श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 3/68-77 तीसरा अध्याय 77 अनुवाद—आपने जो उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन किया है, स्थावर और जङ्गम—सभीने ही तो वह सुना है जिससे उनका कल्याण हो गया है ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—उच्च-सङ्कीर्तनका प्रभाव—चैःभाः आदिखण्ड 16/277-291 संख्या एवं महाप्रभुके द्वारा सङ्कीर्तनका प्रवर्त्तन—आदिलीला 3/76 संख्या और मध्यलीला 11/97-98 संख्या देखें ॥ 68 ॥ शुनिया जङ्गमेर हय संसार-क्षय। स्थावरे शब्द लागे, प्रतिध्वनि हय ॥ 69 ॥ 'प्रतिध्वनि' नहे, सेइ करये 'कीर्त्तन'। तोमार कृपार एइ अकथ्य कथन ॥ 70 ॥ अनुवाद—आपके उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिको सुनकर जङ्गम प्राणियोंका संसार क्षय हो गया है। स्थावर प्राणियोंसे उच्च-सङ्कीर्तनकी ध्वनिके टकरानेसे उनसे भी प्रतिध्वनि होती है। वास्तवमें वह प्रतिध्वनि नहीं, अपितु स्थावर प्राणियोंके द्वारा किया जानेवाला कीर्तन ही है। आपकी कृपाका यह अचिन्त्य कथन है ॥ 69-70 ॥ सकल जगते हय उच्च सङ्कीर्त्तन। शुनिया प्रेमावेशे नाचे स्थावर-जङ्गम ॥ 71 ॥ अनुवाद—आपकी कृपासे समस्त जगत्में उच्च-सङ्कीर्तन हो रहा है, जिसे सुनकर स्थावर तथा जङ्गम प्रेमावेशमें नृत्य कर रहे हैं ॥ 71 ॥ महाप्रभुकी लीलासे उच्च-सङ्कीर्तनके श्रवणके दृष्टान्तका प्रदर्शन :- यैछे कैला झारिखण्डे वृन्दावन याइते। बलभद्र-भट्टाचार्य कहियाछेन आमाते ॥ 72 ॥ अनुवाद—आपने वृन्दावन जाते समय झारिखण्डके वनमें उच्च-सङ्कीर्तन किया था, उसके प्रभावसे जो कुछ घटित हुआ था, वह सब बलभद्र भट्टाचार्यने मुझे बतलाया है ॥ 72 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 17/24-54 संख्या देखें ॥ 72 ॥ वासुदेव जीव लागि' कैल निवेदन। तबे अङ्गीकार कैला जीवेर मोचन ॥ 73 ॥ अनुवाद—जिस समय श्रीवासुदेव दत्तने जीवोंके उद्धारके लिये आपसे निवेदन किया था, उस समय आपने जीवोंका उद्धार करना स्वीकार किया था॥ 73 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 15/159-179 संख्या देखें॥ 73 ॥ जगद्गुरु आचार्यरूपमें नाम-प्रेम प्रचारके द्वारा महाप्रभुकी जीवोंके उद्धारकी लीलाके रहस्यका उद्घाटन :- जगत् निस्तारिते तोमार अवतार। भक्तभाव आगे तांते कैला अङ्गीकार ॥ 74 ॥ उच्च सङ्कीर्त्तन तांते करिला प्रचार। 'स्थिर'-'चर' जीवेर खण्डाइला संसार ॥ ”75 ॥ अनुवाद—समस्त जगत्का उद्धार करनेके लिये ही आपका अवतार हुआ है। उसपर भी आपने भक्तके भावको अङ्गीकार करके स्वयं उच्च-सङ्कीर्तनका प्रचार किया है। आपने उसके द्वारा स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंका संसार-मोचन कर दिया है॥” 74-75 ॥ अनुभाष्य—'स्थिर-चर',—स्थावर और जङ्गम ॥ 75 ॥ महाप्रभुके द्वारा जीवोंकी मुक्तिकी प्राप्तिके बाद ब्रह्माण्डकी अवस्थाकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“सब जीव मुक्ति यबे पाबे। एइ त' ब्रह्माण्ड तबे जीवशून्य हबे ! !”76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यदि समस्त जीवोंको ही मुक्तिकी प्राप्ति हो जायेगी, तब तो यह ब्रह्माण्ड जीवोंसे रहित हो जायेगा ॥ ”76 ॥ श्रीहरिदासका उत्तर; महाप्रभुकी कृपासे उनके प्रकटकालीन समस्त जीवोंके उद्धारके बाद पुनः कारणोदशायी महाविष्णुसे प्रकटित जीवोंके द्वारा जगत् व्याप्ति :- हरिदास बोले,—“तोमार यावत् मर्त्ये स्थिति। तावत् स्थावर-जङ्गम, सर्व जीव-जाति ॥ 77 ॥
78 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/77-84 ] सब मुक्त करि' तुमि वैकुण्ठे पाठाइबा। सूक्ष्मजीवे पुनः कर्मे उद्बुद्ध करिबा॥ 78 ॥ सेइ जीव हबे इँहा स्थावर-जङ्गम। ताहाते भरिबे ब्रह्माण्ड येन पूर्व-सम॥ 79 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जब तक आप इस मर्त्यलोकमें हैं, तब तक आप स्थावर-जङ्गम सभी जीवोंको मुक्त करके वैकुण्ठमें भेज देंगे तथा सूक्ष्म जीवोंको पुनः कर्ममें प्रवृत्त कर देंगे। वे जीव फिर यहाँपर स्थावर-जङ्गम बनेंगे और उनसे यह ब्रह्माण्ड फिरसे पूर्वकी भाँति ही भर जायेगा॥ 77-79 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रभो, आपने ब्रह्माण्डमें अवतीर्ण होकर जितने जीवोंके साथ सम्बन्ध बनाया है, सभीका उद्धार हो जायेगा। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड यद्यपि उद्धार प्राप्त कर लेगा, तथापि आप अनन्त सूक्ष्मजीवोंको कर्मक्षेत्रमें पुनः प्रवृत्त करेंगे। इस प्रकारसे ब्रह्माण्ड पुनः जीवोंके द्वारा परिपूर्ण हो जायेगा॥ 78 ॥ पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रके द्वारा जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या लञा। वैकुण्ठके गेला, अन्यजीवे अयोध्या भराञा॥ 80 ॥ अनुवाद—पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्र लीला सम्वरण करके समस्त अयोध्यावासियोंको वैकुण्ठ लेकर चले गये थे। उन्होंने अयोध्याको पुनः अन्य जीवोंसे भर दिया था॥ 80 ॥ अनुभाष्य—रामायण (बङ्गवासी संस्करण)में उत्तरकाण्डके 122 वें सर्गके 21-22 श्लोक एवं 123 सर्ग देखें॥ 80 ॥ अवतारि' तुमि ऐछे पातियाछ हाट। केह ना बुझिते पारे तोमार गूढ़ नाट॥ 81 ॥ अनुवाद—आपने भी अवतरित होकर वैसी ही लीला प्रकटित की है। आपकी गूढ़-लीलाको कोई भी नहीं समझ सकता॥ 81 ॥ पूर्वकालमें श्रीकृष्णके द्वारा की गयी जीवोंके उद्धारकी लीलाका दृष्टान्त :— पूर्वे येन व्रजे कृष्ण करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेरे खण्डाइला संसार॥ 82 ॥ अनुवाद—पहले जैसे श्रीकृष्णने भी व्रजमें अवतरित होकर ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंको संसार-बन्धनसे मुक्त कर दिया था॥ 82 ॥ श्रीकृष्णमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके उद्धारका सामर्थ्य :— श्रीमद्भागवत (10/29/16) में— न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे। योगेश्वरेश्वरे कृष्णे यत एतद्विमुच्यते॥ 83 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनसे यह स्थावर-अस्थावर जगत् सम्पूर्ण रूपमें विमुक्त होता है, जन्मरहित भगवान् योगेश्वर उन श्रीकृष्णके कार्योंमें ऐसा विस्मय प्रकाशित करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ 83 ॥ अनुभाष्य—रासपूर्णिमाकी रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनि श्रवण करके श्रीकृष्णके मिलन-सङ्गकी कामना करनेवाली गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन करते करते श्रीशुकदेव परीक्षितको परमेश्वर श्रीकृष्णकी महिमाका कीर्तन करते हुए उपदेशरूपी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं— हे राजन्, यतः (श्रीकृष्णात्) एतत् [स्थावरजङ्गमादिकमपि प्राणिमात्रं विमुच्यते, अतः) भवता भगवति (सर्वैश्वर्यसमन्विते) अजे (स्वयमाविर्भूते) योगेश्वरेश्वरे (योगैश्वर्याणामधीश्वरे परमे परमात्मनि) कृष्णे एवं [मोक्षदानशक्तौ] विस्मयः न च एव कार्यः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥ विष्णुपुराण (4/15/17) में— अयं हि भगवान् दृष्टः कीर्त्तितः संस्मृतश्च द्वेषानुबन्धेनाप्यखिल- सुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति, किमुत सम्यग्भक्तिमताम् इति॥ 84 ॥
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[ 3/84-90 तीसरा अध्याय 79
[बायाँ कॉलम]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् द्वेषभावसे देखने, कहने या स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल दिया करते हैं, तब सम्पूर्ण रूपसे भक्तिमान् व्यक्तियोंके सम्बन्धमें तो बात ही क्या ? 84 ॥ अनुभाष्य- द्वेषानुबन्धेनापि (शत्रुभावेनापि) अयं भगवान् हि दृष्टः (अवलोकितः), कीर्तितः (वाचा उच्चारितः) [मनसा] संस्मृतः च अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं (मोक्षादिकं) प्रयच्छति, उत सम्यग्भक्तिमताम् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानाद्यभक्तिमार्गत्रयत्यागपराणां शुद्धभक्तानां) किं [वक्तव्यम्]? श्लोक-भावानुवाद-ये भगवान् शत्रुभावसे देखने, बोलने अथवा मनके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी जब समस्त देवताओं और असुरोंके लिये दुर्लभ फल मोक्षादि दिया करते हैं, तब अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञानादि-तीन अभक्ति मार्गोंका त्याग करनेवाले शुद्धभक्तोंके सम्बन्धमें तो क्या कहा जाय ? ॥ 84 ॥ महाप्रभुके प्रकटकालमें ब्रह्माण्डके समस्त जीवोंका ही उद्धार :- तैछे तुमि नवद्वीपे करि' अवतार। सकल ब्रह्माण्ड-जीवेर करिला निस्तार ॥ 85 ॥ अनुवाद-उसी प्रकार आपने नवद्वीपमें अवतरित होकर समस्त ब्रह्माण्डके जीवोंका उद्धार कर दिया है ॥ 85 ॥ श्रीहरिदासका दैन्य- ये कहे, - 'चैतन्य-महिमा मोर गोचर हय।' से जानुक, मोर पुनः एइ त' निश्चय ॥ 86 ॥ तोमार ये लीला महा-अमृतेर सिन्धु। मोर मनोगोचर নহে तार एकबिन्दु ॥" 87 ॥ अनुवाद-जो कहता है,-'मैंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको जान लिया है', तो वह जाने। किन्तु मेरा तो
