भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2095, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2095

78 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/77-84 ] सब मुक्त करि' तुमि वैकुण्ठे पाठाइबा। सूक्ष्मजीवे पुनः कर्मे उद्बुद्ध करिबा॥ 78 ॥ सेइ जीव हबे इँहा स्थावर-जङ्गम। ताहाते भरिबे ब्रह्माण्ड येन पूर्व-सम॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जब तक आप इस मर्त्यलोकमें हैं, तब तक आप स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंको मुक्त करके वैकुण्ठमें भेज देंगे तथा सूक्ष्म जीवोंको पुनः कर्ममें प्रवृत्त कर देंगे। वे जीव फिर यहाँपर स्थावर-जङ्गम बनेंगे और उनसे यह ब्रह्माण्ड फिरसे पूर्वकी भाँति ही भर जायेगा॥ 77-79 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रभो, आपने ब्रह्माण्डमें अवतीर्ण होकर जितने जीवोंके साथ सम्बन्ध बनाया है, सभीका उद्धार हो जायेगा। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड यद्यपि उद्धार प्राप्त कर लेगा, तथापि आप अनन्त सूक्ष्मजीवोंको कर्मक्षेत्रमें पुनः प्रवृत्त करेंगे। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड पुनः जीवोंके द्वारा परिपूर्ण हो जायेगा॥ 78 ॥ पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रके द्वारा जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या लञा। वैकुण्ठके गेला, अन्यजीवे अयोध्या भराञा॥ 80 ॥ अनुवाद—पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्र लीला सम्वरण करके समस्त अयोध्यावासियोंको वैकुण्ठ लेकर चले गये थे। उन्होंने अयोध्याको पुनः अन्य जीवोंसे भर दिया था॥ 80 ॥ अनुभाष्य—रामायण (बङ्गवासी संस्करण)में उत्तरकाण्डके 122 वें सर्गके 21-22 श्लोक एवं 123 सर्ग देखें॥ 80 ॥ अवतारि' तुमि ऐछे पातियाछ हाट। केह ना बुझिते पारे तोमार गूढ़ नाट॥ 81 ॥ अनुवाद—आपने भी अवतरित होकर वैसी ही लीला प्रकटित की है। आपकी गूढ़-लीलाको कोई भी नहीं समझ सकता॥ 81 ॥ पूर्वकालमें श्रीकृष्णके द्वारा की गयी जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन व्रजे कृष्ण करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेरे खण्डाइला संसार॥ 82 ॥ अनुवाद—पहले जैसे श्रीकृष्णने भी व्रजमें अवतरित होकर ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंको संसार-बन्धनसे मुक्त कर दिया था॥ 82 ॥ श्रीकृष्णमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके उद्धारका सामर्थ्य :— श्रीमद्भागवत (10/29/16) में— न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे। योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद्विमुच्यते॥ 83 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनसे यह स्थावर-अस्थावर जगत् सम्पूर्ण रूपमें विमुक्त होता है, जन्मरहित भगवान् योगेश्वर उन श्रीकृष्णके कार्योंमें ऐसा विस्मय प्रकाशित करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 83 ॥ अनुभाष्य—रासपूर्णिमाकी रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनि श्रवण करके श्रीकृष्णके मिलन-सङ्गकी कामना करनेवाली गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन करते करते श्रीशुकदेव परीक्षितको परमेश्वर श्रीकृष्णकी महिमाका कीर्तन करते हुए उपदेशरूपी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं— हे राजन्, यतः (श्रीकृष्णात्) एतत् [स्थावरजङ्गमादिकमपि प्राणिमात्रं विमुच्यते, अतः) भवता भगवति (सर्वैश्वर्यसमन्विते) अजे (स्वयमाविर्भूते) योगेश्वरेश्वरे (योगैश्वर्याणामधीश्वरे परमे परमात्मनि) कृष्णे एवं [मोक्षदानशक्तौ] विस्मयः न च एव कार्यः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ विष्णुपुराण (4/15/17) में— अयं हि भगवान् दृष्टः कीर्त्तितः संस्मृतश्च द्वेषानुबन्धेनाप्यखिल- सुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति, किमुत सम्यग्भक्तिमताम् इति॥ 84 ॥

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