भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2101

84 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/128-138 ] मेरी नामसंख्या पूर्ण हो जायेगी, तब मैं तुम्हारी अभिलाषाको पूर्ण करूँगा॥"128॥ साधुसङ्गमें वेश्याका पश्चाताप एवं ठाकुरकी कृपाकी याचना :- कीर्त्तन करिते ऐछे रात्रि शेष हैल। ठाकुरेर सने वेश्यार मन फिरि' गेल॥ 129 ॥ अनुवाद—कीर्त्तन करते हुए पहलेकी भाँति वह रात्रि समाप्त हो गयी। श्रीहरिदास ठाकुरके सङ्गसे उस वेश्याका मन परिवर्तित हो गया॥ 129 ॥ दण्डवत् हञा पड़े ठाकुर-चरणे। रामचन्द्र खाँनेर कथा कैल निवेदने॥ 130 ॥ “वेश्या हञा मुञि पाप करियाछौं अपार। कृपा करि' कर मो-अधमे निस्तार॥"131 ॥ अनुवाद—वेश्या दण्डवत् होकर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर गयी और उसने श्रीहरिदास ठाकुरको बतलाया कि रामचन्द्र खाँनने उसे उन्हें पतित करनेके लिये भेजा था। उसने आगे कहा,—“वेश्या होनेके कारण मैंने असंख्य पाप किये हैं। आप कृपा करके मुझ अधमका उद्धार कीजिये॥"130-131॥ ईश्वर-द्वेषी खाँनके प्रति श्रीठाकुरकी उपेक्षापूर्ण उक्ति :- ठाकुर कहे,—“खाँनेर कथा सब आमि जानि। अज्ञ मूर्ख सेइ, ता'रे दुःख नाहि मानि॥ 132 ॥ वेश्याके प्रति कृपाका उदय :- सेइदिन याइताम एस्थान छाड़िया। तिन दिन रहिलाङ तोमार लागिया॥"133 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं रामचन्द्र खाँनके षड़यन्त्रके विषयमें सबकुछ जानता हूँ। वह अज्ञानी मूर्ख है, इसलिये मैं उसके किसी कार्यसे दुःखी नहीं होता। जिस दिन वह यह षड़यन्त्र रच रहा था, मैं तो उसी दिन ही चला जाता, किन्तु तुम्हारे कारण ही मैं तीन दिन तक यहाँ रुका रहा॥"132-133॥ वेश्याके द्वारा अपने उद्धारकी प्रार्थना :- वेश्या कहे,—“कृपा करि' करह उपदेश। कि मोर कर्त्तव्य, याते याय भवक्लेश॥"134 ॥ अनुवाद—वेश्याने कहा,—“आप कृपा करके मुझे मेरे कर्त्तव्यके विषयमें उपदेश कीजिये जिससे मेरा जन्म-मरणका क्लेश दूर हो जाय॥"134 ॥ वेश्याको संसार और सर्वस्व त्याग करनेका उपदेश :- ठाकुर कहे,—“घरेर द्रव्य ब्राह्मणे कर दान। एइ घरे आसि' तुमि करह विश्राम॥ 135 ॥ वैष्णवसेवा और निरन्तर कृष्णकीर्त्तनके फलसे ही जीवकी प्रयोजन-सिद्धि :- निरन्तर नाम कर तुलसी-सेवन। अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर चरण॥"136 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“तुम अभी जाकर जो कुछ तुम्हारे घरमें धन, वस्त्र, आभूषण आदि सम्पत्ति है, उनको ब्राह्मणोंको दान कर दो। तब इस कुटियामें आकर सदाके लिये वास करो। निरन्तर भगवद्-नाम करो और तुलसीजीकी सेवा करो। ऐसा करनेसे तुम्हें अतिशीघ्र ही श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥"135-136॥ वेश्याको महामन्त्र-दीक्षा प्रदान :- एत बलि' तारे 'नाम' उपदेश करि'। उठिया चलिला ठाकुर बलि 'हरि' 'हरि'॥ 137 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीहरिदास ठाकुरने उसे 'हरे कृष्ण' महामन्त्रका अर्थ और जपकी विधिका उपदेश किया। तब 'हरि', 'हरि' बोलते हुए वे उठकर वहाँसे चले गये॥ 137 ॥ वेश्याके द्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन :- तबे सेइ वेश्या गुरुर आज्ञा लइल। गृहवित्त येबा छिल, ब्राह्मणेरे दिल॥ 138 ॥ अनुवाद—तब उस वेश्याने गुरु श्रीहरिदास ठाकुरकी