[दायाँ कॉलम]
अन्तिम निर्णय यही है कि आपकी जो लीला महा-अमृतके सिन्धुके समान है, उसकी एक भी बूँद मेरे मनके गोचर नहीं है॥" 86-87 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/25-26 संख्या और भाः 10/14/36 देखें ॥ 86-87 ॥ भक्तके द्वारा भगवान्की लीलाके रहस्यके उद्घाटनकी क्षमतासे भगवान्को भी विस्मय :- एत शुनि' प्रभुर मने चमत्कार हैल। 'मोर गूढ़लीला हरिदास केमने जानिल ?' 88 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर महाप्रभुके मनमें आश्चर्य हुआ-'मेरी गूढ़लीलाको हरिदासने कैसे जान लिया ?' 88 ॥ अनुभाष्य - 'गूढ़लीला', - जीवोद्धार-लीला ॥ 88 ॥ महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- मनेर सन्तोषे ताँरे कैला आलिङ्गन। बाह्य प्रकाशिते एसब करिला वर्जन ॥ 89 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया। उन्होंने बाह्यदशा प्रकाशित करके श्रीहरिदास ठाकुरको उनकी महिमाका और गान करनेके लिये मना किया ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीहरिदासके समस्त तात्त्विक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए, किन्तु बाह्यदशा प्रकाश करके अपने स्तुतिवाक्य कहनेसे मना किया ॥ 89 ॥ भक्तोंके वशमें भगवान् :- ईश्वर-स्वभाव,-ऐश्वर्य चाहे आच्छादिते। भक्त-ठाञि लुकाइते नारे, हय त' विदिते ॥ 90 ॥ अनुवाद-ईश्वर सदा अपने ऐश्वर्यको आच्छादित करना चाहते हैं-यह ईश्वरका स्वभाव है। किन्तु भक्तोंके समक्ष उनका ऐश्वर्य छिप नहीं पाता, यह सब जानते हैं ॥ 90 ॥
80 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/90-98 ] अनुभाष्य—आदिलीला 3/86-89 संख्या देखें ॥ 90 ॥ भक्तके निकट अजित भी पराजित, वैकुण्ठ भी मापने योग्य :— आलवन्दारु अथवा श्रीयामुनाचार्यकृत-स्तोत्ररत्न (18)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमतिशायि- सम्भावनं तव परिव्रढ़िमस्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः ॥ 91 ॥ अनुवाद—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन— इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/88 संख्या देखें ॥ 91 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी प्रशंसा :— तबे महाप्रभु निजभक्त-पाशे याञा। हरिदासेर गुण कहे शतमुख हञा ॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके पास गये और श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका गान करने लगे मानो उनके एक सौ मुख हों ॥ 92 ॥ भक्तगुणोंका कीर्तन करनेवाले भगवान् :— भक्तेर गुण कहिते प्रभुर बाड़ये उल्ल़ास। भक्तगण-श्रेष्ठ तांते श्रीहरिदास ॥ 93 ॥ अनुवाद—भक्तोंके गुणोंका गान करनेसे महाप्रभुका उल्लास बढ़ता ही जाता है, और उसपर भी श्रीहरिदास ठाकुर तो उन भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ 93 ॥ ठाकुर श्रीहरिदासकी अनन्त गुण-राशि :— हरिदासेर गुणगण—असंख्य, अपार। केह कोन अंशे वर्णि' नाहि पाय पार ॥ 94 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके गुण असंख्य, अपार हैं। कोई उनके गुणोंके एक अंशका भी सम्भवतः वर्णन कर सके, किन्तु उनके समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ 94 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीठाकुरके गुण आंशिक रूपसे वर्णित :— चैतन्यमङ्गले श्रीवृन्दावन दास। हरिदासेर गुण किछु करियाछेन प्रकाश ॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन दास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका कुछ प्रकाश किया है ॥ 95 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चैतन्यमङ्गले',—श्रीचैतन्यभागवत आदिखण्डका चौदहवाँ अध्याय देखें ॥ 95 ॥ अपने चित्तकी शुद्धिके लिये श्रीहरिदासके चरित्र-सिन्धुके बिन्दुका स्पर्श :— सब कहा ना याय हरिदासेर चरित्र। केह किछु कहे करिते आपना पवित्र ॥ 96 ॥ अनुवाद—कोई भी श्रीहरिदास ठाकुरके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं कर सकता है। कोई स्वयंको पवित्र करनेके लिये उनके कुछ गुणोंका वर्णन कर सकता है ॥ 96 ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें अवर्णित चरित्रके अंशके वर्णनकी ही प्रतिज्ञा :— वृन्दावनदास याहा ना कैला वर्णन। हरिदासेर गुण किछु शुन, भक्तगण ॥ 97 ॥ अनुवाद—हे भक्तों! अब आप श्रीहरिदास ठाकुरके कुछ गुणोंका श्रवण करो जिनका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने विस्तारसे वर्णन नहीं किया ॥ 97 ॥ बेनापोलमें श्रीठाकुरके द्वारा रामचन्द्र-खाँनके द्वारा प्रेरित वेश्याके उद्धारका वृत्तान्त :— हरिदास यबे निजगृह त्याग कैला। बेनापोलेर वन-मध्ये कतदिन रहिला ॥ 98 ॥
[ 3/98-107 तीसरा अध्याय 81 अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने जब अपने घरका त्याग किया, तब वे बेनापोलके वनमें आकर कुछ दिनों तक रहे॥98॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बेनापोल',—यशोहर-जिलेका एक ग्राम ॥ 98 ॥ अनुभाष्य—'बेनापोल',—ई, वि, आर, रेल लाइनमें खुलनाके मार्गपर बनगाँओ जंक्शनके बाद बेनापोल स्टेशन (वर्तमानमें बाङ्गलादेशमें) है; उसका निकटवर्ती स्थान ही 'बेनापोल' है ॥ 98 ॥ निर्जन-वने कुटीर करि' तुलसी-सेवन। रात्रि-दिने तिन लक्ष नामसङ्कीर्त्तन ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने निर्जन वनमें एक कुटिया बनायी और वहाँपर उन्होंने तुलसीजीका पौधा लगाया और वे उनकी सेवा करते थे। वे प्रतिदिन रात-दिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे ॥ 99 ॥ ब्राह्मणेर घरे करे भिक्षा-निर्वाहण। प्रभावे सकल लोक करये पूजन ॥ 100 ॥ अनुवाद—वे शरीरका निर्वाह किसी ब्राह्मणके घरसे भिक्षा माँगकर करते थे। श्रीहरिदास ठाकुरके भजनका ऐसा प्रभाव था कि उस क्षेत्रके सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे ॥ 100 ॥ सेइ देशाध्यक्ष नाम—रामचन्द्र खाँन। वैष्णवविद्वेषी सेइ पाषण्ड-प्रधान ॥ 101 ॥ अनुवाद—उस बेनापोलके ज़मींदारका नाम रामचन्द्र-खाँन था। वह वैष्णव-विद्वेषी और महा पाखण्डी था ॥ 101 ॥ हरिदासे लोके पूजे, सहिते ना पारे। ताँर अपमान करिते नाना उपाय करे ॥ 102 ॥ अनुवाद—लोग श्रीहरिदास ठाकुरको इतना सम्मान देते थे, यह रामचन्द्र खाँनसे सहन नहीं हुआ। इसलिये वह श्रीहरिदास ठाकुरको अपमानित करनेके लिये अनेक उपाय करने लगा ॥ 102 ॥ कोनप्रकारे हरिदासेर छिद्र नाहि पाय। वेश्यागणे आनि' करे छिद्रेर उपाय ॥ 103 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन श्रीहरिदास ठाकुरके चरित्रमें किसी प्रकारका कोई दोष ढूँढ़ नहीं पाया। तब उसने वेश्याओंको बुलवाकर श्रीहरिदास ठाकुरको पतित करनेका षड़यन्त्र रचा ॥ 103 ॥ वेश्यागणे कहे, —“एइ वैरागी हरिदास। तुमि-सब कर इहार वैराग्य नाश ॥” 104 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने वेश्याओंसे कहा, —“हरिदास नामक एक वैरागी है। तुम सब किसी प्रकारसे इसके वैराग्यका नाश करो ॥” 104 ॥ वेश्यागण-मध्ये एक सुन्दरी युवती। से कहे, —“तिनदिने हरिब ताँर मति ॥” 105 ॥ अनुवाद—उन वेश्याओंमें एक अत्यन्त सुन्दरी युवती थी। उसने कहा, —“मैं केवल तीन दिनमें ही हरिदासकी मतिको हर लूँगी ॥” 105 ॥ खाँन कहे, —“मोर पाइक याउक तोमार सने। तोमार सहित एकत्र तारे धरि' येन आने ॥” 106 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खानने कहा, —“मेरा सिपाही तुम्हारे साथ जायेगा। जैसे ही वह हरिदासको तुम्हारे साथ देखेगा, उसे रङ्गे हाथों पकड़कर ले आयेगा ॥” 106 ॥ वेश्या कहे, —“मोर सङ्ग हउक एकबार। द्वितीयबारे धरिते पाइक लइमु तोमार ॥” 107 ॥ अनुवाद—वेश्याने कहा, —“पहले एकबार मेरे साथ उसका सङ्ग होने दो, फिर दूसरी बार मैं आपके सिपाहीको उसे पकड़नेके लिये साथ ले जाऊँगी ॥” 107 ॥
