श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2090, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/52-59 तीसरा अध्याय 73 महाप्रेमसे—'हा राम, हा राम' पुकारता है। आप इन यवनोंका भाग्य देखिये, ये भी उसी नामका उच्चारण करते हैं॥52-54॥ अजामिलका पुत्रनाम-सङ्केतसे नामाभास :- अजामिल पुत्रे बोलाय बलि' 'नारायण'। विष्णुदूत आसि' छाड़ाय ताहार बन्धन॥57॥ नामाभासका अतुलनीय प्रभाव :- यद्यपि अन्यत्र सङ्केते हय नामाभास। तथापि नामेर तेज ना हय विनाश॥55॥ अनुवाद—यमदूतोंको देखकर भयभीत हुए अजामिलने अपने पुत्रको 'नारायण' कहकर पुकारा था, किन्तु उस नामके उच्चारणसे ही विष्णुदूतोंने आकर यमदूतोंसे उसके बन्धनको छुड़वाया था॥57॥ अनुवाद—यद्यपि भगवान्के अतिरिक्त किसी अन्यको लक्ष्य करके भगवद्-नामका उच्चारण करनेसे नामाभास होता है, तथापि नामकी अप्राकृत शक्ति नष्ट नहीं होती॥55॥ 'हा राम'-उच्चारणसे नामाभास :- 'राम' दुइ अक्षर इहा नहे व्यवहित। प्रेमवाची 'हा'-शब्द ताहाते भूषित॥58॥ अनुवाद—'राम' नाममें दो अक्षर 'रा' और 'म' हैं और वे पृथक्-पृथक् नहीं हैं तथा वे प्रेम दर्शानेवाले 'हा' शब्दसे विभूषित हैं॥58॥ नृसिंह-पुराण-वचन— दंष्ट्रि... उक्त्वापि मुक्तिमाप्नोति किं पुनः श्रद्धया गृणन्॥56॥ नामका अतुलनीय तेज :- नामेर अक्षर-सबरे एइ त' स्वभाव। व्यवहित हैले ना छाड़े आपन-प्रभाव॥59॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥56॥ अनुवाद—नामके समस्त अक्षरोंका यही तो स्वभाव है कि व्यवहित (अनुचित उच्चारण) होनेपर भी अपने प्रभावको नहीं छोड़ते॥59॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी म्लेच्छने किसी जंगली सूअरके द्वारा दाँतोंसे आघात किये जानेपर घृणापूर्वक 'हाराम', 'हाराम' यह शब्द बोलनेपर भी मृत्युके समय मुक्तिको प्राप्त किया था। 'हाराम'-शब्दमें 'हा राम' यह साङ्केतिक 'राम' शब्द होनेपर, उस म्लेच्छका नामके सङ्केतसे (नामाभासके बलसे) उद्धार हो गया। श्रद्धापूर्वक 'राम'-नाम लेनेसे क्या होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥56॥ अनुभाष्य—'व्यवहित',—यहाँपर, वर्ण अथवा अक्षरगत व्यवधान अथवा तत्त्वगत व्यवधान उद्दिष्ट नहीं हुआ है। क्योंकि, वैसा जड़ीय व्यवधान—श्रद्धाहीन जीवोंके आत्मेन्द्रिय तर्पण अथवा जड़ीय भोग परायण प्रवृत्तिसे उत्पन्न होता है, अतएव वह शुद्धनाम नहीं है। वह जड़ीय शब्द अथवा अक्षरका एकत्रित होना मात्र है। वह शुद्धनामके उच्चारणके फलका अर्थात् कृष्णप्रेम प्राप्तिका बाधक मात्र है। दूसरी ओर, यहाँपर सेवोन्मुख व्यक्तिका अस्फुट अथवा खण्ड आंशिक नामोच्चारण रूपी व्यवधान ही उद्दिष्ट हुआ है, जिस कारण उसके होनेपर भी श्रीनामप्रभु सेवोन्मुख व्यक्तिके श्रद्धायुक्त हृदयमें अपने प्रभाव अर्थात् अनर्थोंके नाश और प्रेमोदयरूपी फलके दानकी शक्ति प्रकटित करते हैं॥59॥ अनुभाष्य— दंष्ट्रि... सः) म्लेच्छः (यवनः) 'हाराम' इति (यावनिक-भाषायाम् अस्पृश्यत्वज्ञापकं शब्दविशेषं) पुनः पुनः उक्त्वा अपि मुक्तिं (नामाभासबलेन भवबन्धनात् मोचनम्) आप्नोति (आप); श्रद्धया गृणन् [नामः बलेन] किं पुनः [वक्तव्यम्]? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। यवनोंकी भाषामें 'हाराम' किसी अछूत वस्तुको बतलानेवाला विशेष शब्द है॥56॥