भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2088, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2088

[ 3/32-45 तीसरा अध्याय 71 क्षणेके अश्रु मुछिया शून्य देखि पात। स्वप्न देखिलुँ, 'येन निमाञि खाइल भात' ॥ 35 ॥ बाह्य विरह-दशाय पुनः भ्रान्ति हैल। 'भोग ना लागाइलुँ, - एइ ज्ञान हैल ॥ 36 ॥ पाकपात्रे देखिला सब अन्न आछे भरि'। पुनः भोग लागाइला स्थान-संस्कार करि' ॥ 37 ॥ अनुवाद—इसी माघ मासकी संक्रान्तिके दिन ही आपने अनेक पकवान, घना दूध, पीठा तथा खीर आदि बनाये। श्रीकृष्णको भोग लगानेके बाद जब आपने ध्यान किया, तब आपको मेरी स्फूर्ति हो आयी और आपकी आँखोंमें आँसू भर आये। मैं शीघ्रतासे वहाँ गया और मैंने सब कुछ खा लिया। मुझे खाते देखकर आपको बहुत प्रसन्नता हुई थी। थोड़ी देरके बाद आँसुओंको पोंछकर आपने भोजनके पात्रको खाली देखा। तब आपने सोचा, - 'मैंने स्वप्नमें देखा है कि निमाइने सब कुछ खाया है।' बाहरसे मुझसे विरहकी दशामें आपको पुनः भ्रान्ति हुई और ऐसा प्रतीत हुआ, - 'मैंने भोग ही नहीं लगाया है।' तब आपने रसोईके बर्तनोंको जाकर देखा कि बर्तन तो सब भरे हुए हैं। तब आपने स्थानको साफ करके पुनः भोग लगाया ॥ 32-37 ॥ शचीमाताका शुद्ध गौरवात्सल्य-प्रेम :- एइमत बार बार करिये भोजन। तोमार शुद्धप्रेमे मोरे करे आकर्षण ॥ 38 ॥ अनुवाद—इस प्रकार आप जो कुछ मेरे लिये बनाती हैं, मैं बार-बार आकर वह सब खाता हूँ, क्योंकि आपका शुद्धप्रेम मुझे आकर्षित करता है ॥ 38 ॥ महाप्रभुके अतुलनीय मातृभक्तिसूचक वचन :- तोमार आज्ञाते आमि आछि नीलाचले। निकटे लञा याओ आमा तोमार प्रेमबले ॥ 39 ॥ एइमत बार बार कराइह स्मरण। मोर नाम लञा ताँर वन्दिह चरण ॥" 40 ॥ अनुवाद—मैं आपकी आज्ञासे ही नीलाचलमें रह रहा हूँ, तो भी आप मुझे अपने प्रेमके बलसे अपने निकट खींच लेती हैं। हे दामोदर ! इस प्रकार बार बार तुम उन्हें ये बातें स्मरण कराना तथा मेरी ओरसे उनके चरणोंकी वन्दना करना ॥" 39-40 ॥ एत कहि' जगन्नाथेर प्रसाद आनाइला। माताके, वैष्णवे दिते पृथक् पृथक् कैला ॥ 41 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मँगवाया। महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको उसके पृथक्-पृथक् भाग करके श्रीशचीमाता और अन्य-अन्य वैष्णवोंको देनेके लिये दिया ॥ 41 ॥ श्रीदामोदरका नवद्वीपमें आगमन और श्रीशची और श्रीअद्वैतादि भक्तोंको लाया हुआ महाप्रसाद देना :- तबे दामोदर चलि' नदीया आइला। मातारे मिलिया ताँर चरणे रहिला ॥ 42 ॥ आचार्यादि वैष्णवेरे महाप्रसाद दिला। प्रभुर यैछे आज्ञा, पण्डित ताहा आचरिला ॥ 43 ॥ अनुवाद—तब श्रीदामोदर पण्डित जगन्नाथ पुरीसे चलकर नवद्वीप आ गये। श्रीशचीमातासे मिलकर वे उनके चरणोंके आश्रयमें रहने लगे। श्रीदामोदर पण्डितने श्रीअद्वैताचार्य आदि वैष्णवोंको महाप्रसाद दिया। महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको जो आज्ञा दी थी, उन्होंने उसीका पालन किया ॥ 42-43 ॥ नवद्वीपमें श्रीदामोदरके कठोर शासनके द्वारा मर्यादा-संस्थापन, सभीको ही भय :- दामोदर-आगे स्वातन्त्र्य ना हय काहार। ताँर भये सबे करे सङ्कोच व्यवहार ॥ 44 ॥ प्रभुगुणे याँर देखे अल्प मर्यादा-लङ्घन। वाक्यदण्ड करि' करे मर्यादा-स्थापन ॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितके आगे कोई भी स्वतन्त्र आचरण नहीं करता था, उनके भयसे सभी