श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें72 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/44-54 ] मर्यादापमें ही रहते थे। श्रीदामोदर पण्डित महाप्रभुके भक्तोंमें-से यदि किसीको थोड़ी भी मर्यादाका उल्लङ्घन करते हुए देखते, तब वे उसे डाँटकर मर्यादाका स्थापन करते थे॥ 44-45॥ श्रीदामोदरके वाक्यदण्डके वृत्तान्तके श्रवणसे आत्मेन्द्रियतृप्ति वाञ्छारूपी छल और अपराधका नाश :- एइ त' कहि दामोदेरेर वाक्यदण्ड। याहार श्रवणे भागे 'अज्ञान पाषण्ड' ॥ 46 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने [ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने] श्रीदामोदर पण्डितके वचनोंके द्वारा शासनका वर्णन किया, जिसके श्रवणसे 'अज्ञान' और 'पाखण्डता' आदि भाग जाते हैं॥ 46॥ अनुभाष्य- 'भागे', - पलायन करता है॥ 46॥ महागम्भीर-रहस्यमयी चैतन्यलीला :- चैतन्येर लीला-गम्भीर, कोटिसमुद्र हैते। कि लागि' कि करे, केह ना पारे बुझिते ॥ 47 ॥ अतएव गूढ़ अर्थ किछुइ ना जानि। बाह्य अर्थ करिबारे करि टानाटानि ॥ 48 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ करोड़ों समुद्रोंसे भी गहरी हैं। वे किसलिये क्या करते हैं, इसे कोई भी नहीं समझ सकता। इसलिये मैं महाप्रभुकी लीलाओंके गूढ़ अर्थोंको बिल्कुल भी नहीं जानता हूँ, केवल बाहरी अर्थोंको प्रकाशित करनेके लिये ही प्रयास कर रहा हूँ॥ 47-48॥ महाप्रभु-श्रीहरिदास-संवाद; महाप्रभुका प्रश्न, श्रीहरिदासका उत्तर :- एकदिन प्रभु हरिदासरे मिलिला। ताँहा लञा गोष्ठी करि' ताँहारे पुछिला ॥ 49 ॥ अनुवाद-प्रतिदिनकी भाँति एकदिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले और उनसे वार्तालाप करते हुए उनसे पूछा ॥ 49 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें इस स्थानपर यह श्लोक दिखलायी देता है, - "दामोदराद् वाक्यदण्डमङ्गीकृत्य दयानिधिः। गौरः स्वां हरिदासास्याद्-गूढ़लीलामथाशृणोत्॥" [अर्थात् "दयानिधि श्रीगौरचन्द्रने श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा दिये गये वाक्यरूपी शासनको अङ्गीकार करनेके पश्चात् श्रीहरिदासके मुखसे अपनी गूढ़लीलाका श्रवण किया।] ॥ 49 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदाससे कलियुगमें सुदुराचारी अन्त्यज्य-आदिके उद्धारके उपायकी जिज्ञासा :- "हरिदास, कलिकाल यवन अपार। गो-ब्राह्मणे हिंसा करे महा-दुराचार ॥ 50 ॥ इहा-सबार कोन् मते हइबे निस्तार ? ताहार हेतु ना देखिये,-ए दुःख अपार ॥" 51 ॥ अनुवाद-"हे हरिदास ! कलियुगमें असंख्य यवन हैं। वे गायों तथा ब्राह्मणोंके प्रति हिंसा करनेवाले महा-दुराचारी हैं। इन सबका किस प्रकारसे उद्धार होगा? इनके उद्धारका कोई उपाय नहीं देख पानेके कारण मुझे बहुत दुःख होता है ॥" 50-51 ॥ श्रीहरिदासका उत्तर; नामाभासके माहात्म्यका वर्णन :- हरिदास कहे, - "प्रभु, चिन्ता ना करिह। यवनेर संसार देखि' दुःख ना भाविह ॥ 52 ॥ यवनसकलेर मुक्ति हबे अनायासे। 'हा राम, हा राम' बलि' कहे नामाभासे ॥ 53 ॥ महाप्रेमे भक्त कहे, - 'हा राम, हा राम'। यवनेर भाग्य देख, लय सेइ नाम ॥ 54 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "हे प्रभो! आप चिन्ता मत कीजिये। संसारमें यवनोंके दुःखोंको देखकर दुःखी मत होइये। इन यवनोंकी मुक्ति तो अनायास ही हो जायेगी, क्योंकि ये लोग तो 'हा राम, हा राम' बोलकर नामाभास करते हैं। एक भक्त