भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2084

तीसरा अध्याय कथासार-पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें किसी सुन्दरी ब्राह्मणी युवतीका एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र था। उसे प्रतिदिन महाप्रभुके पास आते देखकर श्रीदामोदर पण्डितने [महाप्रभुसे] कहा,-"बालकसे प्रीति करनेसे लोग आपके चरित्रपर सन्देह करेंगे।" यह बात सुनकर महाप्रभुने एकदिन श्रीदामोदरको श्रीनवद्वीपमें अपनी माता श्रीशचीकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया और कहा,-"मैं बीच-बीचमें माताके पास जाकर भोजन करता हूँ-यह बात उन्हें स्मरण करा देना।" श्रीदामोदर महाप्रसाद आदि लेकर नवद्वीप गये। उसके बाद एकदिन महाप्रभुने ब्रह्म-हरिदाससे पूछा,- "कलिकालमें सभी यवनोंका किस प्रकार उद्धार होगा?" श्रीहरिदासने उसके लिये उच्च-सङ्कीर्तनके माहात्म्यको बतलाकर सभी नामाभाससे उद्धार प्राप्त करेंगे- ऐसा सिद्धान्त वर्णन किया। यहाँपर श्रीहरिदास ठाकुरके पूर्व-वृत्तान्तका वर्णन करते हुए श्रीकविराज-गोस्वामीने बेनापोलके वनमें पाखण्डी ब्रह्मबन्धु रामचन्द्र-खाँनके द्वारा भेजी गयी वेश्या जिसका श्रीहरिदासकी कृपासे उद्धार हुआ था, उसका विवरण कहा। वैष्णव-अपराधसे और बादमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके अभिशापसे रामचन्द्र खाँनकी जो दुर्दशा हुई थी, वह भी वर्णित हुई है। बेनापोलसे चाँदपुरमें आकर श्रीहरिदास श्रीबलराम-आचार्यके घरपर रहे। उसके बाद हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारकी सभामें नामतत्त्वको लेकर श्रीहरिदास ठाकुर और गोपाल चक्रवर्त्ती नामक आरिन्दा-ब्राह्मणके साथ जो सब वार्तालाप हुआ था एवं श्रीहरिदासके प्रति अपराध करनेसे गोपाल चक्रवर्त्तीको 'कोढ़-रोगरूपी' दण्डकी प्राप्ति हुई थी, उसका वर्णन है। श्रीहरिदास ठाकुर चाँदपुरसे शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैताचार्यके घरपर रहे। वहाँ मायादेवी छल करनेके लिये आयी और उसने श्रीहरिदासकी कृपासे श्रीकृष्णनामको प्राप्त किया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च ॥ १ ॥ अनुवाद-मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं)के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परातपर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य-अन्त्यलीला 2/1 संख्या देखें ॥ १ ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ २॥ एक विधवा-ब्राह्मणीके महासौभाग्यवान् सुन्दर पुत्रके प्रति महाप्रभुका अहैतुक कृपा-स्नेह :- पुरुषोत्तमे एक उड़िया-ब्राह्मणकुमार। पितृशून्य, महासुन्दर, मृदुव्यवहार ॥ ३ ॥ अनुवाद-श्रीपुरुषोत्तम धाममें एक उड़िया ब्राह्मण बालक रहता था। उसके पिता परलोक सिधार गये थे।