भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2106, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2106

[ 3/167-176 तीसरा अध्याय 89 एक पर्णकुटीमें कीर्तन करते। वे अपनी देह-यात्रा हिरण्य और गोवर्धनके द्वारा श्रीठाकुरका निर्वाहके लिये श्रीबलराम आचार्यके घरपर भिक्षा ग्रहण यथायोग्य आदर-सत्कार :- करते थे॥ 167॥ ठाकुर देखि' दुइ भाइ कैला अभ्युत्थान। पाय पड़ि' आसन दिला करिया सम्मान॥ 172॥ बाल्यकालमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको श्रीहरिदासके सङ्गरूपी कृपाकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरको देखकर दोनों भाई रघुनाथदास बालक करेन अध्ययन। उठकर खड़े हो गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया। हरिदास-ठाकुरेरे याइ' करेन दर्शन॥ 168॥ दोनों भाइयोंने सम्मानपूर्वक उन्हें आसन प्रदान किया॥ 172॥ साधुके सङ्ग और कृपाके फलसे ही श्रीचैतन्य-प्राप्ति :- अनेक पण्डित सभाय, ब्राह्मण, सज्जन। हरिदास-कृपा करे ताँहार उपरे। दुइ भाइ महापण्डित-हिरण्य, गोवर्धन॥ 173॥ सेइ कृपा 'कारण' हैल चैतन्य पाइबारे॥ 169॥ अनुवाद-उस सभामें अनेक विद्वान्, ब्राह्मण और अनुवाद-श्रीहिरण्य मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथदास सज्जन व्यक्ति थे। स्वयं दोनों मजुमदार भाई भी बहुत उस समय बालक थे और अध्ययन करते थे। वे विद्वान् थे॥ 173॥ श्रीहरिदास ठाकुरका दर्शन करने जाया करते थे। श्रीहरिदास ठाकुर उनके प्रति कृपालु थे। उनकी वह श्रीहरिदासकी प्रशंसा सुनकर दोनों भाइयोंको सुख :- कृपा ही बादमें श्रीरघुनाथदासके श्रीचैतन्य महाप्रभुका हरिदासेर गुण सबे कहे पञ्चमुखे। चरणाश्रय प्राप्त करनेका कारण बनी॥ 168-169॥ शुनिया त' दुइ भाइ पाइला बड़ सुखे॥ 174॥ चाँदपुरमें हिरण्य-गोवर्धनकी सभामें अनुवाद-वहाँ सभी व्यक्ति श्रीहरिदासके गुणोंकी श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन :- महिमाका वर्णन करने लगे मानो उनके पाँच मुख हों। ताँहा यैछे हैल हरिदासेर कथन। यह सुनकर श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन, दोनों भाइयोंको व्याख्यान,-अद्भुत कथा शुन, भक्तगण॥ 170॥ बहुत आनन्द हुआ॥ 174॥ अनुवाद-श्रीहिरण्य-गोवर्धनकी सभामें श्रीहरिदास श्रीठाकुरको देखकर पण्डितोंके द्वारा ठाकुरने नामकी महिमाका गान किया। हे भक्तों! अब नामतत्त्वका विचार :- आप उस अद्भुत कथाको श्रवण करो॥ 170॥ तिन-लक्ष नाम ठाकुर करेन कीर्त्तन। नामेर महिमा उठाइल पण्डितगण॥ 175॥ बलरामकी प्रार्थनासे एकदिन हिरण्य-गोवर्धनकी सभामें श्रीठाकुरका गमन :- अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमा गाते हुए एकदिन बलराम मिनति करिया। उस सभामें यह भी कहा गया कि वे प्रतिदिन तीन मजुमदारेर सभाय आइला ठाकुरे लञा॥ 171॥ लाख नाम कीर्तन करते हैं। ऐसा सुनकर विद्वानोंने नामकी महिमाका प्रसङ्ग उठाया॥ 175॥ अनुवाद-एकदिन श्रीबलराम आचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरसे श्रीहिरण्य और श्रीगोवर्धन मजुमदारकी सभामें सभीके द्वारा नामाभासको ही शुद्धनाम मानना :- चलनेका विनम्र निवेदन किया और उन्हें अपने साथ केह बोले,-'नाम हैते हय पापक्षय।' लेकर आये॥ 171॥ केह बोले,-'नाम हैते जीवेर मोक्ष हय॥' 176॥