—“हे ठाकुर! आप परम सुन्दर हैं और आपने अभी-अभी युवावस्थामें प्रवेश किया है। आपको देखकर कौन-सी नारी अपने मनको वशमें रख सकती है? आपके साथ सङ्गम करनेके लिये मेरा मन लालायित हो रहा है। आपको प्राप्त नहीं कर पानेकी स्थितिमें मैं प्राण धारण नहीं कर पाऊँगी॥” 110-112 ॥ हरिदास कहे,—“तोमा करिमु अङ्गीकार। संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् ना समाप्त आमार॥ 113 ॥ तावत् तुमि बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम-समाप्त हैले करिमु ये तोमार मन॥” 114 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं अवश्य ही तुम्हें अङ्गीकार करूँगा, किन्तु जब तक मेरे नाम-कीर्त्तनकी संख्या पूर्ण नहीं हो जाय, तब तक तुम यहीं बैठकर भगवद्-नाम-सङ्कीर्त्तनका श्रवण करो। जब मेरी नाम-संख्या समाप्त हो जायेगी, तब मैं तुम्हारे मनकी इच्छा पूर्ण करूँगा॥” 113-114 ॥ एत शुनि' सेइ वेश्या बसिया रहिला। कीर्त्तन करे हरिदास प्रातःकाल हैला॥ 115 ॥ अनुवाद—यह सुनकर वह वेश्या वहीं बैठी रही और श्रीहरिदास ठाकुर अपना नाम-सङ्कीर्त्तन करते रहे। नाम-सङ्कीर्त्तन करते-करते प्रातःकाल हो गया॥ 115 ॥ प्रातःकाल देखि' वेश्या उठिया चलिला। समाचार रामचन्द्र खाँनेरे कहिला॥ 116 ॥ “आजि आमार सङ्ग करिबे कहिला वचने। अवश्य ताहार सङ्गे हइबे सङ्गमे॥” 117 ॥ अनुवाद—प्रातःकाल देखकर वह वेश्या वहाँसे उठकर चली गयी और उसने रामचन्द्र खाँनको जाकर सब समाचार दिया तथा कहने लगी,—“हरिदासने वचन दिया है कि वह आज मेरा सङ्ग करेगा, इसलिये अवश्य ही उसके साथ मेरा सङ्गम होगा॥” 116-117 ॥ आर दिन रात्रि हैले वेश्या आइल। हरिदास ता'रे बहु आश्वास करिल॥ 118 ॥ “कालि दुःख पाइला, अपराध ना लाइबा मोर। अवश्य करिमु आमि तोमाय अङ्गीकार॥ 119 ॥ तावत् इँहा बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम पूर्ण हैले, पूर्ण हबे तोमार मन॥” 120 ॥ अनुवाद—अगले दिवस रात्रि होनेपर वह वेश्या श्रीहरिदासकी भजन कुटियामें आयी, तब श्रीहरिदासने उसे बहुत प्रकारसे आश्वासन दिया,—“कल तुम्हें मेरे कारण दुःख हुआ, इसके लिये मेरा कोई अपराध मत