श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2094, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/68-77 तीसरा अध्याय 77 अनुवाद—आपने जो उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन किया है, स्थावर और जङ्गम—सभीने ही तो वह सुना है जिससे उनका कल्याण हो गया है ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—उच्च-सङ्कीर्तनका प्रभाव—चैःभाः आदिखण्ड 16/277-291 संख्या एवं महाप्रभुके द्वारा सङ्कीर्तनका प्रवर्त्तन—आदिलीला 3/76 संख्या और मध्यलीला 11/97-98 संख्या देखें ॥ 68 ॥ शुनिया जङ्गमेर हय संसार-क्षय। स्थावरे शब्द लागे, प्रतिध्वनि हय ॥ 69 ॥ 'प्रतिध्वनि' नहे, सेइ करये 'कीर्त्तन'। तोमार कृपार एइ अकथ्य कथन ॥ 70 ॥ अनुवाद—आपके उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिको सुनकर जङ्गम प्राणियोंका संसार क्षय हो गया है। स्थावर प्राणियोंसे उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिके टकरानेसे उनसे भी प्रतिध्वनि होती है। वास्तवमें वह प्रतिध्वनि नहीं, अपितु स्थावर प्राणियोंके द्वारा किया जानेवाला कीर्तन ही है। आपकी कृपाका यह अचिन्त्य कथन है ॥ 69-70 ॥ सकल जगते हय उच्च सङ्कीर्त्तन। शुनिया प्रेमावेशे नाचे स्थावर-जङ्गम ॥ 71 ॥ अनुवाद—आपकी कृपासे समस्त जगत्में उच्च-सङ्कीर्तन हो रहा है, जिसे सुनकर स्थावर तथा जङ्गम प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे हैं ॥ 71 ॥ महाप्रभुकी लीलासे उच्च-सङ्कीर्तनके श्रवणके दृष्टान्तका प्रदर्शन :- यैछे कैला झारिखण्डे वृन्दावन याइते। बलभद्र-भट्टाचार्य कहियाछेन आमाते ॥ 72 ॥ अनुवाद—आपने वृन्दावन जाते समय झारिखण्डके वनमें उच्च-सङ्कीर्तन किया था, उसके प्रभावसे जो कुछ घटित हुआ था, वह सब बलभद्र भट्टाचार्यने मुझे बतलाया है ॥ 72 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/24-54 संख्या देखें ॥ 72 ॥ वासुदेव जीव लागि' कैल निवेदन। तबे अङ्गीकार कैला जीवेर मोचन ॥ 73 ॥ अनुवाद—जिस समय श्रीवासुदेव दत्तने जीवोंके उद्धारके लिये आपसे निवेदन किया था, उस समय आपने जीवोंका उद्धार करना स्वीकार किया था॥ 73 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 15/159-179 संख्या देखें॥ 73 ॥ जगद्गुरु आचार्यरूपमें नाम-प्रेम प्रचारके द्वारा महाप्रभुकी जीवोंके उद्धारकी लीलाके रहस्यका उद्घाटन :- जगत् निस्तारिते तोमार अवतार। भक्तभाव आगे तांते कैला अङ्गीकार ॥ 74 ॥ उच्च सङ्कीर्त्तन तांते करिला प्रचार। 'स्थिर'-'चर' जीवेर खण्डाइला संसार ॥ ”75 ॥ अनुवाद—समस्त जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है। उसपर भी आपने भक्तके भावको अङ्गीकार करके स्वयं उच्च-सङ्कीर्तनका प्रचार किया है। आपने उसके द्वारा स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंका संसार-मोचन कर दिया है॥” 74-75 ॥ अनुभाष्य—'स्थिर-चर',—स्थावर और जङ्गम ॥ 75 ॥ महाप्रभुके द्वारा जीवोंकी मुक्तिकी प्राप्तिके बाद ब्रह्माण्डकी अवस्थाकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“सब जीव मुक्ति यबे पाबे। एइ त' ब्रह्माण्ड तबे जीवशून्य हबे ! !”76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यदि समस्त जीवोंको ही मुक्तिकी प्राप्ति हो जायेगी, तब तो यह ब्रह्माण्ड जीवोंसे रहित हो जायेगा ॥ ”76 ॥ श्रीहरिदासका उत्तर; महाप्रभुकी कृपासे उनके प्रकटकालीन समस्त जीवोंके उद्धारके बाद पुनः कारणोदशायी महाविष्णुसे प्रकटित जीवोंके द्वारा जगत् व्याप्ति :- हरिदास बोले,—“तोमार यावत् मर्त्ये स्थिति। तावत् स्थावर-जङ्गम, सर्व जीव-जाति ॥ 77 ॥