श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 3/84-90 तीसरा अध्याय 79
[बायाँ कॉलम]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् द्वेषभावसे देखने, कहने या स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल दिया करते हैं, तब सम्पूर्ण रूपसे भक्तिमान् व्यक्तियोंके सम्बन्धमें तो बात ही क्या ? 84 ॥ अनुभाष्य- द्वेषानुबन्धेनापि (शत्रुभावेनापि) अयं भगवान् हि दृष्टः (अवलोकितः), कीर्तितः (वाचा उच्चारितः) [मनसा] संस्मृतः च अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं (मोक्षादिकं) प्रयच्छति, उत सम्यग्भक्तिमताम् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानाद्यभक्तिमार्गत्रयत्यागपराणां शुद्धभक्तानां) किं [वक्तव्यम्]? श्लोक-भावानुवाद-ये भगवान् शत्रुभावसे देखने, बोलने अथवा मनके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल मोक्षादि दिया करते हैं, तब अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञानादि-तीन अभक्ति मार्गोंका त्याग करनेवाले शुद्धभक्तोंके सम्बन्धमें तो क्या कहा जाय ? ॥ 84 ॥ महाप्रभुके प्रकटकालमें ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंका ही उद्धार :- तैछे तुमि नवद्वीपे करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेर करिला निस्तार ॥ 85 ॥ अनुवाद-उसी प्रकार आपने नवद्वीपमें अवतरित होकर समस्त ब्रह्माण्डके जीवोंका उद्धार कर दिया है ॥ 85 ॥ श्रीहरिदासका दैन्य- ये कहे, - 'चैतन्य-महिमा मोर गोचर हय।' से जानुक, मोर पुनः एइ त' निश्चय ॥ 86 ॥ तोमार ये लीला महा-अमृतेर सिन्धु। मोर मनोगोचर নহে तार एकबिन्दु ॥" 87 ॥ अनुवाद-जो कहता है,-'मैंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको जान लिया है', तो वह जाने। किन्तु मेरा तो
[दायाँ कॉलम]
अन्तिम निर्णय यही है कि आपकी जो लीला महा-अमृतके सिन्धुके समान है, उसकी एक भी बूँद मेरे मनके गोचर नहीं है॥" 86-87 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/25-26 संख्या और भाः 10/14/36 देखें ॥ 86-87 ॥ भक्तके द्वारा भगवान्की लीलाके रहस्यके उद्घाटनकी क्षमतासे भगवान्को भी विस्मय :- एत शुनि' प्रभुर मने चमत्कार हैल। 'मोर गूढ़लीला हरिदास केमने जानिल ?' 88 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर महाप्रभुके मनमें आश्चर्य हुआ-'मेरी गूढ़लीलाको हरिदासने कैसे जान लिया ?' 88 ॥ अनुभाष्य - 'गूढ़लीला', - जीवोद्धार-लीला ॥ 88 ॥ महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- मनेर सन्तोषे ताँरे कैला आलिङ्गन। बाह्य प्रकाशिते एसब करिला वर्जन ॥ 89 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया। उन्होंने बाह्यदशा प्रकाशित करके श्रीहरिदास ठाकुरको उनकी महिमाका और गान करनेके लिये मना किया ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीहरिदासके समस्त तात्त्विक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए, किन्तु बाह्यदशा प्रकाश करके अपने स्तुतिवाक्य कहनेसे मना किया ॥ 89 ॥ भक्तोंके वशमें भगवान् :- ईश्वर-स्वभाव,-ऐश्वर्य चाहे आच्छादिते। भक्त-ठाञि लुकाइते नारे, हय त' विदिते ॥ 90 ॥ अनुवाद-ईश्वर सदा अपने ऐश्वर्यको आच्छादित करना चाहते हैं-यह ईश्वरका स्वभाव है। किन्तु भक्तोंके समक्ष उनका ऐश्वर्य छिप नहीं पाता, यह सब जानते हैं ॥ 90 ॥