भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2105

88 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/162-167 ]

और जन आदि सबकुछ हर लिया। बहुत दिनों तक वह गाँव उजाड़ पड़ा रहा ॥ 162 ॥ विष्णु-वैष्णव-विद्वेषके फलसे दशा अथवा अवस्था :- महान्तेर अपमान ये देश-ग्रामे हय। एक जनार दोषे सब देश उजाड़य ॥ 163 ॥ अनुवाद—जिस देश अथवा ग्राममें महापुरुषका अपमान होता है, एक व्यक्तिके दोषके कारण वह सम्पूर्ण स्थान ही उजड़ जाता है॥ 163 ॥ अमृताणुकणिका—पतितपावन श्रीनित्यानन्द प्रभुने जगाइ-मधाइ जैसे पापकी चरमसीमा तक पहुँचे दो ब्राह्मण पुत्रोंको भी महाभागवत बना दिया। वे रामचन्द्र खाँनके भी उद्धारके लिये स्वयं उसके घरमें जाकर उपस्थित हुए, किन्तु वैष्णवापराधी रामचन्द्र खाँन पतितपावन श्रीनित्यानन्दकी उस कृपाको ग्रहण नहीं कर सका। अवधूत श्रीनित्यानन्दकी प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो दिया, किन्तु वैष्णवापराधीका उद्धार नहीं हुआ। वैष्णवापराधियोंके कानोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अयाचित अर्थात् बिना माँगी हुई कृपा भी प्रविष्ट नहीं हुई। पतितपावन श्रीनित्यानन्द पतित रामचन्द्र खाँनपर कृपा करनेके लिये आये थे, किन्तु रामचन्द्र खाँनके द्वारा कृपा ग्रहण करनेकी बात तो दूर रही, उसने श्रीनित्यानन्द प्रभुको तो अपने घरमें रहनेका स्थान भी नहीं दिया। अपितु जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे थे, उस स्थानको अपवित्र जानकर गोबर आदिसे लेपकर पवित्र करनेके प्रयाससे भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। यह भी उसका बहुत बड़ा अपराध था। वैष्णवापराधका बीज क्रमशः अङ्कुरित, पल्लवित और विस्तारित होकर वृक्षरूपमें परिणत हुआ और उसने एक दिन अपना फल प्रदान किया।—'गौड़ीय चतुर्थ खण्ड' ॥ 163 ॥ सप्तग्रामके अन्तर्गत चाँदपुरमें अनुगत बलराम आचार्यके घरमें ठाकुर-श्रीहरिदास :- हरिदास ठाकुर चलि' आइला चान्दपुरे। आसिया रहिला बलराम-आचार्येर घरे ॥ 164 ॥

अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर अपनी भजन कुटिया छोड़कर चाँदपुर चले आये। वहाँ आकर वे श्रीबलराम आचार्यके घरमें रहने लगे ॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चान्दपुर',—सप्तग्राम-त्रिवेणीमें हिरण्य और गोवर्धनके घरकी पूर्वदिशामें 'चाँदपुर'-ग्राम है; वहाँ हिरण्य-गोवर्धनके पुरोहित श्रीबलराम आचार्य और श्रीयदुनन्दन आचार्यके घर थे॥ 164 ॥ अनुभाष्य— 'चान्दपुर',—हुगली जिलेके अन्तर्गत त्रिवेणीके निकट यह ग्राम है; किसी-किसीके मतानुसार, परवर्तीकालमें इस ग्रामका ही नाम 'कृष्णपुर' हुआ था ॥ 164 ॥ हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारका और श्रीबलराम आचार्यका परिचय :- हिरण्य, गोवर्धन—मुलुकेर मजुमदार। तार पुरोहित—'बलराम' नाम ताँर ॥ 165 ॥ अनुवाद—श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदार चाँदपुर नामक मुलुकके (प्रदेशके) जमींदार थे तथा उनके पुरोहितका नाम श्रीबलराम था ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'मुलुक',—सप्तग्राम-मुलुक (प्रदेश) ॥ 165 ॥ अनुभाष्य— 'मजुमदार',—'मज्मु-आदार'; नवाबके राज्यमें राजस्वके हिसाब-रक्षक ॥ 165 ॥ हरिदासेर कृपापात्र, ताते भक्ति माने। यत्न करि' ठाकुरेरे राखिला सेइ ग्रामे ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीबलराम आचार्य श्रीहरिदास ठाकुरके कृपापात्र थे और उनसे सम्भ्रम प्रीति करते थे। उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको उस ग्राममें रखा और वे उनकी बड़े आदरके सहित सेवा करते थे ॥ 166 ॥ निर्जन पर्णशालाय करेन कीर्त्तन। बलराम-आचार्य-गृहे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 167 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर गाँवमें निर्जनमें बनी