श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2104, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/153–162 तीसरा अध्याय 87 श्रीनित्यानन्दका क्रोध :- भितरे आछिला, शुनि' क्रोधे बाहिरिला। अट्ट अट्ट हासि' गोसाञि कहिते लागिला ॥ 153 ॥ श्रीनित्यानन्दकी भविष्यवाणी :- “सत्य कहे,—एइ घर मोर योग्य नय। म्लेच्छ गो-वध करे, तार योग्य हय ॥” 154 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन घरके भीतर है और स्वागतके लिये स्वयं न आकर सेवकके द्वारा उन्हें कहीं और जानेकी बात कहलवायी है, तो उसके ऐसे व्यवहारसे क्रोधित होकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दुर्गामण्डपसे उठकर बाहर आ गये और अट्टहास करते हुए कहने लगे,—“रामचन्द्र खाँन ठीक ही कह रहा है। उसका यह घर मेरे रहने योग्य नहीं है। यह घर तो गायोंका वध करनेवाले म्लेच्छोंके ही वासके योग्य है।” 153–154 ॥ गणोंसहित श्रीनित्यानन्द प्रभुका विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीके स्थानका परित्याग :- एत बलि' क्रोधे गोसाञि उठिया चलिला। तारे दण्ड दिते से ग्रामे ना रहिला ॥ 155 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु क्रोधपूर्वक वहाँसे चल दिये। उसे दण्ड देनेके उद्देश्यसे वे उस ग्राम तकमें भी नहीं रहे ॥ 155 ॥ रामचन्द्र खाँनकी चूड़ान्त पाखण्डता :- इँहा रामचन्द्र खाँन सेवके आज्ञा दिल। गोसाञि याँहा बसिला, तार माटी खोदाइल ॥ 156 ॥ अनुवाद—इधर रामचन्द्र खाँनने अपने सेवकोंको आदेश दिया कि जहाँपर श्रीनित्यानन्द गोसाईं बैठे थे, उस स्थानकी मिट्टीको खुदवाकर बाहर फेंक दो ॥ 156 ॥ गोमय-जले लेपिला सब मन्दिर-प्राङ्गण। तबु रामचन्द्रेर मन ना हैल परसन्न ॥ 157 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने सम्पूर्ण दुर्गामण्डप-मन्दिर और आङ्गनको गोबर-जलसे लिपवाया, तो भी उसका मन प्रसन्न नहीं हुआ ॥ 157 ॥ विष्णु-वैष्णव-विद्वेषका भीषण फल अथवा दण्डकी प्राप्ति :- दस्युवृत्ति करे रामचन्द्र राजारे ना देय कर। क्रुद्ध हञा म्लेच्छ उजिर आइल तार घर ॥ 158 ॥ अनुवाद—रामचन्द्र खाँन चोर जैसा कार्य करता था, वह राजाको कर नहीं देता था। क्रोधित होकर म्लेच्छ मन्त्री उसके घरमें आया ॥ 158 ॥ आसि' सेइ दुर्गामण्डपे वासा कैल। अवध्य वध करि घरे मांस रान्धिल ॥ 159 ॥ अनुवाद—वह म्लेच्छ मन्त्री आकर उसी दुर्गामण्डपमें ठहरा। गायका वध नहीं करना चाहिये, परन्तु उसने रामचन्द्रके घरमें ही गायका वध करके उसके मांसको पकाया ॥ 159 ॥ स्त्री-पुत्र-सहित रामचन्द्रेरे बान्धिया। तार घर-ग्राम लुटे तिनदिन रहिया ॥ 160 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छ मन्त्रीने रामचन्द्र खाँनको उसकी स्त्री और उसके पुत्र सहित बाँध दिया। उसने तीन दिन तक उस ग्राममें रहकर रामचन्द्र खाँनके घरके साथ-ही-साथ वहाँके सभी घरोंमें लूटपाट की ॥ 160 ॥ सेइ घरे तिनदिन अवध्य-रन्धन। आरदिन सबा लञा करिला गमन ॥ 161 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके घरमें तीन दिन तक गायोंका मांस पकाया और अगले दिन वह अपने सभी साथियोंको लेकर वहाँसे चला गया ॥ 161 ॥ जाति-धन-जन खाँनेर सकल लइल। बहुदिन पर्यन्त ग्राम उजाड़ रहिल ॥ 162 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छने रामचन्द्र खाँनके पद, धन