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82 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/108-120 ] रात्रिकाले सेइ वेश्या सुवेश धरिया। हरिदासेर वासाय गेल उल्लसित हञा॥ 108 ॥ अनुवाद—रात्रिकालमें बहुत आकर्षक वेश धारण करके वह वेश्या बहुत प्रसन्न होकर श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियामें गयी॥ 108 ॥ तुलसी नमस्करि' हरिदासेर द्वारे याञा। गोसाञिरे नमस्करि' रहिला दाण्डाञा॥ 109 ॥ अनुवाद—उस वेश्याने कुटियाके बाहर तुलसीजीको प्रणाम किया और श्रीहरिदास ठाकुरकी कुटियाके द्वारपर जाकर उनको नमस्कार किया तथा वह वहीं खड़ी हो गयी॥ 109 ॥ अङ्ग उघाड़िया देखाय बसिया दुयारे। कहिते लागिला किछु सुमधुर स्वरे॥ 110 ॥ “ठाकुर, तुमि—परमसुन्दर, प्रथम यौवन। तोमा देखि' कोन् नारी धरिते पारे मन??111॥ तोमार सङ्गम लागि' लुब्ध मोर मन। तोमा ना पाइले प्राण ना याय धारण॥” 112 ॥ अनुवाद—फिर वह वेश्या अपने अङ्गोंको कुछ अनावृत करके श्रीहरिदास ठाकुरको दिखलाते हुए द्वारपर बैठ गयी और सुमधुर स्वरमें कहने लगी,—“हे ठाकुर! आप परम सुन्दर हैं और आपने अभी-अभी युवावस्थामें प्रवेश किया है। आपको देखकर कौन-सी नारी अपने मनको वशमें रख सकती है? आपके साथ सङ्गम करनेके लिये मेरा मन लालायित हो रहा है। आपको प्राप्त नहीं कर पानेकी स्थितिमें मैं प्राण धारण नहीं कर पाऊँगी॥” 110-112 ॥ हरिदास कहे,—“तोमा करिमु अङ्गीकार। संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् ना समाप्त आमार॥ 113 ॥ तावत् तुमि बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम-समाप्त हैले करिमु ये तोमार मन॥” 114 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं अवश्य ही तुम्हें अङ्गीकार करूँगा, किन्तु जब तक मेरे नाम-कीर्त्तनकी संख्या पूर्ण नहीं हो जाय, तब तक तुम यहीं बैठकर भगवद्-नाम-सङ्कीर्त्तनका श्रवण करो। जब मेरी नाम-संख्या समाप्त हो जायेगी, तब मैं तुम्हारे मनकी इच्छा पूर्ण करूँगा॥” 113-114 ॥ एत शुनि' सेइ वेश्या बसिया रहिला। कीर्त्तन करे हरिदास प्रातःकाल हैला॥ 115 ॥ अनुवाद—यह सुनकर वह वेश्या वहीं बैठी रही और श्रीहरिदास ठाकुर अपना नाम-सङ्कीर्त्तन करते रहे। नाम-सङ्कीर्त्तन करते-करते प्रातःकाल हो गया॥ 115 ॥ प्रातःकाल देखि' वेश्या उठिया चलिला। समाचार रामचन्द्र खाँनेरे कहिला॥ 116 ॥ “आजि आमार सङ्ग करिबे कहिला वचने। अवश्य ताहार सङ्गे हइबे सङ्गमे॥” 117 ॥ अनुवाद—प्रातःकाल देखकर वह वेश्या वहाँसे उठकर चली गयी और उसने रामचन्द्र खाँनको जाकर सब समाचार दिया तथा कहने लगी,—“हरिदासने वचन दिया है कि वह आज मेरा सङ्ग करेगा, इसलिये अवश्य ही उसके साथ मेरा सङ्गम होगा॥” 116-117 ॥ आर दिन रात्रि हैले वेश्या आइल। हरिदास ता'रे बहु आश्वास करिल॥ 118 ॥ “कालि दुःख पाइला, अपराध ना लाइबा मोर। अवश्य करिमु आमि तोमाय अङ्गीकार॥ 119 ॥ तावत् इँहा बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम पूर्ण हैले, पूर्ण हबे तोमार मन॥” 120 ॥ अनुवाद—अगले दिवस रात्रि होनेपर वह वेश्या श्रीहरिदासकी भजन कुटियामें आयी, तब श्रीहरिदासने उसे बहुत प्रकारसे आश्वासन दिया,—“कल तुम्हें मेरे कारण दुःख हुआ, इसके लिये मेरा कोई अपराध मत
[ 3/118–128 तीसरा अध्याय 83 लेना। मैं तुम्हें अवश्य ही अङ्गीकार करूँगा। तब तक तुम यहीं बैठकर नाम-सङ्कीर्तनका श्रवण करो। मेरी नाम-संख्या पूर्ण होनेपर तुम्हारे मनकी अभिलाषा भी पूर्ण हो जायेगी॥”118–120॥ तुलसीरे तबै वेश्या नमस्कार करि' । द्वारे बसि' नाम सुने, बले—'हरि' 'हरि' ॥ 121 ॥ अनुवाद—तब वेश्या तुलसीजीको प्रणाम करके द्वारपर बैठकर नाम-सङ्कीर्तन सुनने लगी और वह भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी॥ 121 ॥ रात्रि शेष हैल, वेश्या उसिमिसि करे। ता'र रीति देखि' हरिदास कहेन ताहारे॥ 122 ॥ ठाकुर श्रीहरिदासके द्वारा अपनी महामन्त्रकी दीक्षाका वर्णन और दीक्षाके द्वारा ब्राह्मणता :— “कोटि नामग्रहणयज्ञ करि एकमासे। एइ दीक्षा करियाछि, हैल आसि' शेषे॥ 123 ॥ आजि समाप्त हबेक, हेन ज्ञान छिल। समस्त रात्रि निलुँ नाम, समाप्त ना हैल ॥ 124 ॥ कालि समाप्त हबे, तबै हबे व्रतभङ्ग। स्वच्छन्दे तोमार सङ्गे हइबेक सङ्ग ॥”125 ॥ अनुवाद—रात्रि समाप्त हो गयी। वेश्या चञ्चल होकर कभी तो उठ रही थी और कभी बैठ रही थी। उसे ऐसा करते देखकर श्रीहरिदास ठाकुरने उससे कहा,—“मैं एक मासमें एक करोड़ नाम ग्रहण करनेका यज्ञ करता हूँ। मैंने ऐसा ही नियम बनाया हुआ है और अब वह प्रायः समाप्त होने ही वाला है। मैंने सोचा था कि मेरी नाम-संख्या आज पूर्ण हो जायेगी। मैंने सारी रात नाम-कीर्तन किया, परन्तु तो भी नाम-संख्या पूर्ण नहीं हुई। अब तो कल ही नाम-संख्या पूर्ण होगी और तभी मेरा व्रत खुलेगा। तब स्वच्छन्दरूपसे मेरा तुम्हारे साथ सङ्गम होगा॥”122–125 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उसिमिसि करे',—उसिमिसि अर्थात् उठना-बैठना करते बहुत चञ्चल अथवा उतावली हो गयी॥122॥ अनुभाष्य—प्रतिदिन तीन लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीससे कुछ अधिक संख्याकी गणना करते हुए हरिनाम ग्रहण करनेपर एक मासमें एक करोड़ नाम होते हैं। इस नामग्रहण-यज्ञमें नामी-स्वरूप भगवान्की उपासना होती है। साधारण लौकिक विश्वासके अनुसार श्रीहरिदास ठाकुर शौक्र [जन्म-अधिकारके द्वारा] अथवा सावित्र्य [दीक्षा-अधिकारके द्वारा] यज्ञ करनेवालेके रूपमें परिचित नहीं होनेपर भी नामयज्ञमें दीक्षित होनेके कारण, वैदिक एकायनशाखामें [आदिलीला भूमिकामें पृष्ठ संख्या xiv देखें] दीक्षित ब्राह्मणके रूपमें नाम-यज्ञका साधन करते थे। त्रिज श्रीहरिदास ठाकुरने अप्राकृत याज्ञिक-ब्राह्मण होकर जो नामयज्ञ आरम्भ किया था, वही नाम-सम्बन्धीय यज्ञ लगभग समाप्त हो गया था, अथवा [निर्धारित समयमें] समाप्त नहीं होनेपर भी तो उनका यज्ञ भङ्ग होगा, ऐसा उन्होंने कहा॥ 123 ॥ वेश्या गिया समाचार खाँनेरे कहिल। आर दिन सन्ध्याकाले ठाकुर-ठाञि आइल ॥ 126 ॥ अनुवाद—वेश्या रामचन्द्र खाँनके पास गयी और उसको रात्रिका वृत्तान्त बतलाया। अगले दिन वह सन्ध्याके समय ही श्रीहरिदास ठाकुरके पास आयी ॥ 126 ॥ तुलसीरे, ठाकुरेरे नमस्कार करि'। द्वारे बसि' नाम सुने, बले—'हरि' 'हरि' ॥ 127 ॥ अनुवाद—वेश्या तुलसी तथा श्रीहरिदास ठाकुरको प्रणाम करके द्वारपर बैठ गयी। वहाँ बैठे हुए वह श्रीहरिदासके नाम-कीर्तनका श्रवण करने लगी और स्वयं भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी ॥ 127 ॥ “नाम पूर्ण हबे आजि",—बले हरिदास। “तबे पूर्ण करिमु तोमार अभिलाष ॥”128 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने वेश्यासे कहा,—“आज
84 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/128-138 ] मेरी नामसंख्या पूर्ण हो जायेगी, तब मैं तुम्हारी अभिलाषाको पूर्ण करूँगा॥"128॥ साधुसङ्गमें वेश्याका पश्चाताप एवं ठाकुरकी कृपाकी याचना :- कीर्त्तन करिते ऐछे रात्रि शेष हैल। ठाकुरेर सने वेश्यार मन फिरि' गेल॥ 129 ॥ अनुवाद—कीर्त्तन करते हुए पहलेकी भाँति वह रात्रि समाप्त हो गयी। श्रीहरिदास ठाकुरके सङ्गसे उस वेश्याका मन परिवर्तित हो गया॥ 129 ॥ दण्डवत् हञा पड़े ठाकुर-चरणे। रामचन्द्र खाँनेर कथा कैल निवेदने॥ 130 ॥ “वेश्या हञा मुञि पाप करियाछौं अपार। कृपा करि' कर मो-अधमे निस्तार॥"131 ॥ अनुवाद—वेश्या दण्डवत् होकर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर गयी और उसने श्रीहरिदास ठाकुरको बतलाया कि रामचन्द्र खाँनने उसे उन्हें पतित करनेके लिये भेजा था। उसने आगे कहा,—“वेश्या होनेके कारण मैंने असंख्य पाप किये हैं। आप कृपा करके मुझ अधमका उद्धार कीजिये॥"130-131॥ ईश्वर-द्वेषी खाँनके प्रति श्रीठाकुरकी उपेक्षापूर्ण उक्ति :- ठाकुर कहे,—“खाँनेर कथा सब आमि जानि। अज्ञ मूर्ख सेइ, ता'रे दुःख नाहि मानि॥ 132 ॥ वेश्याके प्रति कृपाका उदय :- सेइदिन याइताम एस्थान छाड़िया। तिन दिन रहिलाङ तोमार लागिया॥"133 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं रामचन्द्र खाँनके षड़यन्त्रके विषयमें सबकुछ जानता हूँ। वह अज्ञानी मूर्ख है, इसलिये मैं उसके किसी कार्यसे दुःखी नहीं होता। जिस दिन वह यह षड़यन्त्र रच रहा था, मैं तो उसी दिन ही चला जाता, किन्तु तुम्हारे कारण ही मैं तीन दिन तक यहाँ रुका रहा॥"132-133॥ वेश्याके द्वारा अपने उद्धारकी प्रार्थना :- वेश्या कहे,—“कृपा करि' करह उपदेश। कि मोर कर्त्तव्य, याते याय भवक्लेश॥"134 ॥ अनुवाद—वेश्याने कहा,—“आप कृपा करके मुझे मेरे कर्त्तव्यके विषयमें उपदेश कीजिये जिससे मेरा जन्म-मरणका क्लेश दूर हो जाय॥"134 ॥ वेश्याको संसार और सर्वस्व त्याग करनेका उपदेश :- ठाकुर कहे,—“घरेर द्रव्य ब्राह्मणे कर दान। एइ घरे आसि' तुमि करह विश्राम॥ 135 ॥ वैष्णवसेवा और निरन्तर कृष्णकीर्त्तनके फलसे ही जीवकी प्रयोजन-सिद्धि :- निरन्तर नाम कर तुलसी-सेवन। अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण॥"136 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“तुम अभी जाकर जो कुछ तुम्हारे घरमें धन, वस्त्र, आभूषण आदि सम्पत्ति है, उनको ब्राह्मणोंको दान कर दो। तब इस कुटियामें आकर सदाके लिये वास करो। निरन्तर भगवद्-नाम करो और तुलसीजीकी सेवा करो। ऐसा करनेसे तुम्हें अतिशीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥"135-136॥ वेश्याको महामन्त्र-दीक्षा प्रदान :- एत बलि' तारे 'नाम' उपदेश करि'। उठिया चलिला ठाकुर बलि 'हरि' 'हरि'॥ 137 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीहरिदास ठाकुरने उसे 'हरे कृष्ण' महामन्त्रका अर्थ और जपकी विधिका उपदेश किया। तब 'हरि', 'हरि' बोलते हुए वे उठकर वहाँसे चले गये॥ 137 ॥ वेश्याके द्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन :- तबे सेइ वेश्या गुरुर आज्ञा लइल। गृहवित्त येबा छिल, ब्राह्मणेरे दिल॥ 138 ॥ अनुवाद—तब उस वेश्याने गुरु श्रीहरिदास ठाकुरकी
