भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2087, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2087

किसी भी प्रकारकी लोकापेक्षाके द्वारा धर्मको कुण्ठित नहीं होने देंगे॥ २३ ॥ आमा हैते ये ना हय, से तोमा हैते हय। आमारे करिला दण्ड, आन केबा हय ॥ २४ ॥ अनुवाद-मुझसे भी जो निरपेक्षत्वकी रक्षाका कार्य नहीं हो सकता, वह तुम कर सकते हो। तुमने तो मुझपर भी अनुशासन किया है, अन्योंका तो फिर कहना ही क्या ? ॥ २४ ॥ अनुभाष्य-'ये ना हय, से', - जो निरपेक्षत्व रक्षित नहीं होता, वह ॥ २४ ॥ मातार गृहे रह याइ मातार चरणे। तोमार आगे नाहि कार स्वच्छन्दाचरणे ॥ २५ ॥ मध्ये मध्ये आसिबा कभु आमार दर्शने। शीघ्र करि' पुनः ताँहा करह गमने ॥ २६ ॥ अनुवाद-तुम माताके घरपर जाकर उनके श्रीचरणोंमें ही रहना, क्योंकि तुम्हारे आगे कोई भी स्वच्छन्द आचरण नहीं कर पायेगा। बीच-बीचमें कभी मुझसे मिलनेके लिये आना तथा फिर शीघ्र ही पुनः वहाँ लौट जाना ॥ २५-२६॥ महाप्रभुके सुखी होनेका वर्णन करके शुद्धगौर- स्नेहवात्सल्यमयी शचीमाताको सन्तुष्ट करनेका आदेश :- मातारे कहिह मोर कोटी नमस्कारे। मोर सुख-कथा कहि' सुख दिह' ताँरे ॥ २७ ॥ 'निरन्तर निज-कथा तोमारे शुनाइते। एइ लागि' प्रभु मोरे पाठाइला इँहाते ॥ '२८ ॥ एत कहि' मातार मने सन्तोष जन्माइह। आर गुह्यकथा ताँरे स्मरण कराइह ॥ २९ ॥ अनुवाद-माताको मेरा कोटि-कोटि नमस्कार कहना। मैं यहाँ बहुत सुखी हूँ-ऐसा बताकर माताको सुखी करना। और उनसे कहना कि 'प्रभुने निरन्तर अपनी बातें आपको सुनानेके लिये ही मुझे यहाँ भेजा है।' ऐसा कहकर माताके मनको सन्तुष्ट करना तथा उन्हें मेरी अन्य एक और गूढ़ बात स्मरण करवाना॥ २७-२९ ॥ माताके घरमें महाप्रभुका आविर्भाव और भोजनलीला :- 'बारे बारे आसि' आमि तोमार भवने। मिष्ठान्न व्यञ्जन सब करिये भोजने ॥ ३० ॥ भोजन करिये आमि, तुमि ताहा जान। बाह्य करिते ताहा स्फूर्त्ति करि' मान' ॥ ३१ ॥ अनुवाद-मैं बार-बार आपके घरमें आकर जो मिठाइयाँ-पकवान आप मेरे लिये बनाती हैं, उन सबको मैं खाता हूँ। आप जानती हैं कि मैं आकर खाता हूँ, किन्तु विरहके कारण बाहरसे उसे आप केवल स्फूर्त्ति ही मानती हैं ॥ ३०-३१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जगत्में जब आपकी बाह्यदृष्टि होती है, तब आपके मनमें, - 'निमाइ मेरे स्मरण पथपर आया था' -ऐसी स्फूर्तिमात्र होती है; किन्तु मैं वास्तवमें आपके निकट जाकर अन्न-पकवान आदि खाता हूँ॥ ३१॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, “बाह्य विरह.....मान"-परवर्ती 36 संख्या देखें। बाह्य दृष्टिसे विरहके कारण आप मुझे प्रत्यक्ष रूपसे नहीं देखनेपर भी मेरी भोजन-लीलाके भली-भाँति दर्शनसे प्रगाढ़ वात्सल्यप्रेमसे भरकर मानो मुझे साक्षात् रूपसे ही अनुभव कर रही हैं, ऐसा मानकर भ्रम करती हैं ॥ ३१ ॥ माताके विश्वासको उत्पन्न करनेके लिये एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एइ माघ-संक्रान्त्ये तुमि रन्धन करिला। नाना व्यञ्जन, क्षीर, पिठा, पायस रान्धिला ॥ ३२ ॥ कृष्णे भोग लागाञा यबे कैला ध्यान। आमार स्फूर्त्ति हैल, अश्रु भरिल नयन ॥ ३३ ॥ आस्ते-व्यस्ते आमि गिया सकलि खाइल। आमि खाइ, देखि' तोमार सुख उपजिल ॥ ३४ ॥