श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2085, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें68 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/3-12 ] वह बालक अत्यन्त सुन्दर था और उसका व्यवहार भी बहुत मृदु था ॥ ३ ॥ प्रभु-स्थाने नित्य आइसे, करे नमस्कार। प्रभु-सने बात् कहे, प्रभु- 'प्राण' तार ॥ 4 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर आता और महाप्रभुको प्रणाम करता था। उनसे निःसङ्कोच होकर बातें करता, क्योंकि महाप्रभु उसके 'प्राण' स्वरूप थे ॥ 4 ॥ इसमें श्रीदामोदर पण्डितका अनुमोदन नहीं :- प्रभुते ताहार प्रीति, प्रभु दया करे। दामोदर तार प्रीति सहिते ना पारे ॥ 5 ॥ अनुवाद-उस बालककी महाप्रभुके प्रति प्रीति और महाप्रभुकी उसपर कृपा थी। श्रीदामोदर पण्डित उसकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिको सहन नहीं कर पा रहे थे॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर', - श्रीदामोदर-पण्डित ॥ 5 ॥ श्रीदामोदरके द्वारा मना करनेपर भी ब्राह्मण-बालकका महाप्रभुके प्रति अनुराग :- बार बार निषेध करे ब्राह्मणकुमारे। प्रभुरे ना देखिले सेइ रहिते ना पारे ॥ 6 ॥ अनुवाद-श्रीदामोदर पण्डित बार बार उस ब्राह्मण बालकको महाप्रभुके पास आनेके लिये मना करते, किन्तु वह बालक महाप्रभुको देखे बिना रह नहीं पाता था ॥ 6 ॥ बालसुलभ-धर्मवशतः स्नेहमय महाप्रभुके निकट उसका प्रतिदिन आगमन :- नित्य आइसे, प्रभु तारे करे महाप्रीत। याँहा प्रीति ताँहा आइसे, - बालकेर रीत ॥ 7 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके पास आता तथा महाप्रभु उससे बहुत अधिक स्नेह करते। बालकका तो स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे जहाँ प्रीति मिलती है, वह वहीं आता है ॥ 7 ॥ श्रीदामोदरके लिये दो सङ्कट :- ताहा देखि' दामोदर दुःख पाय मने। बलिते ना पारे, बालक निषेध ना माने ॥ 8 ॥ अनुवाद-ऐसा देखकर श्रीदामोदर पण्डितके मनमें बहुत दुःख होता। वे कुछ कह भी नहीं पाते, क्योंकि बालक उनके निषेधको नहीं मानता था ॥ 8 ॥ एकदिन महाप्रभुके निकटसे बालकका अपने स्थानपर प्रस्थान :- आर दिन सेइ बालक प्रभु-स्थाने आइला । गोसाञि तारे प्रीति करि' वार्त्ता पुछिला ॥ 9 ॥ कतक्षणे से बालक उठि' यबे गेला। सहिते ना पारे, दामोदर कहिते लागिला ॥ 10 ॥ अनुवाद-एकदिन वह बालक जब महाप्रभुके वासस्थानपर आया, तब महाप्रभुने उससे प्रीतिपूर्वक अनेक बातें पूछीं। थोड़ी देरीके बाद जब वह ब्राह्मण बालक उठकर चला गया, तब श्रीदामोदर पण्डित यह सब सहन नहीं कर पानेके कारण कहने लगे ॥ 9-10 ॥ अधीर दामोदरका अभियोग और महाप्रभुके कार्यकी समालोचना :- “अन्योपदेशे पण्डित”, कहे गोसाञिर ठाञि। 'गोसाञि' 'गोसाञि' एबे जानिमु 'गोसाञि' ॥ 11 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 11 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीदामोदर पण्डित महाप्रभुको कहने लगे, - “आप अन्योंको उपदेश प्रदान करते समय 'पण्डित' हैं और सभी आपको 'गोसाईं' 'गोसाईं' (आचार्य) कहते हैं; इस बार जाना जायेगा कि आप किस प्रकार 'गोसाईं' बने रह सकते हैं ॥ 11 ॥ एबे गोसाञिर गुण सब लोके गाइबे। गोसाञि-प्रतिष्ठा सब पुरुषोत्तमे हइबे ॥” 12 ॥ अनुवाद-अब सभी लोग गोसाईंके गुणोंका गान