[ 3/138-144 तीसरा अध्याय 85 आज्ञाका पालन करते हुए घरमें एकत्रित समस्त धन-सम्पत्तिको ब्राह्मणोंमें बाँट दिया॥138॥ अनुभाष्य—'गुरुर',—श्रीहरिदासकी; 'गृहवित्त',—पाठान्तरमें 'गृहवृत्ति'-शब्द भी देखा जाता है; किन्तु वह सङ्गत नहीं है, क्योंकि उसकी वृत्ति अर्थात् वेश्यावृत्ति अवश्य ही ब्राह्मणको बाँटी नहीं गयी, वेश्यावृत्तिसे सञ्चित धन-सम्पत्ति ही ब्राह्मणोंको अर्पित हुई थी। शिष्यके सर्वस्वके ऊपर गुरुदेवका अधिकार होनेपर भी वैष्णव-गुरु शिष्यके गृह-धन आदि प्राकृत मलसमूहको स्वयं ग्रहण नहीं करते। जो दक्षिणा ग्रहण करते हैं, वे दक्षिणा-मार्गके द्वारा यमलोकमें पतित होते हैं; वैष्णव-गुरु वैसे यमलोकके यात्री नहीं हैं, वे उत्तरा-मार्गके पथिक हैं। इसलिये कर्मी-ब्राह्मणोंको प्राकृत वैभवसमूह आदि देनेकी व्यवस्था है। वैष्णव-गुरु हरि-विमुखताको उत्पन्न करनेवाले शिष्यके भोग्य विषय-वैभवको स्वयं ग्रहण करके शिष्यका आनुगत्य अथवा उसके मुखकी अपेक्षा नहीं करते; अपितु वैसे वैभवको हरिकी विमुखताको उत्पन्न करनेवाला मानकर उसे अवश्य ही त्याग करते हैं। शिष्यको प्राकृत-अभिमानसे मुक्त करना एवं उसके द्वारा त्याग किये गये जागतिक मलको स्वयं ग्रहण नहीं करना ही सदाचारी वैष्णव-गुरुका कर्त्तव्य है,—श्रीहरिदास ठाकुरकी यही शिक्षा है॥138॥ गुरु-गृहमें वैराग्यके साथ निरन्तर नाम-कीर्तन-सेवा :— माथा मुड़ि' एकवस्त्रे रहिल सेइ घरे। रात्रिदिने तिन लक्ष नाम ग्रहण करे॥139॥ अनुवाद—वह अपने सिरको मुण्डवाकर तथा एक वस्त्रको धारण करके उस कुटियामें रहने लगी। वह अपने गुरुके निर्देशके अनुसार प्रतिदिन तीन लाख नाम ग्रहण करने लगी॥139॥ नामसाधनके फलसे धैर्य, इन्द्रियजय और सिद्धिलाभ अथवा प्रेमोदय :— तुलसी सेवन करे, चर्वण, उपवास। इन्द्रिय-दमन हैल, प्रेमेर प्रकाश॥140॥ अनुवाद—वह तुलसीजीकी सेवा करने लगी। भिक्षामें जो कुछ चना आदि मिलता उसे चबा लेती और कभी भिक्षामें कुछ नहीं मिलता तो उपवास कर लेती। इस प्रकार उसकी समस्त इन्द्रियोंके वेगोंका दमन हो गया और उसमें प्रेमका प्रकाश हो गया॥140॥ उसे वैष्णवी-प्रतिष्ठा और गुरुत्वकी प्राप्ति :— प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महन्ती। बड़ बड़ वैष्णव ताँर दर्शनेते यान्ति॥141॥ अनुवाद—वह एक परम-महान्ती प्रसिद्धा वैष्णवी बन गयी। तब बड़े-बड़े वैष्णव भी उसके दर्शनके लिये आने लगे॥141॥ पापसे शिष्यको उद्धारकी प्राप्ति और अप्राकृत साधुचरित्रके दर्शनसे गुरुके माहात्म्यकी ख्याति :— वेश्यार चरित्र देखि' लोके चमत्कार। हरिदासेर महिमा कहे करि' नमस्कार॥142॥ अनुवाद—उस वेश्याके ऐसे परम पवित्र चरित्रको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते। वे श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाका गान करके उनको प्रणाम करते॥142॥ पाखण्डी रामचन्द्र खाँनके भीषण वैष्णवापराधका फल :— रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज कैल। सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते फलिल॥143॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने अपराधका बीज बोया, वही बीज बादमें वृक्षका रूप धारण करके जब फलित हुआ, तब उसको फल भोगना पड़ा॥143॥ महदपराधे हैल फल अद्भुत कथन। प्रस्ताव पाञा कहि, शुन, भक्तगण॥144॥ अनुवाद—महान व्यक्तिके चरणोंमें अपराध करनेके फलकी अद्भुत कथा है। हे भक्तों सुनो, मैं प्रसङ्गवश उसका वर्णन कर रहा हूँ॥144॥ अनुभाष्य— 'प्रस्ताव',—प्रसङ्ग॥144॥
86 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/145–152 ]
अनादि बहिर्मुख रामचन्द्र-खाँनकी वैष्णवापराधके फलसे वैष्णव-विद्वेषमें वृद्धि :- सहजेइ अवैष्णव रामचन्द्र खाँन। हरिदासेर अपराधे हैल असुर-समान ॥ 145 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन स्वभावसे ही अवैष्णव था। उसपर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें अपराध करनेके कारण वह असुरके समान बन गया ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—ब्राह्मणकुलमें जन्म ग्रहण करनेपर भी विष्णुके चरणोंमें अपराधके प्रभावसे विश्वश्रवाका पुत्र रावण 'असुर' कहलाया। भक्तके चरणोंमें अपराधी बनकर रामचन्द्र (खाँन भी) 'असुरके समान' कहलाकर समाजमें प्रचारित हुआ ॥ 145 ॥
वैष्णवधर्म निन्दा करे, वैष्णव-अपमान। बहुदिनेर अपराधे पाइल परिणाम ॥ 146 ॥ अनुवाद—बहुत दिनों तक वैष्णवधर्मकी निन्दा करने और वैष्णवोंका अपमान करनेपर अब रामचन्द्र खाँनको अपने अपराधोंका फल मिला ॥ 146 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुका वृत्तान्त :- नित्यानन्द-गोसाञि गौड़े यबे आइला। प्रेम प्रचारिते तबे भ्रमिते लागिला ॥ 147 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब गौड़देशमें आये, तब वे प्रेमका प्रचार करते हुए भ्रमण करने लगे ॥ 147 ॥
गौरसर्वस्व श्रीनित्यानन्दके दो प्रकारके गौर-सेवन-कार्य :- प्रेम-प्रचारण आर पाषण्डदलन। दुइकार्ये अवधूत करेन भ्रमण ॥ 148 ॥ अनुवाद—प्रेमका प्रचार तथा पाखण्डका दलन—इन दो कार्योंको करनेके उद्देश्यसे अवधूत (श्रीनित्यानन्द प्रभु) भ्रमण करने लगे ॥ 148 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें पाखण्डी रामचन्द्र-खाँनके अपराधके वृत्तान्तका वर्णन :- सर्वज्ञ नित्यानन्द आइला तार घरे। आसिया बसिला दुर्गामण्डप-उपरे ॥ 149 ॥ अनुवाद—भ्रमण करते-करते सर्वज्ञ श्रीनित्यानन्द प्रभु रामचन्द्र खाँनके घरपर आये और उसके घरके दुर्गामण्डपमें बैठ गये ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—'दुर्गा-मण्डप',—अवैष्णव सम्भ्रान्त-गृहस्थके घरमें जिस स्थानपर दुर्गापूजा होती है, उस मण्डपको 'चण्डीमण्डप' अथवा 'दुर्गामण्डप' कहते हैं; शारदीय अथवा वासन्ती पूजाके समयमें चार दिनोंके अतिरिक्त अन्य समयमें वह मण्डप अतिथि और साधारण लोगोंके द्वारा व्यवहार किया जाता है ॥ 149 ॥
अनेक लोकजन-सङ्गे अङ्गन भरिल। भितर हैते रामचन्द्र सेवक पाठाइल ॥ 150 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बहुत लोग थे, इसलिये उन्हींसे घरका आङ्गन भर गया। उस समय रामचन्द्र खाँन घरके भीतर था और वहींसे उसने अपने एक सेवकको श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास भेजा ॥ 150 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अवज्ञा :- सेवक बोले,—"गोसाञि, मोरे पाठाइल खाँन। गृहस्थेर घरे तोमाय दिमु वासस्थान ॥ 151 ॥ गोयालार गोशाला हय अत्यन्त विस्तार। इँहा सङ्कीर्ण-स्थल, तोमार मनुष्य—अपार ॥"152 ॥ अनुवाद—सेवकने कहा,—"हे गोसाईं, मुझे रामचन्द्र खाँनने अन्य किसी गृहस्थके घरमें आप लोगोंको रहनेका स्थान दिलवानेके लिये भेजा है। यह घर तो बहुत छोटा है और आपके साथ लोग भी बहुत हैं। क्योंकि गृहस्थ ग्वालोंकी गौशाला बहुत बड़ी होती है, इसलिये आपकी वहीं रहने आदिकी व्यवस्था करवा देते हैं॥" 151–152 ॥
