भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2086

[ 3/12-23 तीसरा अध्याय 69 करेंगे और सम्पूर्ण पुरुषोत्तम क्षेत्रमें गोसाईंको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होगी॥" 12 ॥ महाप्रभुको मर्यादा दिखलाकर श्रीदामोदरके द्वारा तिरस्कार और शासन :- शुनि' प्रभु कहे,—"क्या कह, दामोदर?" दामोदर कहे,–"तुमि स्वतन्त्र ईश्वर' ॥ 13 ॥ स्वच्छन्दे आचार कर, के पारे बलिते? मुखर जगतेर मुख पार आच्छादिते ॥ 14 ॥ पण्डित हञा मने केने विचार ना कर? राण्डी ब्राह्मणीर बालके प्रीति केने कर??15 ॥ यद्यपि ब्राह्मणी सेइ तपस्विनी सती। तथापि ताहार दोष—सुन्दरी युवती ॥ 16 ॥ तुमिह—परम युवा, परम सुन्दर। लोकेर काणाकाणि-बाते देह अवसर ॥" 17 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—"हे दामोदर! क्या कह रहे हो?" श्रीदामोदर पण्डितने कहा,—"आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आप स्वतन्त्र होकर जैसा चाहें वैसा आचरण कर सकते हैं, आपको कौन कुछ कह सकता है? क्या आप वाचाल लोगोंके मुखको ढक सकते हैं? पण्डित होनेपर भी आप स्वयं विचार क्यों नहीं करते? आप विधवा ब्राह्मणीके पुत्रसे प्रीति क्यों करते हैं? यद्यपि वह ब्राह्मणी तपस्विनी सती-साध्वी स्त्री है, तो भी उसका एक दोष है कि वह सुन्दरी युवती है। आप भी परम युवा और परम सुन्दर हैं। आप लोगोंको कानाफूसी करनेका अवसर प्रदान कर रहे हैं॥" 13-17 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राण्डी',–विधवा ॥ 15 ॥ श्रीदामोदरके वाक्य-दण्डको सुनकर महाप्रभुका मन-ही-मनमें विचार :- एत बलि' दामोदर मौन हइला। अन्तरे सन्तोष प्रभु हासि' विचारिला ॥ 18 ॥ "इहारे कहिये शुद्धप्रेमेर तरङ्ग। दामोदर-सम मोर नाहि 'अन्तरङ्ग' ॥" 19 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीदामोदर पण्डित मौन हो गये। उनकी बात सुनकर महाप्रभुके हृदयमें सन्तोष हुआ तथा उन्होंने मुस्कुराकर मन-ही-मन विचार किया,—"इसीको शुद्धप्रेमकी तरङ्ग कहते हैं, वास्तवमें दामोदरके समान मेरा कोई 'अन्तरङ्ग' नहीं है॥" 18-19 ॥ एतेक विचारि' प्रभु मध्याह्ने चलिला। आर दिने दामोदरे निभृते बोलाइला ॥ 20 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभु मध्याह्न कृत्योंके लिये चल दिये। अगले दिन उन्होंने श्रीदामोदर पण्डितको एकान्तमें बुलाया ॥ 20 ॥ नवद्वीपमें शचीमाताकी देखभाल करनेके लिये पण्डितको भेजना :- प्रभु कहे,—"दामोदर, चलह नदीया। मातार समीपे तुमि रह ताँहा याञा ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"दामोदर, तुम नदीया जाओ। वहाँ जाकर तुम मेरी माताके पास जाकर रहो ॥ 21 ॥ महाप्रभुके द्वारा दामोदरकी छलसे स्तुति :- तोमा बिना ताँहार रक्षक नाहि आन। आमाकेह याते तुमि कैला सावधान ॥ 22 ॥ तोमा सम 'निरपेक्ष' नाहि मोर गणे। 'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना याय रक्षणे ॥ 23 ॥ अनुवाद—तुम्हारे अतिरिक्त उनकी रक्षा अन्य कोई नहीं कर सकता। क्योंकि तुमने तो मुझे भी सावधान किया है। तुम्हारे समान 'निरपेक्ष' अन्य कोई भी मेरे परिकरोंमें नहीं है। वास्तवमें निरपेक्ष हुए बिना धर्मकी रक्षा नहीं की जा सकती ॥ 22-23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मरक्षकगण निरपेक्ष होंगे, अर्थात्