श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2102, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/138-144 तीसरा अध्याय 85 आज्ञाका पालन करते हुए घरमें एकत्रित समस्त धन-सम्पत्तिको ब्राह्मणोंमें बाँट दिया॥138॥ अनुभाष्य—'गुरुर',—श्रीहरिदासकी; 'गृहवित्त',—पाठान्तरमें 'गृहवृत्ति'-शब्द भी देखा जाता है; किन्तु वह सङ्गत नहीं है, क्योंकि उसकी वृत्ति अर्थात् वेश्यावृत्ति अवश्य ही ब्राह्मणको बाँटी नहीं गयी, वेश्यावृत्तिसे सञ्चित धन-सम्पत्ति ही ब्राह्मणोंको अर्पित हुई थी। शिष्यके सर्वस्वके ऊपर गुरुदेवका अधिकार होनेपर भी वैष्णव-गुरु शिष्यके गृह-धन आदि प्राकृत मलसमूहको स्वयं ग्रहण नहीं करते। जो दक्षिणा ग्रहण करते हैं, वे दक्षिणा-मार्गके द्वारा यमलोकमें पतित होते हैं; वैष्णव-गुरु वैसे यमलोकके यात्री नहीं हैं, वे उत्तरा-मार्गके पथिक हैं। इसलिये कर्मी-ब्राह्मणोंको प्राकृत वैभवसमूह आदि देनेकी व्यवस्था है। वैष्णव-गुरु हरि-विमुखताको उत्पन्न करनेवाले शिष्यके भोग्य विषय-वैभवको स्वयं ग्रहण करके शिष्यका आनुगत्य अथवा उसके मुखकी अपेक्षा नहीं करते; अपितु वैसे वैभवको हरिकी विमुखताको उत्पन्न करनेवाला मानकर उसे अवश्य ही त्याग करते हैं। शिष्यको प्राकृत-अभिमानसे मुक्त करना एवं उसके द्वारा त्याग किये गये जागतिक मलको स्वयं ग्रहण नहीं करना ही सदाचारी वैष्णव-गुरुका कर्त्तव्य है,—श्रीहरिदास ठाकुरकी यही शिक्षा है॥138॥ गुरु-गृहमें वैराग्यके साथ निरन्तर नाम-कीर्तन-सेवा :— माथा मुड़ि' एकवस्त्रे रहिल सेइ घरे। रात्रिदिने तिन लक्ष नाम ग्रहण करे॥139॥ अनुवाद—वह अपने सिरको मुण्डवाकर तथा एक वस्त्रको धारण करके उस कुटियामें रहने लगी। वह अपने गुरुके निर्देशके अनुसार प्रतिदिन तीन लाख नाम ग्रहण करने लगी॥139॥ नामसाधनके फलसे धैर्य, इन्द्रियजय और सिद्धिलाभ अथवा प्रेमोदय :— तुलसी सेवन करे, चर्वण, उपवास। इन्द्रिय-दमन हैल, प्रेमेर प्रकाश॥140॥ अनुवाद—वह तुलसीजीकी सेवा करने लगी। भिक्षामें जो कुछ चना आदि मिलता उसे चबा लेती और कभी भिक्षामें कुछ नहीं मिलता तो उपवास कर लेती। इस प्रकार उसकी समस्त इन्द्रियोंके वेगोंका दमन हो गया और उसमें प्रेमका प्रकाश हो गया॥140॥ उसे वैष्णवी-प्रतिष्ठा और गुरुत्वकी प्राप्ति :— प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम-महन्ती। बड़ बड़ वैष्णव ताँर दर्शनेते यान्ति॥141॥ अनुवाद—वह एक परम-महान्ती प्रसिद्धा वैष्णवी बन गयी। तब बड़े-बड़े वैष्णव भी उसके दर्शनके लिये आने लगे॥141॥ पापसे शिष्यको उद्धारकी प्राप्ति और अप्राकृत साधुचरित्रके दर्शनसे गुरुके माहात्म्यकी ख्याति :— वेश्यार चरित्र देखि' लोके चमत्कार। हरिदासेर महिमा कहे करि' नमस्कार॥142॥ अनुवाद—उस वेश्याके ऐसे परम पवित्र चरित्रको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते। वे श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाका गान करके उनको प्रणाम करते॥142॥ पाखण्डी रामचन्द्र खाँनके भीषण वैष्णवापराधका फल :— रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज कैल। सेइ बीज वृक्ष हञा आगेते फलिल॥143॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने अपराधका बीज बोया, वही बीज बादमें वृक्षका रूप धारण करके जब फलित हुआ, तब उसको फल भोगना पड़ा॥143॥ महदपराधे हैल फल अद्भुत कथन। प्रस्ताव पाञा कहि, शुन, भक्तगण॥144॥ अनुवाद—महान व्यक्तिके चरणोंमें अपराध करनेके फलकी अद्भुत कथा है। हे भक्तों सुनो, मैं प्रसङ्गवश उसका वर्णन कर रहा हूँ॥144॥ अनुभाष्य— 'प्रस्ताव',—प्रसङ्ग॥144॥