श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2103, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें86 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/145–152 ]
अनादि बहिर्मुख रामचन्द्र-खाँनकी वैष्णवापराधके फलसे वैष्णव-विद्वेषमें वृद्धि :- सहजेइ अवैष्णव रामचन्द्र खाँन। हरिदासेर अपराधे हैल असुर-समान ॥ 145 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन स्वभावसे ही अवैष्णव था। उसपर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें अपराध करनेके कारण वह असुरके समान बन गया ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—ब्राह्मणकुलमें जन्म ग्रहण करनेपर भी विष्णुके चरणोंमें अपराधके प्रभावसे विश्वश्रवाका पुत्र रावण 'असुर' कहलाया। भक्तके चरणोंमें अपराधी बनकर रामचन्द्र (खाँन भी) 'असुरके समान' कहलाकर समाजमें प्रचारित हुआ ॥ 145 ॥
वैष्णवधर्म निन्दा करे, वैष्णव-अपमान। बहुदिनेर अपराधे पाइल परिणाम ॥ 146 ॥ अनुवाद—बहुत दिनों तक वैष्णवधर्मकी निन्दा करने और वैष्णवोंका अपमान करनेपर अब रामचन्द्र खाँनको अपने अपराधोंका फल मिला ॥ 146 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुका वृत्तान्त :- नित्यानन्द-गोसाञि गौड़े यबे आइला। प्रेम प्रचारिते तबे भ्रमिते लागिला ॥ 147 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब गौड़देशमें आये, तब वे प्रेमका प्रचार करते हुए भ्रमण करने लगे ॥ 147 ॥
गौरसर्वस्व श्रीनित्यानन्दके दो प्रकारके गौर-सेवन-कार्य :- प्रेम-प्रचारण आर पाषण्डदलन। दुइकार्ये अवधूत करेन भ्रमण ॥ 148 ॥ अनुवाद—प्रेमका प्रचार तथा पाखण्डका दलन—इन दो कार्योंको करनेके उद्देश्यसे अवधूत (श्रीनित्यानन्द प्रभु) भ्रमण करने लगे ॥ 148 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें पाखण्डी रामचन्द्र-खाँनके अपराधके वृत्तान्तका वर्णन :- सर्वज्ञ नित्यानन्द आइला तार घरे। आसिया बसिला दुर्गामण्डप-उपरे ॥ 149 ॥ अनुवाद—भ्रमण करते-करते सर्वज्ञ श्रीनित्यानन्द प्रभु रामचन्द्र खाँनके घरपर आये और उसके घरके दुर्गामण्डपमें बैठ गये ॥ 149 ॥ अनुभाष्य—'दुर्गा-मण्डप',—अवैष्णव सम्भ्रान्त-गृहस्थके घरमें जिस स्थानपर दुर्गापूजा होती है, उस मण्डपको 'चण्डीमण्डप' अथवा 'दुर्गामण्डप' कहते हैं; शारदीय अथवा वासन्ती पूजाके समयमें चार दिनोंके अतिरिक्त अन्य समयमें वह मण्डप अतिथि और साधारण लोगोंके द्वारा व्यवहार किया जाता है ॥ 149 ॥
अनेक लोकजन-सङ्गे अङ्गन भरिल। भितर हैते रामचन्द्र सेवक पाठाइल ॥ 150 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बहुत लोग थे, इसलिये उन्हींसे घरका आङ्गन भर गया। उस समय रामचन्द्र खाँन घरके भीतर था और वहींसे उसने अपने एक सेवकको श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास भेजा ॥ 150 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अवज्ञा :- सेवक बोले,—"गोसाञि, मोरे पाठाइल खाँन। गृहस्थेर घरे तोमाय दिमु वासस्थान ॥ 151 ॥ गोयालार गोशाला हय अत्यन्त विस्तार। इँहा सङ्कीर्ण-स्थल, तोमार मनुष्य—अपार ॥"152 ॥ अनुवाद—सेवकने कहा,—"हे गोसाईं, मुझे रामचन्द्र खाँनने अन्य किसी गृहस्थके घरमें आप लोगोंको रहनेका स्थान दिलवानेके लिये भेजा है। यह घर तो बहुत छोटा है और आपके साथ लोग भी बहुत हैं। क्योंकि गृहस्थ ग्वालोंकी गौशाला बहुत बड़ी होती है, इसलिये आपकी वहीं रहने आदिकी व्यवस्था करवा देते हैं॥" 151–152 ॥