भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2107

90 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/176-180 ] अनुवाद-कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे पाप क्षय होते हैं।' अन्य कुछ विद्वान् कहने लगे, —'नामसे जीवोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है॥' 176॥ श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनामके फलका वर्णन :— हरिदास कहेन, —"नामेर एइ दुइ फल नय। नामेर फले कृष्णपदे प्रेम उपजाय॥ 177॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"नामके यह दोनों फल नहीं हैं। नामका वास्तविक फल तो भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति प्रेम उत्पन्न होना ही है॥ 177॥ शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (11/2/40) में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्यन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 178॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥ 178॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 178॥ शुद्धनाम और उसके फलस्वरूप प्रेमोदयके बीचमें ही नामाभास और उसका फल अनर्थ-निवृत्ति अन्तर्भुक्त :— आनुषङ्गिक फल नामेर—'मुक्ति', 'पापनाश'। ताहार दृष्टान्त यैछे सूर्येर प्रकाश॥ 179॥ अनुवाद-मुक्ति और पापोंका नाश तो नामका आनुषङ्गिक फल हैं। सूर्यका प्रकाश ही उसका दृष्टान्त है॥ 179॥ अनुभाष्य-नामसे गौणरूपसे संसारबन्धन-मोचन और संसार-आसक्तिरूपी पाप ध्वंस होता है। नामसे युक्त मन्त्रदीक्षाकी संज्ञामें ऐसा लिखा है— "दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पापस्य संक्षयम्। तस्मात् दीक्षेति सा प्रोक्ता देशिकैस्तत्त्वकोविदैः॥” [अर्थात् "क्योंकि यह दिव्यज्ञान (सम्बन्धज्ञान) प्रदान करता है एवं पापका (पाप, पापबीज और अविद्या) जड़ सहित विनाश करता है, इसलिये भगवत्तत्त्वविद् पण्डितगण इस अनुष्ठानको 'दीक्षा'के नामसे पुकारते हैं।"] उदाहरण-स्वरूप कहा जाता है कि सूर्योदयका मुख्यफल स्वप्रकाश, परप्रकाश, आनन्द आदि है और इसके अतिरिक्त गौण फलरूपमें अन्धकारका दूर होना भी लक्षित होता है॥ 179॥ नामरूपी सूर्यके उदित होनेपर अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश :— पद्यावलीमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-स्वामि-कृत 'नामकौमुदी'-श्लोक— अंहः संहरदखिलं सकृदुदयादेव सकल-लोकस्य। तरणिरिव तिमिरजलधिं जयति जगन्मङ्गलं हरेर्नाम॥ 180॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सूर्य जिस प्रकार उदित होकर तिमिर-समुद्रका (गाढ़ अन्धकारका) नाश करते हैं, उसी प्रकार जो हरिनाम एकबार भी उदित होनेपर [सेवोन्मुख इन्द्रियोंपर प्रकट होकर कीर्तन-श्रवणादि अनुष्ठानके द्वारा] समस्त लोकोंके पापोंका नाश करते हैं, वे जगत्का मङ्गल करनेवाले हरिनाम जययुक्त हों॥ 180॥ अनुभाष्य— जगन्मङ्गलं (जगतां मङ्गलं प्रेमपर्यन्तमङ्गलप्रदं) हरेः नाम (हरिनामप्रभुः) सकृत् (बारमेकम्) उदयात् (सेवोन्मुखे इन्द्रियादौ प्राकट्येन कीर्त्तन-श्रवणाद्यनुष्ठानात्) एव तरणिः (सूर्यः) तिमिर-जलधिं (गाढ़ान्धकारराशिम्) इव (यथा नाशयति तथा) सकललोकस्य (सर्वजगतः) अखिलम् अंहः (संसार-हेतुकं पापं) संहरत् (दूरीकुर्वत्) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 180॥