श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें80 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/90-98 ] अनुभाष्य—आदिलीला 3/86-89 संख्या देखें ॥ 90 ॥ भक्तके निकट अजित भी पराजित, वैकुण्ठ भी मापने योग्य :— आलवन्दारु अथवा श्रीयामुनाचार्यकृत-स्तोत्ररत्न (18)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमतिशायि- सम्भावनं तव परिव्रढ़िमस्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः ॥ 91 ॥ अनुवाद—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन— इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/88 संख्या देखें ॥ 91 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी प्रशंसा :— तबे महाप्रभु निजभक्त-पाशे याञा। हरिदासेर गुण कहे शतमुख हञा ॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके पास गये और श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका गान करने लगे मानो उनके एक सौ मुख हों ॥ 92 ॥ भक्तगुणोंका कीर्तन करनेवाले भगवान् :— भक्तेर गुण कहिते प्रभुर बाड़ये उल्ल़ास। भक्तगण-श्रेष्ठ तांते श्रीहरिदास ॥ 93 ॥ अनुवाद—भक्तोंके गुणोंका गान करनेसे महाप्रभुका उल्लास बढ़ता ही जाता है, और उसपर भी श्रीहरिदास ठाकुर तो उन भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ 93 ॥ ठाकुर श्रीहरिदासकी अनन्त गुण-राशि :— हरिदासेर गुणगण—असंख्य, अपार। केह कोन अंशे वर्णि' नाहि पाय पार ॥ 94 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके गुण असंख्य, अपार हैं। कोई उनके गुणोंके एक अंशका भी सम्भवतः वर्णन कर सके, किन्तु उनके समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ 94 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीठाकुरके गुण आंशिक रूपसे वर्णित :— चैतन्यमङ्गले श्रीवृन्दावन दास। हरिदासेर गुण किछु करियाछेन प्रकाश ॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन दास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका कुछ प्रकाश किया है ॥ 95 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चैतन्यमङ्गले',—श्रीचैतन्यभागवत आदिखण्डका चौदहवाँ अध्याय देखें ॥ 95 ॥ अपने चित्तकी शुद्धिके लिये श्रीहरिदासके चरित्र-सिन्धुके बिन्दुका स्पर्श :— सब कहा ना याय हरिदासेर चरित्र। केह किछु कहे करिते आपना पवित्र ॥ 96 ॥ अनुवाद—कोई भी श्रीहरिदास ठाकुरके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं कर सकता है। कोई स्वयंको पवित्र करनेके लिये उनके कुछ गुणोंका वर्णन कर सकता है ॥ 96 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें अवर्णित चरित्रके अंशके वर्णनकी ही प्रतिज्ञा :— वृन्दावनदास याहा ना कैला वर्णन। हरिदासेर गुण किछु शुन, भक्तगण ॥ 97 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! अब आप श्रीहरिदास ठाकुरके कुछ गुणोंका श्रवण करो जिनका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारसे वर्णन नहीं किया ॥ 97 ॥ बेनापोलमें श्रीठाकुरके द्वारा रामचन्द्र-खाँनके द्वारा प्रेरित वेश्याके उद्धारका वृत्तान्त :— हरिदास यबे निजगृह त्याग कैला। बेनापोलेर वन-मध्ये कतदिन रहिला ॥ 98 ॥