[ 3/153–162 तीसरा अध्याय 87 श्रीनित्यानन्दका क्रोध :- भितरे आछिला, शुनि' क्रोधे बाहिरिला। अट्ट अट्ट हासि' गोसाञि कहिते लागिला ॥ 153 ॥ श्रीनित्यानन्दकी भविष्यवाणी :- “सत्य कहे,—एइ घर मोर योग्य नय। म्लेच्छ गो-वध करे, तार योग्य हय ॥” 154 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन घरके भीतर है और स्वागतके लिये स्वयं न आकर सेवकके द्वारा उन्हें कहीं और जानेकी बात कहलवायी है, तो उसके ऐसे व्यवहारसे क्रोधित होकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दुर्गामण्डपसे उठकर बाहर आ गये और अट्टहास करते हुए कहने लगे,—“रामचन्द्र खाँन ठीक ही कह रहा है। उसका यह घर मेरे रहने योग्य नहीं है। यह घर तो गायोंका वध करनेवाले म्लेच्छोंके ही वासके योग्य है।” 153–154 ॥ गणोंसहित श्रीनित्यानन्द प्रभुका विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीके स्थानका परित्याग :- एत बलि' क्रोधे गोसाञि उठिया चलिला। तारे दण्ड दिते से ग्रामे ना रहिला ॥ 155 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रोधपूर्वक वहाँसे चल दिये। उसे दण्ड देनेके उद्देश्यसे वे उस ग्राम तकमें भी नहीं रहे ॥ 155 ॥ रामचन्द्र खाँनकी चूड़ान्त पाखण्डता :- इँहा रामचन्द्र खाँन सेवके आज्ञा दिल। गोसाञि याँहा बसिला, तार माटी खोदाइल ॥ 156 ॥ अनुवाद—इधर रामचन्द्र खाँनने अपने सेवकोंको आदेश दिया कि जहाँपर श्रीनित्यानन्द गोसाईं बैठे थे, उस स्थानकी मिट्टीको खुदवाकर बाहर फेंक दो ॥ 156 ॥ गोमय-जले लेपिला सब मन्दिर-प्राङ्गण। तबु रामचन्द्रेर मन ना हैल परसन्न ॥ 157 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने सम्पूर्ण दुर्गामण्डप-मन्दिर और आङ्गनको गोबर-जलसे लिपवाया, तो भी उसका मन प्रसन्न नहीं हुआ ॥ 157 ॥ विष्णु-वैष्णव-विद्वेषका भीषण फल अथवा दण्डकी प्राप्ति :- दस्युवृत्ति करे रामचन्द्र राजारे ना देय कर। क्रुद्ध हञा म्लेच्छ उजिर आइल तार घर ॥ 158 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन चोर जैसा कार्य करता था, वह राजाको कर नहीं देता था। क्रोधित होकर म्लेच्छ मन्त्री उसके घरमें आया ॥ 158 ॥ आसि' सेइ दुर्गामण्डपे वासा कैल। अवध्य वध करि घरे मांस रान्धिल ॥ 159 ॥ अनुवाद—वह म्लेच्छ मन्त्री आकर उसी दुर्गामण्डपमें ठहरा। गायका वध नहीं करना चाहिये, परन्तु उसने रामचन्द्रके घरमें ही गायका वध करके उसके मांसको पकाया ॥ 159 ॥ स्त्री-पुत्र-सहित रामचन्द्रेरे बान्धिया। तार घर-ग्राम लुटे तिनदिन रहिया ॥ 160 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छ मन्त्रीने रामचन्द्र खाँनको उसकी स्त्री और उसके पुत्र सहित बाँध दिया। उसने तीन दिन तक उस ग्राममें रहकर रामचन्द्र खाँनके घरके साथ-ही-साथ वहाँके सभी घरोंमें लूटपाट की ॥ 160 ॥ सेइ घरे तिनदिन अवध्य-रन्धन। आरदिन सबा लञा करिला गमन ॥ 161 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके घरमें तीन दिन तक गायोंका मांस पकाया और अगले दिन वह अपने सभी साथियोंको लेकर वहाँसे चला गया ॥ 161 ॥ जाति-धन-जन खाँनेर सकल लइल। बहुदिन पर्यन्त ग्राम उजाड़ रहिल ॥ 162 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके पद, धन
88 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/162-167 ]
और जन आदि सबकुछ हर लिया। बहुत दिनों तक वह गाँव उजाड़ पड़ा रहा ॥ 162 ॥ विष्णु-वैष्णव-विद्वेषके फलसे दशा अथवा अवस्था :- महान्तेर अपमान ये देश-ग्रामे हय। एक जनार दोषे सब देश उजाड़य ॥ 163 ॥ अनुवाद—जिस देश अथवा ग्राममें महापुरुषका अपमान होता है, एक व्यक्तिके दोषके कारण वह सम्पूर्ण स्थान ही उजड़ जाता है॥ 163 ॥ अमृताणुकणिका—पतितपावन श्रीनित्यानन्द प्रभुने जगाइ-मधाइ जैसे पापकी चरमसीमा तक पहुँचे दो ब्राह्मण पुत्रोंको भी महाभागवत बना दिया। वे रामचन्द्र खाँनके भी उद्धारके लिये स्वयं उसके घरमें जाकर उपस्थित हुए, किन्तु वैष्णवापराधी रामचन्द्र खाँन पतितपावन श्रीनित्यानन्दकी उस कृपाको ग्रहण नहीं कर सका। अवधूत श्रीनित्यानन्दकी प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो दिया, किन्तु वैष्णवापराधीका उद्धार नहीं हुआ। वैष्णवापराधियोंके कानोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अयाचित अर्थात् बिना माँगी हुई कृपा भी प्रविष्ट नहीं हुई। पतितपावन श्रीनित्यानन्द पतित रामचन्द्र खाँनपर कृपा करनेके लिये आये थे, किन्तु रामचन्द्र खाँनके द्वारा कृपा ग्रहण करनेकी बात तो दूर रही, उसने श्रीनित्यानन्द प्रभुको तो अपने घरमें रहनेका स्थान भी नहीं दिया। अपितु जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे थे, उस स्थानको अपवित्र जानकर गोबर आदिसे लेपकर पवित्र करनेके प्रयाससे भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। यह भी उसका बहुत बड़ा अपराध था। वैष्णवापराधका बीज क्रमशः अङ्कुरित, पल्लवित और विस्तारित होकर वृक्षरूपमें परिणत हुआ और उसने एक दिन अपना फल प्रदान किया।—'गौड़ीय चतुर्थ खण्ड' ॥ 163 ॥ सप्तग्रामके अन्तर्गत चाँदपुरमें अनुगत बलराम आचार्यके घरमें ठाकुर-श्रीहरिदास :- हरिदास ठाकुर चलि' आइला चान्दपुरे। आसिया रहिला बलराम-आचार्येर घरे ॥ 164 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर अपनी भजन कुटिया छोड़कर चाँदपुर चले आये। वहाँ आकर वे श्रीबलराम आचार्यके घरमें रहने लगे ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चान्दपुर',—सप्तग्राम-त्रिवेणीमें हिरण्य और गोवर्धनके घरकी पूर्वदिशामें 'चाँदपुर'-ग्राम है; वहाँ हिरण्य-गोवर्धनके पुरोहित श्रीबलराम आचार्य और श्रीयदुनन्दन आचार्यके घर थे॥ 164 ॥ अनुभाष्य— 'चान्दपुर',—हुगली जिलेके अन्तर्गत त्रिवेणीके निकट यह ग्राम है; किसी-किसीके मतानुसार, परवर्तीकालमें इस ग्रामका ही नाम 'कृष्णपुर' हुआ था ॥ 164 ॥ हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारका और श्रीबलराम आचार्यका परिचय :- हिरण्य, गोवर्धन—मुलुकेर मजुमदार। तार पुरोहित—'बलराम' नाम ताँर ॥ 165 ॥ अनुवाद—श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदार चाँदपुर नामक मुलुकके (प्रदेशके) जमींदार थे तथा उनके पुरोहितका नाम श्रीबलराम था ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'मुलुक',—सप्तग्राम-मुलुक (प्रदेश) ॥ 165 ॥ अनुभाष्य— 'मजुमदार',—'मज्मु-आदार'; नवाबके राज्यमें राजस्वके हिसाब-रक्षक ॥ 165 ॥ हरिदासेर कृपापात्र, ताते भक्ति माने। यत्न करि' ठाकुरेरे राखिला सेइ ग्रामे ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीबलराम आचार्य श्रीहरिदास ठाकुरके कृपापात्र थे और उनसे सम्भ्रम प्रीति करते थे। उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको उस ग्राममें रखा और वे उनकी बड़े आदरके सहित सेवा करते थे ॥ 166 ॥ निर्जन पर्णशालाय करेन कीर्त्तन। बलराम-आचार्य-गृहे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 167 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर गाँवमें निर्जनमें बनी
[ 3/167-176 तीसरा अध्याय 89 एक पर्णकुटीमें कीर्तन करते। वे अपनी देह-यात्रा हिरण्य और गोवर्धनके द्वारा श्रीठाकुरका निर्वाहके लिये श्रीबलराम आचार्यके घरपर भिक्षा ग्रहण यथायोग्य आदर-सत्कार :- करते थे॥ 167॥ ठाकुर देखि' दुइ भाइ कैला अभ्युत्थान। पाय पड़ि' आसन दिला करिया सम्मान॥ 172॥ बाल्यकालमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको श्रीहरिदासके सङ्गरूपी कृपाकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरको देखकर दोनों भाई रघुनाथदास बालक करेन अध्ययन। उठकर खड़े हो गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया। हरिदास-ठाकुरेरे याइ' करेन दर्शन॥ 168॥ दोनों भाइयोंने सम्मानपूर्वक उन्हें आसन प्रदान किया॥ 172॥ साधुके सङ्ग और कृपाके फलसे ही श्रीचैतन्य-प्राप्ति :- अनेक पण्डित सभाय, ब्राह्मण, सज्जन। हरिदास-कृपा करे ताँहार उपरे। दुइ भाइ महापण्डित-हिरण्य, गोवर्धन॥ 173॥ सेइ कृपा 'कारण' हैल चैतन्य पाइबारे॥ 169॥ अनुवाद-उस सभामें अनेक विद्वान्, ब्राह्मण और अनुवाद-श्रीहिरण्य मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथदास सज्जन व्यक्ति थे। स्वयं दोनों मजुमदार भाई भी बहुत उस समय बालक थे और अध्ययन करते थे। वे विद्वान् थे॥ 173॥ श्रीहरिदास ठाकुरका दर्शन करने जाया करते थे। श्रीहरिदास ठाकुर उनके प्रति कृपालु थे। उनकी वह श्रीहरिदासकी प्रशंसा सुनकर दोनों भाइयोंको सुख :- कृपा ही बादमें श्रीरघुनाथदासके श्रीचैतन्य महाप्रभुका हरिदासेर गुण सबे कहे पञ्चमुखे। चरणाश्रय प्राप्त करनेका कारण बनी॥ 168-169॥ शुनिया त' दुइ भाइ पाइला बड़ सुखे॥ 174॥ चाँदपुरमें हिरण्य-गोवर्धनकी सभामें अनुवाद-वहाँ सभी व्यक्ति श्रीहरिदासके गुणोंकी श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन :- महिमाका वर्णन करने लगे मानो उनके पाँच मुख हों। ताँहा यैछे हैल हरिदासेर कथन। यह सुनकर श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन, दोनों भाइयोंको व्याख्यान,-अद्भुत कथा शुन, भक्तगण॥ 170॥ बहुत आनन्द हुआ॥ 174॥ अनुवाद-श्रीहिरण्य-गोवर्धनकी सभामें श्रीहरिदास श्रीठाकुरको देखकर पण्डितोंके द्वारा ठाकुरने नामकी महिमाका गान किया। हे भक्तों! अब नामतत्त्वका विचार :- आप उस अद्भुत कथाको श्रवण करो॥ 170॥ तिन-लक्ष नाम ठाकुर करेन कीर्त्तन। नामेर महिमा उठाइल पण्डितगण॥ 175॥ बलरामकी प्रार्थनासे एकदिन हिरण्य-गोवर्धनकी सभामें श्रीठाकुरका गमन :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमा गाते हुए एकदिन बलराम मिनति करिया। उस सभामें यह भी कहा गया कि वे प्रतिदिन तीन मजुमदारेर सभाय आइला ठाकुरे लञा॥ 171॥ लाख नाम कीर्तन करते हैं। ऐसा सुनकर विद्वानोंने नामकी महिमाका प्रसङ्ग उठाया॥ 175॥ अनुवाद-एकदिन श्रीबलराम आचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरसे श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदारकी सभामें सभीके द्वारा नामाभासको ही शुद्धनाम मानना :- चलनेका विनम्र निवेदन किया और उन्हें अपने साथ केह बोले,-'नाम हैते हय पापक्षय।' लेकर आये॥ 171॥ केह बोले,-'नाम हैते जीवेर मोक्ष हय॥' 176॥
90 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/176-180 ] अनुवाद-कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे पाप क्षय होते हैं।' अन्य कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे जीवोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है॥' 176॥ श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनामके फलका वर्णन :— हरिदास कहेन, —"नामेर एइ दुइ फल नय। नामेर फले कृष्णपदे प्रेम उपजाय॥ 177॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"नामके यह दोनों फल नहीं हैं। नामका वास्तविक फल तो भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति प्रेम उत्पन्न होना ही है॥ 177॥ शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (11/2/40) में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्यन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 178॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥ 178॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 178॥ शुद्धनाम और उसके फलस्वरूप प्रेमोदयके बीचमें ही नामाभास और उसका फल अनर्थ-निवृत्ति अन्तर्भुक्त :— आनुषङ्गिक फल नामेर—'मुक्ति', 'पापनाश'। ताहार दृष्टान्त यैछे सूर्येर प्रकाश॥ 179॥ अनुवाद-मुक्ति और पापोंका नाश तो नामका आनुषङ्गिक फल हैं। सूर्यका प्रकाश ही उसका दृष्टान्त है॥ 179॥ अनुभाष्य-नामसे गौणरूपसे संसारबन्धन-मोचन और संसार-आसक्तिरूपी पाप ध्वंस होता है। नामसे युक्त मन्त्रदीक्षाकी संज्ञामें ऐसा लिखा है— "दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्। तस्मात् दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥” [अर्थात् "क्योंकि यह दिव्यज्ञान (सम्बन्धज्ञान) प्रदान करता है एवं पापका (पाप, पापबीज और अविद्या) जड़ सहित विनाश करता है, इसलिये भगवत्तत्त्वविद् पण्डितगण इस अनुष्ठानको 'दीक्षा'के नामसे पुकारते हैं।"] उदाहरण-स्वरूप कहा जाता है कि सूर्योदयका मुख्यफल स्वप्रकाश, परप्रकाश, आनन्द आदि है और इसके अतिरिक्त गौण फलरूपमें अन्धकारका दूर होना भी लक्षित होता है॥ 179॥ नामरूपी सूर्यके उदित होनेपर अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश :— पद्यावलीमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-स्वामि-कृत 'नामकौमुदी'-श्लोक— अंहः संहरदखिलं सकृदुदयादेव सकल-लोकस्य। तरणिरिव तिमिरजलधिं जयति जगन्मङ्गलं हरेर्नाम॥ 180॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सूर्य जिस प्रकार उदित होकर तिमिर-समुद्रका (गाढ़ अन्धकारका) नाश करते हैं, उसी प्रकार जो हरिनाम एकबार भी उदित होनेपर [सेवोन्मुख इन्द्रियोंपर प्रकट होकर कीर्तन-श्रवणादि अनुष्ठानके द्वारा] समस्त लोकोंके पापोंका नाश करते हैं, वे जगत्का मङ्गल करनेवाले हरिनाम जययुक्त हों॥ 180॥ अनुभाष्य— जगन्मङ्गलं (जगतां मङ्गलं प्रेमपर्यन्तमङ्गलप्रदं) हरेः नाम (हरिनामप्रभुः) सकृत् (बारमेकम्) उदयात् (सेवोन्मुखे इन्द्रियादौ प्राकट्येन कीर्त्तन-श्रवणाद्यनुष्ठानात्) एव तरणिः (सूर्यः) तिमिर-जलधिं (गाढ़ान्धकारराशिम्) इव (यथा नाशयति तथा) सकललोकस्य (सर्वजगतः) अखिलम् अंहः (संसार-हेतुकं पापं) संहरत् (दूरीकुर्वत्) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥
[ 3/181–188 तीसरा अध्याय 91 विद्वानोंके अनुरोधसे श्रीठाकुरके द्वारा श्लोककी व्याख्या :- एइ श्लोकेर अर्थ कर पण्डितेर गण ॥" सब कहे,—"तुमि कह अर्थ-विवरण ॥" 181 ॥ अनुवाद—श्लोक पढ़नेके बाद श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“हे पण्डितगण ! आप इस श्लोकका अर्थ बतलाइये।” सभी विद्वानोंने कहा,—“आप ही इस श्लोकके अर्थकी व्याख्या कीजिये ॥” 181 ॥ श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनाम और नामाभास-तत्त्वकी व्याख्या :- हरिदास कहेन,—“यैछे सूर्येर उदय। उदय ना हैते आरम्भे तमेर हय क्षय ॥ 182 ॥ चौर-प्रेत-राक्षसादिर भय हय नाश। उदय हैले धर्म-कर्म-आदि परकाश ॥ 183 ॥ नामके फलसे कृष्णप्रेमका उदय :- ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय। उदय कैले कृष्णपदे हय प्रेमोदय ॥ 184 ॥ नामाभासके फलसे ही मुक्ति :- 'मुक्ति' तुच्छ-फल हय नामाभास हैते। ये मुक्ति भक्त ना लय, से कृष्ण चाहे दिते ॥" 185 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जैसे सूर्य उदित होनेके समय, किन्तु अभी सूर्य उदित नहीं हुआ है, अन्धकारका नाश होना आरम्भ हो जाता है। चोर, प्रेत, राक्षस आदिका भय समाप्त हो जाता है। जब सूर्य उदित हो जाता है, तब सब कुछ प्रकाशित हो जाता है और सभी अपने धर्म-कर्म आदिमें लग जाते हैं। इसी प्रकार नाम उदित होनेके आरम्भमें (अर्थात् अपराधरहित नामाभास) ही समस्त पापोंका तुरन्त नाश कर देता है। और नामके सम्पूर्ण रूपसे उदित होनेपर श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय होता है। नामाभाससे ही 'मुक्ति'रूपी तुच्छ फल प्राप्त हो जाता है। श्रीकृष्णके द्वारा मुक्ति देनेकी इच्छा करनेपर भी भक्त उसे ग्रहण नहीं करते ॥” 182-185 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धभक्तको श्रीकृष्ण मुक्ति देना चाहनेपर भी वे उसे नहीं लेते ॥ 185 ॥ श्रीमद्भागवत (6/2/49) में— म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम्। अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ 186 ॥ अनुवाद—पुत्रको लक्ष्य करके हरिनाम ग्रहण करके ही मरणोन्मुख अजामिलने जब वैकुण्ठधाममें गमन किया, तब श्रद्धापूर्वक नाम लेनेसे क्या होगा, उसे कहा नहीं जा सकता (वैकुण्ठगमनकी तो बात ही नहीं) ॥ 186 ॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 3/63 संख्या देखें ॥ 186 ॥ श्रीमद्भागवत (3/29/13) में— सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 187 ॥ अनुवाद—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है ॥ 187 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 187 ॥ नाममें अर्थवादी पाखण्डी गोपाल-चक्रवर्त्तीका वृत्तान्त :- गोपाल-चक्रवर्त्ती नाम एकजन। मजुमदारेर घरे सेइ आरिन्दा-ब्राह्मण ॥ 188 ॥ अनुवाद—गोपाल चक्रवर्त्ती नामक एक व्यक्ति श्रीहिरण्य एवं श्रीगोवर्धन मजुमदारके घरपर एक प्रधान आरिन्दा (कर-संग्रहकारी) पदपर नियुक्त था ॥ 188 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आरिन्दा',—तहसील-संग्रहकारी पैदल-सिपाही (पत्र और राजकर-वाहक पैदल- सिपाही) ॥ 188 ॥
92 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/189-196 ] गौड़े रहिं पात्साहा-आगे आरिन्दागिरि करे। बार-लक्ष मुद्रा सेइ पात्साहारे भरे ॥ 189 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती गौड़देशमें रहता था और बादशाहके लिये वहाँसे कर-संग्रह करता था। प्रतिवर्ष बारह लाख मुद्राएँ ले जाकर गौड़देशके बादशाहके कोषमें जमा करवाना उसका दायित्व था ॥ 189 ॥ परम-सुन्दर, पण्डित, नूतन यौवन। नामाभासे 'मुक्ति' शुनि' ना हइल सहन ॥ 190 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती परम सुन्दर, विद्वान तथा नवयुवक था। 'नामाभाससे ही मुक्तिकी प्राप्ति होती हैं'-श्रीहरिदासके ये वचन सुनकर वह उसे सहन नहीं कर पाया ॥ 190 ॥ क्रोधसे भरकर श्रीठाकुरके प्रति अवज्ञापूर्ण उक्ति :- क्रुद्ध हञा बले सेइ सरोष वचन। “भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर गण ॥ 191 ॥ पाखण्डीका नाममें अर्थवाद :- कोटि-जन्मे ब्रह्मज्ञाने येइ 'मुक्ति' नय। एइ कहे, -नामाभास-मात्रे सेइ 'मुक्ति' हय ॥" 192 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती क्रोधित हो गया और रोषपूर्वक कहने लगा, - "हे विद्वानों, इस भावुक व्यक्तिका सिद्धान्त सुनो। करोड़ों जन्मों तक ब्रह्मज्ञानका अनुशीलन करनेसे जो मुक्ति सहज नहीं है, यह कह रहा है कि नामाभास मात्रसे ही वह मुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥" 191-192 ॥ श्रीठाकुरके द्वारा शास्त्र-प्रमाण उद्धृत करना और प्रेमभक्ति परायणके लिये मुक्तिकी तुच्छताका वर्णन :- हरिदास कहेन, - "केने करह संशय? शास्त्रे कहे, - नामाभास-मात्रे 'मुक्ति' हय ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "आप संशय क्यों कर रहे हैं? शास्त्रोंमें कहा गया है, - नामाभास मात्रसे ही 'मुक्ति' हो जाती है ॥ 193 ॥ भक्तिसुख-आगे 'मुक्ति' अति-तुच्छ हय। अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि लय ॥ 194 ॥ अनुवाद-भक्तिके सुखके आगे मुक्ति अति तुच्छ है। अतएव भक्तगण दिये जानेपर भी मुक्ति नहीं लेते ॥ 194 ॥ हरिभक्तिसुधोदयेमें- त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे । सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥ 195 ॥ अनुवाद- हे जगद्गुरो ! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है ॥ 195 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें ॥ 195 ॥ श्रीठाकुरको शपथ-प्रदान :- विप्र कहे, - "नामाभासे यदि 'मुक्ति' नय। तबे तोमार नाक काटि' करह निश्चय ॥" 196 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीने कहा, - "यदि नामाभाससे मुक्ति नहीं होती हो, तो मैं अवश्य ही तुम्हारी नाक काट दूँगा ॥" 196 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थमें यह बात लिखी है (चैः भाः आदिखण्ड 16/300)- "कलियुगे राक्षस-सकल विप्र-घरे। जन्मिबेक सुजनेर हिंसा करिवारे ॥" "सज्जन लोगोंके साथ हिंसा-द्वेष करनेके लिये कलियुगमें सभी राक्षस ब्राह्मण-घरमें जन्म ग्रहण करेंगे।" 'भक्तिरत्नाकर', 'नरोत्तमविलास', 'रसिकमङ्गल' आदि ग्रन्थोंकी आलोचना करनेसे भी यह जाना जाता है कि पाखण्डी लोगोंने श्रील नरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द प्रभु
[ 3/196–204 तीसरा अध्याय 93 आदि आचार्योंके प्रति किस प्रकारसे विद्वेष किया है। इसलिये जिस प्रकार प्रपञ्चमें भगवान्के आविर्भावके साथ-साथ रावण, जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, कंस, पूतना, अघासुर, बकासुर आदि लीलापोषणकारी असुर जन्म ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार युग-युगमें आचार्यगणोंके आविर्भूत होनेपर उनकी लीलापुष्टि करनेके लिये असुर स्वभाववाले व्यक्तियोंकी भी वृद्धि होती है। चिरकालसे यह जगत्की एक प्रथा है। श्रीविष्णुस्वामी, श्रीरामानुज, श्रीमध्व, श्रीनिम्बार्क आदि आचार्योंकी जीवनीकी आलोचना करनेपर भी इस बातकी साक्षी पद-पदमैं देखी जाती है। जब आचार्यके विरुद्धमें समस्त अनाचारी समाज विद्वेष करके अन्धतामिस्रमें प्रवेश करनेके लिये कृतसङ्कल्प होता है, तब भी आचार्य सत्यकी सुदृढ़ नींवपर दृढ़तासे खड़े रहकर उच्च स्वरसे सनातनी वाणीकी घोषणा करनेमें एक पद भी पीछे नहीं हटते हैं। इसके द्वारा ही आचार्यका आचार्यत्व प्रमाणित होता है।—“गौड़ीय चतुर्थ खण्ड” ॥ 196 ॥ श्रीठाकुरके द्वारा शपथको स्वीकार करना :— हरिदास कहेन,—“यदि नामाभासे 'मुक्ति' नय। तबे आमार नाक काटिमु,—एइ सुनिश्चय ॥”197 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“यदि नामाभाससे मुक्ति नहीं होती हो, तो निश्चय ही मैं अपनी नाक काट दूँगा ॥”197 ॥ सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा ब्रह्मबन्धुको धिक्कार-देना :— शुनि' सभासद् उठे करि' हाहाकार। मजुमदार सेइ विप्रे करिल धिक्कार ॥ 198 ॥ अनुवाद—इस प्रकार गोपाल-चक्रवर्त्तीकी चुनौतीकी बात सुनकर सभामें उपस्थित सभी व्यक्ति उठकर खड़े हो गये और हाहाकार करने लगे। श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस ब्राह्मण अर्थात् गोपाल-चक्रवर्त्तीको धिक्कार दिया ॥ 198 ॥ उसे नास्तिक हेतुवादी जानकर बलराम आचार्यके द्वारा तिरस्कार और अभिशाप देना :— बलाइ पुरोहित तारे करिला भर्त्सन । “घट-पटिया मूर्ख तुमि, भक्ति काँहा जान ?199 ॥ हरिदास ठाकुरे तुञ्जि कैलि अपमान ! सर्वनाश हबे तोर, ना हबे कल्याण ॥”200 ॥ अनुवाद—श्रीबलराम आचार्यने भी गोपाल चक्रवर्त्तीकी भर्त्सना करते हुए कहा,—“तुम घट और पटको लेकर तर्क करनेवाले मूर्ख हो, भक्तिके विषयमें तुम्हें क्या ज्ञान है? तुमने श्रीहरिदास ठाकुरका अपमान किया है, तुम्हारा सर्वनाश होगा, कभी कल्याण नहीं होगा ॥”199–200 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'घटपटिया',—घट और पटको लेकर वृथा तर्क करनेवाले नैयायिक ॥ 199 ॥ नाममें अर्थवाद करनेवालेके सङ्गका परित्याग :— शुनि' हरिदास तबे उठिया चलिला। मजुमदार सेइ विप्रे त्याग करिला ॥ 201 ॥ अनुवाद—यह सब सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उठकर चलने लगे। श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस ब्राह्मणका त्याग कर दिया अर्थात् उसे आरिन्दाके पदसे निष्कासित कर दिया ॥ 201 ॥ सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा श्रीठाकुरके चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :— सभा-सहिते हरिदासेर पड़िला चरणे। हरिदास हासि' कहे मधुर-वचने ॥ 202 ॥ अदोषदर्शी श्रीठाकुरके द्वारा क्षमा :— “तोमा सबार दोष नाहि, एइ अज्ञ ब्राह्मण। तार दोष नाहि, तार तर्कनिष्ठ मन ॥ 203 ॥ अचिन्त्य-स्वभाव अधोक्षज नामप्रभु—जड़ीय युक्ति और तर्कसे अतीत :— तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व। कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व ? ?204 ॥
94 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/202-212 ] श्रीकृष्णसे सभीकी कुशल-याचना :- याह घर, कृष्ण करुन कुशल सबार। आमार सम्बन्धे दुःख ना हउक काहार॥" 205॥ अनुवाद-श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदार सभाके सभी सदस्यों सहित श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर गये। श्रीहरिदास ठाकुरने मुस्कुराते हुए मधुर वचन कहे,-"आप सबका कोई दोष नहीं है, यह ब्राह्मण अज्ञानी है, इसमें इसका भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि इसका मन तर्कनिष्ठ है। नामका माहात्म्य तो तर्कके द्वारा नहीं समझा जा सकता। तर्कनिष्ठ होनेके कारण यह ब्राह्मण इन सब तत्त्वोंको कहाँसे जानेगा? आप सभी अपने घर जाइये। श्रीकृष्ण आप सबका मङ्गल करें। मेरे अपमानके विषयमें आप कुछ भी दुःख मत कीजिये॥" 202-205॥ हिरण्य-गोवर्धनका पाखण्डी ब्रह्मबन्धुके सङ्गका वर्जन :- तबे से हिरण्यदास निज-घरे आइल। सेइ ब्राह्मणे निज-द्वार माना कैल॥ 206॥ अनुवाद-तब श्रीहिरण्यदास मजुमदार अपने घर लौट आये और उन्होंने उस ब्राह्मण गोपाल-चक्रवर्त्तीको अपने घरके द्वारके भीतर आनेसे मना कर दिया॥ 206॥ नाममें अर्थवाद और वैष्णव-अवज्ञाका भीषण फल अथवा दण्ड :- तिन दिन रहि' सेइ विप्रेर 'कुष्ठ' हैल। अति उच्च-नासा तार गलिया पड़िला॥ 207॥ अनुवाद-तीन दिनोंमें ही उस ब्राह्मण गोपाल चक्रवर्त्तीको कोढ़का रोग हो गया और उसके परिणामस्वरूप उसकी अति ऊँची नाक गलकर गिर गयी॥ 207॥ चम्पक-कलि-सम हस्त-पदाङ्गुलि। कौँकड़ हइल सब, कुष्ठे गेल गलि'॥ 208॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीके हाथ तथा पैरोंकी अँगुलियाँ चम्पकपुष्पकी कलीके समान सुन्दर थी, किन्तु कोढ़के रोगके कारण वे मुड़ गयीं और धीरे-धीरे गल गयीं॥ 208॥ ठाकुरके ऐश्वर्यके दर्शनसे सभीके द्वारा उनकी स्तुति :- देखिया सकल लोक हैल चमत्कार। हरिदासे प्रशंसि' ताँरे करे नमस्कार॥ 209॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीकी ऐसी अवस्था देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभीने श्रीहरिदास ठाकुरके प्रभावकी प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम किया॥ 209॥ भगवान् और भक्त (विष्णु और वैष्णवों)का स्वभाव :- यद्यपि हरिदास विप्रेर दोष ना लइला। तथापि ईश्वर तारे फल भुआइला॥ 210॥ अनुवाद-यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरने गोपाल चक्रवर्त्तीका कोई अपराध नहीं लिया, तथापि भगवान्से यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने उसे उसके अपराधका फल भुगवाया॥ 210॥ भक्त-स्वभाव, -अज्ञ-दोष क्षमा करे। कृष्ण-स्वभाव, -भक्त-निन्दा सहिते ना पारे॥ 211॥ अनुवाद-भक्त स्वभावतः ही अज्ञानी व्यक्तिके अपराधोंको क्षमा कर देते हैं। किन्तु श्रीकृष्णका स्वभाव ऐसा है कि वे अपने भक्तकी निन्दाको सहन नहीं कर पाते॥ 211॥ ब्रह्मबन्धुके क्लेशका श्रवण करके स्थान-त्याग और शान्तिपुरमें आगमन :- विप्र-दुःख शुनि' हरिदास मने दुःखी हैला। बलाइ-पुरोहिते कहि' शान्तिपुर आइला॥ 212॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती कोढ़से कष्ट भोग रहा है, यह सुनकर श्रीहरिदास ठाकुरका मन बहुत दुःखी हुआ। श्रीहरिदास ठाकुर पुरोहित श्रीबलराम आचार्यको बतलाकर शान्तिपुर आ गये॥ 212॥
[ 3/213-220 तीसरा अध्याय 95 [बायाँ स्तम्भ] श्रीअद्वैताचार्यके साथ मिलन :- आचार्ये मिलिया कैला दण्डवत् प्रणाम। अद्वैत आलिङ्गन करि' करिला सम्मान ॥ 213 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यसे मिलकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यने उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया॥ 213 ॥ आचार्यके द्वारा श्रीठाकुरका आनुकूल्य-विधान और गीता-भागवत-कीर्तन :- गङ्गातीरे गोफा करि' निर्जने ताँरे दिला। भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला ॥ 214 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने गङ्गाके तटपर निर्जन स्थानपर एक गुफा बनाकर श्रीहरिदास ठाकुरको रहनेके लिये दे दी और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको भागवत तथा गीताके भक्तिपरक अर्थोंका श्रवण कराया॥ 214 ॥ दोनोंका नित्य कृष्णकथा-संलाप :- आचार्येर घरे नित्य भिक्षा-निर्वाहण। दुइ जना मेलि' कृष्ण-कथा-आस्वादन ॥ 215 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके घरपर नित्य श्रीहरिदास ठाकुर भोजन ग्रहण करते और दोनों मिलकर श्रीकृष्ण-कथाका आस्वादन करते॥ 215 ॥ श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- हरिदास कहे, — “गोसाञि, करि निवेदने। मोरे प्रत्यह अन्न देह' कोन् प्रयोजने ? ? 216 ॥ महा-महा विप्र एथा कुलीन-समाज। आमारे आदर कर, ना वासह लाज ! ! 217 ॥ अलौकिक आचार तोमार, कहिते पाइ भय। सेइ कृपा करिबा, —याते तोमार रक्षा हय ॥" 218 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, — “हे गोसाईं, मैं आपसे एक निवेदन कर रहा हूँ। आप प्रतिदिन मुझे किस उद्देश्यसे भोजन कराते हैं? यहाँ शान्तिपुरमें बड़े-बड़े ब्राह्मण वास करते हैं और कुलीन समाज है। [दायाँ स्तम्भ] यद्यपि मैं तो नीचकुलका हूँ, तथापि आप लज्जाका भय नहीं करके मुझे इतना आदर देते हैं। आपका आचरण अलौकिक अर्थात् संसारकी मर्यादासे परे है। यद्यपि आपको यह सब कहते हुए मुझे भय लगता है, तथापि आप मुझपर ऐसी कृपा करना जिससे आपकी समाजमें निन्दासे रक्षा हो ॥” 216-218 ॥ अनुभाष्य— 'रक्षा'- व्यवहारिक लोकसमाज रक्षा अथवा सामाजिक लज्जा-निन्दादिसे रक्षा ॥ 218 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक श्रीअद्वैताचार्यके निरपेक्ष सात्वत-शास्त्र-सम्मत वचन :- आचार्य कहेन, — “तुमि ना करिह भय। सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत हय ॥ 219 ॥ तुमि खाइले हय कोटि ब्राह्मण-भोजन।” एत बलि' श्राद्धपात्र कराइला भोजन ॥ 220 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “हे हरिदास ठाकुर ! आप भय मत कीजिये। मैं शास्त्रोंके मतके अनुसार ही आचरण करूँगा। आपको भोजन करानेसे करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराना हो जाता है।” यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरको श्राद्ध-पात्रका भोजन कराया॥ 219-220 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'श्राद्धपात्र', -श्राद्धके दिन गृहस्थ-वैष्णवोंको भगवान्को निवेदन करके सब प्रकारकी खाद्य वस्तुओंको वैष्णवों और ब्राह्मणोंको भोजन करानेका विधान है। श्रीअद्वैतप्रभुने संसारमें उस प्रकारके श्राद्धदिवसके उपस्थित होनेपर श्रीहरिदासको श्राद्धपात्र (अप्राकृत ब्राह्मण गुरु मानकर) खिलाया ॥ 220 ॥ तीसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—भक्तिसन्दर्भकी 177 संख्यामें उद्धृत गरुड़पुराण वचन, — “ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः ॥ सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते। वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते ॥”
96 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/220-226 ] [अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक अधिकांश अवैष्णव हैं, इनका संसार-मोचन किस पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक प्रकार होगा? इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने श्रीकृष्णको अवतरित सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त- करानेकी प्रतिज्ञा की और वे जल एवं तुलसी शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों अर्पणकर श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे॥ 221-222 ॥ वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”] श्रीहरिदासके द्वारा नाम कीर्तन :- भक्तिसन्दर्भकी 247 संख्यामें उद्धृत गरुड़पुराण वचन,- हरिदास करे गोफाय नाम-सङ्कीर्त्तन। “भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। कृष्ण अवतीर्ण हबेन, -एइ ताँर मन ॥ 223 ॥ स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः॥” अनुवाद-इसी प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें बैठकर नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे। उनके मनमें भी यही [अर्थात् “(भगवद्भक्तोंके प्रति वात्सल्य, पूजा-विषयमें भाव था कि नाम-सङ्कीर्त्तनके द्वारा श्रीकृष्ण अवश्य ही अनुमोदन, भगवत् कथाके श्रवणमें प्रीति, स्वर-नेत्रादिका अवतरित होंगे॥ 223 ॥ विकार, भगवत् प्रीतिके लिये नृत्य, दम्भ परित्याग, स्वयं अर्चन और विष्णुको जीविका नहीं बनाना)—यह आठ दोनोंके आह्वानसे जीवोंके उद्धारके लिये प्रकारकी भक्ति यदि किसी म्लेच्छमें भी विद्यमान हो, श्रीकृष्णचैतन्य अवतार और नामप्रेमके वितरणके द्वारा समस्त जगत्का उद्धार :- तो उस व्यक्तिकी ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ, पण्डित, ज्ञानीमें दुइजनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार। गणना होती है, उसे दान करेंगे, उसका अवशेष ग्रहण नाम-प्रेम प्रचार कैला जगत् उद्धार ॥ 224 ॥ करेंगे एवं श्रीहरिकी भाँति उसकी पूजा करेंगे।”] अनुवाद-इन दोनोंकी भक्तिके प्रभावसे श्रीचैतन्य हःभःविः 10/91,- “न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। महाप्रभु अवतरित हुए। महाप्रभुने हरिनामके द्वारा प्रेमका तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” प्रचार करके जगत्का उद्धार किया॥ 224 ॥ [अर्थात् “चारों वेदोंको जाननेपर भी यदि कोई मेरा श्रीठाकुरके अप्राकृत चरित्रका वर्णन :- अभक्त हो तो वह मुझे प्रिय नहीं है, परन्तु चण्डाल आर अलौकिक एक चरित्र ताँहार। भी भक्त होनेपर मुझे प्रिय है, उसे दान करना चाहिये, याहार श्रवणे लोके हय चमत्कार ॥ 225 ॥ उसका उच्छिष्ट ग्रहण करना चाहिये और वह मेरी श्रौतपन्थामें अप्राकृत अनुभूति, भाँति ही पूज्य है।]॥ 220 ॥ तर्कपन्थामें वह असम्भव :- श्रीअद्वैताचार्यकी जीवोंके प्रति अतुलनीय कृपा :- तर्क ना करिह, तर्कागोचर ताँर रीति। जगत्-निस्तार लागि' करेन चिन्तन। विश्वास करिया शुन करिया प्रतीति ॥ 226 ॥ अवैष्णव-जगत् केमने हइबे मोचन ? ? 221 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके जीवनकी अन्य एक आचार्यके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना :- अलौकिक घटना है जिसे सुनकर लोग आश्चर्यचकित कृष्णे अवतारिते अद्वैत प्रतिज्ञा करिला। हो जाते हैं। इस विषयमें किसी प्रकारका तर्क मत जल-तुलसी दिया पूजा करिते लागिला ॥ 222 ॥ करना, क्योंकि उनकी रीति तर्कसे परे है। आप सभी अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के उद्धारके लिये सदा श्रद्धापूर्वक विश्वासके साथ इन कथाओंको श्रवण चिन्तन करते थे। उन्होंने विचार किया कि जगत्में कीजिये॥ 225-226 ॥